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Friday, 4 October 2019

ईशवरदास जी भादेसर जीवन

ईश्वरदास जी (भादरेस) बाड़मेर 


दोहा:- अलख भरोसे उखले,आदण ईशरदास ।

          उकलियो में ओरसी कोई बड़ो भगत है विश्वास ।।

अनुवाद:- 

                     ईश्वरदास जी एक दिन बैठे भजन कर रहे थे,  पास मे चूल्हे पर पानी गरम हो रहा था, थोड़ी देर बाद एक भक्त आया जिसके पास मूँग और चावल मिंक्स थे ! उसने ईशवरदास जी से कहा बावजी पानी गरम हो रहा है इसमे मूँग चावल डाल डालकर खिचड़ी बना दूँ ,,




ईशवरदास जी ने कहा:- देख भक्त तेरी मर्जी मेरे लिये मत करना कुछ, उस भक्त ने गरम पानी मे मूँग चावल डाल दिये! पास से एक और भक्त घी लेकर जा रहा था, जैसे ही खींचड़ी कि सुगंध आने लगी, और घी लेके वो भक्त वही आ गया और बोला ये खिचड़ी बनी हुई है! इसमे घी डाल दूँ ! ताकी मुझे भी संतो का परसाद मिल जाये ।



ईशवर दास जी ने कहा तेरी मर्जी भक्त,,(अब गरमागरम खिचड़ी ऊपर घी स्वाद अलग ही है) दोनों भक्तो ने जब 1 थाली मे खिचड़ी डालकर ईश्वरदास जी को परोसा तो ईशवरदास जी ने भगवान से कहां हे ! भगवंन मुझे पता था, आप अपने भक्तों को कभी भूखा रहने नही दोगे मेरे पास सिर्फ गर्म पानी था लेकिन आपने तो खिचड़ी बना कर मुझे परोस दी  || विश्वास ||

(इश्वरा /परमेश्वरा)


  दोहा':-

         सांगा जल थल उपणो इशर तणी आवाज।

          वेगो आव भलण कर कोम्भल बक्सण काज।।

यह दोहा इश्वरदास जी ने गुजरात रैणू नदी के किनारे रहते उनके मित्र(भक्त) साँगा गौड़ को जीवित किया तब आवाज लगाई थी ।


दोहा:-    ईशवर घोड़ा  हाकीया भावसागर रे माय।

             तारण वालो तारसी साई! पकड़ी  बाय ।।


अनुवाद:    गुजरात में ईश्वरदास जी ने लोगो से कहा अब मैं जा रहा हूँ! तब लोगो ने कहा हे ! प्रभू कैसे जाओगे पानी मे से ।
तब राम नवमी थी,और इशर दास जी ने अपना घोड़ा ये दोहा बोलकर द्वारिका कि तरफ मोड़ लिया ||