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Tuesday, 25 August 2020

शेख फरीद व डूंगरपुरी मिलाप

"डुंगरपुरी जी महाराज"

शेख फरीद को अपनी भक्ति पर अभिमान हो गया था,उसने सोचा अब मेरी माला सफल हो गई,शेख फरीद अपनी माला का दुरुपयोग करने लगा, पक्षियों को कहता: पक्षियो मर जाओ, पक्षी मर जाते ! वापस जिंदा हो जाओ: पक्षी जिंदा हो जाते,, कुछ दिनों में ही माला का तप पुरा हो गया ।
फिर एक दिन शेख फरीद अपने मुख से पशु पक्षियों को वहीं बोला (सारे मर जाओ) कोई फर्क नहीं पड़ा ।



शेख फरीद को बहुत दुःख हुआ, उसे पता चल गया उसके अभिमान के कारण बचपन से (जो भक्ति की) उसकी माला का तप खत्म हो गया,,शेख फरीद बहुत दुःखी था,तब किसी ने शेख फरीद को बताया, हिन्दू धर्म में एक प्रवीण संत हैं डूंगरपुरी जी महाराज जो राजस्थान में है उनको अपने यहां बुलाकर सत्संग करवाओ और आप उनके शिष्य बन जाओ आपका जीवन सार्थक हो जायेगा।



तब शेख फरीद ने डूंगरपुरी जी महाराज को पत्र लिखा: पत्र में अपने यहां आने व शिष्य बनने की बात रखी,महाराज ने पत्र लिखकर जबाब भेज दिया ! फिर दुसरे ही दिन डूंगरपुरी जी महाराज अपने एक नये शिष्य को साथ लेकर रवाना हो गए,(वह शिष्य कुब्दी व लालची था) शेख फरीद के वहां से कुछ दुरी पर ही रास्ते में महाराज को प्यास लगी तो अपने शिष्य को कहा बेटा वहां एक कुआं है तुम पानी का एक कमंडल (झारी) भर कर लेके आ जाओ, महाराज जी का शिष्य कुएं पर गया, उसने मन में सोचा शेख फरीद व डूंगरपुरी जी का मिलन कभी नहीं हुआ, क्यों ना मैं डूंगरपुरी बनकर शेख फरीद के वहां चला जाऊं, महाराज को इस कुएं में धकेल देता हूं ! शेख फरीद के वहां से जो भी भेंट (पैसा) होगा वह लेकर कहीं दूर चला जाऊंगा ।



अब वह शिष्य महाराज जी से बोला इस कुएं के पानी में कुछ है,आप खुद देख लिजिए ! डूंगरपुरी जी ने आकर जैसे ही कुएं में देखा तो पिछे से उस शिष्य ने धक्का दे दिया,और वह शिष्य सीधा शेख फरीद के चला घर गया, शेख फरीद ने सोचा डूंगरपुरी जी महाराज यहीं है ! शेख फरीद ने डूंगरपुरी जी समझकर उस शिष्य का खूब स्वागत किया, डूंगरपुरी जी के आसन पर वह शिष्य जाकर बैठ गया ।



उधर डूंगरपुरी जी महाराज जिस कुएं में थे, वहां से कुछ औरतें खेत से अपने अपने घर जा रही थी जैसे ही औरतो के पैरों में पहने गहनें आवाज़ महाराज जी के कानों में पड़ी, तब महाराज जी ने कुएं से आवाज लगाई बेटा मैं आंखों से अंधा हूं मुझे बाहर निकाल लिजिए, एक औरत के कानों तक आवाज पहूंची तो उसने दुसरी औरत से कहां इस कुएं से हमें मदद के लिए किसी ने आवाज लगाईं है, जब कुएं में देखा तो सारी औरतों ने अपनी ओढ़नी को गांठ बांधकर एक किया (महाराज जी अपने शरीर को फूल जैसा हल्का बना लिया)
और महाराज जी को कुएं से बाहर निकाल दिया ।



फिर बाद में डूंगरपुरी जी महाराज ने अपना नाम पता उन महिलाओं को बताया,और कहां मुझे शेख फरीद के वहां जाना है ! रास्ता बता दीजिए,औरतो ने महाराज जी को   रास्ता बता दिया ! डूंगरपुरी जी महाराज  सत्संग शुरू होने से पहले पहूंच गए वहां और भी संत बैठे थे महाराज उनके पास जाकर बैठ जाते हैं: महाराज जी देखते हैं सामने एक बड़ा आसन है,जो कि डूंगरपुरी जी के लिए है (यानि स्वयं का) वहां उनका वहीं नुगरा शिष्य बैठा था !



जब सत्संग शुरू करने का समय हुआ, शेख फरीद ने वीणा लाकर उस शिष्य को दिया (जो डूंगरपुरी जी के आसन पर बैठा था) और कीर्तन शुरू करने का आग्रह किया,वह शिष्य  कीर्तन-भजन शुरू करने लगा तो वहां अपने आप कुछ अनहोनी छा: गई,जलते हुए दीपक बुझ गए, शेख फरीद ने वहां पर बैठे सभी संतों से वीनती की,डूंगरपुरीजी महाराज जैसे प्रवीण संत यहां विराजमान है,और ये विघ्न कैसे आ गया, तब वहां जो दुसरे संत बैठे थे उन्होंने कहां अगर डूंगरपुरी जी के आसन पर सच में डूंगरपुरी जी ही विराजमान हैं तो ये दीपक अपने आप प्रज्वलित होना चाहिए,, उस शिष्य ने सोचा अब यहां से निकलना ही बेहतर है ! डूंगरपुरी जी महाराज का आसन छोड़ शिष्य वहां से निकल गया, जब शेख फरीद आया तो आसन खाली देख इधर-उधर घुमने लगा, (महाराज कहां गये) ।



शेख फरीद दुसरे संतो के सामने हाथ जोड़कर फिर से खड़ा हो गया, हे ! प्रभु ये मेरी कौन सी परीक्षा ली जा रही है तब वहां अचानक दीप प्रज्वलित हो गए, शेख फरीद ये देख आश्चर्य में पड़ गया,, आसन पर कोई नहीं और ये चमत्कार कैसे हुआ । शेख फरीद ने फिर से कहां: हे ! प्रभु आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करो और मेरे सामने आओ । तब डूंगरपुरी जी महाराज ने अपना आसन ग्रहण किया, शेख फरीद के मुंह से कुछ भी शब्द भी नहीं निकल गए थे ।



महाराज जी वहां अपने आसन पर जाते ही वीणा लेकर भजन कीर्तन शुरू किए 4 भजन गाते ही डूंगरपुरी जी का आसन जमीन से 3 से 4 फ़ीट ऊपर उठ गया,शेख फरीद आकर महाराज के शरणो में गिर पड़ा,और कहां प्रभु आप कौन हो,  डूंगरपुरी जी महाराज ने हंसकर कहा: आजकल तो पत्र लिखकर बुलाने वाले ही भुल जाते हैं ! शेख फरीद को ज्ञात हो गया डूंगरपुरी जी महाराज यहीं है, महाराज जी ने शेख फरीद से कहां: ये मत पुछना आप कहां थे ये सब क्यूं (डूंगरपुरी जी नहीं चाहते थे,अपने ही शिष्य की बुराई हो)



शेख फरीद ने महाराज जी को अपने मन की एक बात बताई, हे प्रभु इस दुनिया में जितने भी परमार्थी जीव है,वह पारस जैसे होते है ये दुनिया लोहे जैसी है लेकिन आपकी (पारस की) संगति मिल जाए तो दुनिया लोहे से सोने में बदल सकती हैं ! डूंगरपुरी जी महाराज ने शेख फरीद से कहां: बताओ तुम्हें हमसे क्या चाहिए,


 शेख फरीद: हे ! देवपरुष मुझे आपकी चरण ! आपका शिष्य बना लिजिए ।

शिष्य का नाम सुनते ही डूंगरपुरी जी का मन उदास हो गया मगर कहते हैं हर शिष्य भी एक जैसा नहीं होता, डूंगरपुरी जी महाराज ने शेख फरीद को अपना शिष्य बना लिया और कहा:

 शब्द झालो वचने हालो भक्ति खांडेधार है।

बाबो डूंगरपुरी बोले यूं प्रीत लगिया पार है ।।

अर्थ:  

                    शेख फरीद को महाराज ने अपने पास बुलाया और कहां शब्द (शिष्य बनना) ले रहे हो तो वचन में चलना,ये भक्ति तलवार की धार से तेज है! डूंगरपुरी जी कह रहे हैं, भगवान से प्रेम ही हमें पार कर सकता है।

शेख फरीद डूंगरपुरी जी महाराज का एक नेक भक्त एवं शिष्य हुआ ।


Sunday, 23 August 2020

डूंगरपुरी जी महाराज, जीवनी

 डूंगरपुरी जी महाराज


बाड़मेर के पास स्थित एक गांव चौहटन (मठ) से जुड़ी ये कहानी ! 1863 में जेष्ठ वदी ग्यारस को महाराज ने जीवित समाधि ले ली:-  


बालपन में ही अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात डूंगरपुरी जी महाराज भावपुरी जी को गुरु मान कर उनकी चरण में आ गए,, फिर वही मठ में घुणा बनाकर भक्ति के साथ साथ भजन गाते थे, भक्ति(भजन) का तप इतना बढ़ गया,ऐसा कहां जाता है: महाराज जी 4 भजन गाने के बाद उनका आसन जमीन से २/३ फुट ऊपर आ जाता था, आस-पास के गांवो में महाराज की चर्चा होने लगी, 
 डुंगरपुरी जी महाराज अपने भक्तों से खूब प्रेम रखते थे,और भक्तों ने महाराज को ही अपना भगवान मान लिया था, समय के साथ-साथ डूंगरपुरी जी महाराज को परमेश्वर की उपाधि दे दी गई,बाद में लोग महाराज को  डूंगरा (परमेश्वरा) नाम से जानने लगे ।



एक बार तो गुरु भावपुरी जी ने महाराज के पैर पकड़ लिए:-

ऐसा मानना है: भावपुरी जी को मोक्ष की प्राप्ति के लिए बार बार मानव जन्म में आना पड़ा, फिर भी उनको मोक्ष का मार्ग नहीं मिला, (भक्ति के लिए श्मशान भूमि अति उत्तम मानी जाती है) एक दिन भावपुरी जी भक्ति के लिए श्मशान में गए, उनका मिलाप कुछ भूतों से हो गया,भावपुरी जी और सारी प्रेत आत्माओं में मित्रता हो गई, हर रोज शमशान जाते थे,उन भूतों से साथ खेलना उनसे बातें करना उनको अच्छा लगता था ‌।



एक दिन डूंगरपुरी जी ने उनको रात में जाते देख लिया,महाराज ने मन में सोचा मेरे गुरु अभी कहां जा रहे हैं, डूंगरपुरी जी अपने गुरु का पिछा करते हुए श्मशान भूमि तक पहुंच गए, वहां जाकर देखा तो भावपुरी जी भूतों साथ समय बिता रहे थे ! डूंगरपुरी जी वहां से सीधा मठ में आए और रात भर सोचते रहे, मेरे गुरु जब तक इन नुगरो की संगत नहीं छोड़ेंगे तब तक उनकी मोक्ष नहीं होगी,,



दुसरे दिन डूंगरपुरी जी अपने गुरु से पहले एक कमंडल लेकर श्मसान में आ गए, और उन प्रेत आत्माओं से कहां: मैं आप सभी की मुक्ति करने आया हूं ! मुक्ति का नाम सुनते ही सारे भूत इकट्ठा हो गए, सभी कहने लगे हम सब को मोक्ष चाहिए! डूंगरपुरी ने अपने कमंडल के जल का छिड़काव जैसे ही उन भूतों पर किया, सब की गति (मोक्ष) हो गई ।


एक भूत जो पैरों से कमजोर था, वह दौड़कर आया मगर नहीं पहुंच पाया ! डूंगरपुर जी महाराज वहां से मठ आ गए, भावपुरी जी श्मसान में गए तो देखा सिर्फ एक भूत बैठा था वह भी उदास था,भावपुरी ने पुछा: मित्र तुम यहां अकेले बैठे हो बाकि सब कहां है।



तब उसने कहां: आपका शिष्य डूंगरपुरी यहां आया था, उन्होंने कमंडल के जल से सब की मोक्ष कर दी,भावपुरी जी आश्चर्य में पड़ गए । वहां से भावपुरी मठ में आकर डूंगरपुरी के चरण पकड़ लिए, तब डूंगरपुरी ने कहा: हे ! गुरुवर आप मेरे गुरु हो आप मेरे पैर ना पकड़े । भावपुरी जी ने कहा: अब तो तब तक नहीं छोडुंगा जब तब मुझे मोक्ष का मार्ग ना मिले,,



तब डूंगरपुरी ने कहां: हे ! गुरुदेव आप मोक्ष के पथ पर ही थे, लेकिन इन भूतों की संगत से आप उस मार्ग से विचलित हो गए, आप मेरे गुरु हो इसलिए इस जन्म में आपको मोक्ष का रास्ता नहीं दिखा सकता,मैंने आपकी मोक्ष कर दी तो दुनिया का गुरु पर से विश्वास उठ जाएगा,, लोग कहेंगे शिष्य ने गुरु की मोक्ष की, हे ! मोक्ष के लिए गुरुदेव आपको एक बार और मानव जन्म धारण करना पड़ेगा।


संतों ने कहा है: भावपुरी जी ने फिर से एक बार मनुष्य जन्म धारण किया,और डूंगरपुरी जी महाराज के शिष्य हुए ।
जब डूंगरपुरी जी महाराज ने एक छोटे बच्चे के रुप में अपने गुरु भावपुरी जी को देखा, महाराज फूले न समाये ।

कथित:

आज हमारे गुरु आगंन आए,अलख पुरूष अविनाशी ।।

अर्थ: - डूंगरपुरी जी महाराज ने कहा: आज मेरे गुरु मोक्ष के लिए एक और जन्म धारण कर पधारे हैं,अलख के पुत्र हैं ! और वे अविनाशी है यानि जिनकी कभी मौत नहीं होती है।