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Wednesday, 30 September 2020

कहानी भगवान विष्णु व लक्ष्मी

एक भगवान विष्णु से लक्ष्मी ने कहां : हे नारायण आपको नहीं लगता आपके सारे भक्त मेरे होते जा रहें,
भगवान : मैं समझा नहीं ! 
लक्ष्मी : स्वामी इस संसार का हर व्यक्ति (लक्ष्मी) मुझे पाने के लिए आपको भुल सकता हैं, 
भगवान ने कहां : चलो आज किसी भक्त की परीक्षा लेने जा रहा हूं आप भी उसकी परीक्षा लेने आ जाना ।
लक्ष्मी : ठीक है स्वामी चलिए आप,


भगवान विष्णु साधु के रूप में मृत्युलोक में आए, और एक सेठ के महल के सामने आकर जल के लिए अलख लगाई साधु की आवाज सुनकर सेठ जल का लोटा लेकर बाहर आएं, भगवान ने जल पिया ! तब सेठ ने सोचा जीवन भर माया जोड़ने का ही काम किया,जीवन किसी में साधु को भोजन करवाना, दान देना, हित व परोपकार कार्य नहीं किया आज साधु दर पर आएं हुएं हैं तो क्यों ना इनको भोजन करवा दूं तो अपना तन,मन,धन,माया, सारी पवित्र हो जाएंगी ।



सेठ ने भगवान से भोजन के लिए निमंत्रित किया ।
भगवान (विष्णु) : नहीं सेठ हमें देर हो रही है आपके यहां जल पी लिया अब किसी और भक्त के घर ढुंढकर चतुर्मास के लिए बैठना है ।
सेठ मन में सोचने लगे : यानि ये साधु चार महिने किसी के घर में चतुर्मास करेंगे, वो भक्त हर रोज साधु को भोजन करवायेंगे तो उस भक्त को कितना फायदा होगा, मेरे महल में जगह भी बहुत हैं क्यूं ना मैं इन साधु को मेरे यहीं चतुर्मास के लिए बैठा दूं ! तो मेरा जीवन भी धन्य हो जायेगा ।


सेठ भगवान विष्णु से कहने लगें हे ! महाराज आपको एतराज नहीं तो मेरे महल में जगह भी बहुत हैं, आप यहां पर चतुर्मास कर लिजिए,, आपको किसी प्रकार की कमी महसूस नहीं होगी,
भगवान (विष्णु) : देख सेठ हम संत जहां भी चतुर्मास के लिए बैठते हैं चार महिने से पहले बीच में नहीं उठते, आप पहले सोच लिजिए फिर हम महल के अंदर चलेंगे ।
सेठ : हे ! महाराज इसमें सोचना क्या है ये मेरा घर है मैं आपकी सेवा में हाजिर रहूंगा, आट चार महिने तो क्या 12 महिने रूक सकते हो,
भगवान (विष्णु) : ठीक है सेठ ! अब मुझे विश्वास है तुम पर विश्वास हैं।


सेठ भगवान विष्णु को अपने महल के अंदर ले गया, उनको अच्छे आसन पर बिठाया, और सेठ ने अपने रसोईया को स्वादिष्ट भोजन बनाने को कहां, सेठ के घर किसी बात की कमी नहीं थी रसोइये ने साधु लिए काजु बादाम का हलवा बनाया, जब भगवान ने भोजन किया उनको बहुत ही प्रसन्नता हुई ! भगवान् महल में अच्छी जगह देख चतुर्मास के लिए बैठ गये ।


कुछ ही समय के बाद लक्ष्मी जी साध्वी के रूप में उसी महल के सामने आ गई जल के लिए अलख लगाई , लक्ष्मी की आवाज सुनकर सेठ जल का लोटा भरकर बाहर आएं, लक्ष्मी जी को देखा सेठ ने मन में कहने लगे जरूर आज मेरा जीवन धन्य हो गया सुबह वो साधु पधारें, अभी ये साध्वी पधारी, सेठ ने जल का लोटा साध्वी के सामने किया कहां : लिजिए माताजी जल ग्रहण किजिए ! तब


लक्ष्मी जी ने कहां : नहीं सेठ हम किसी ओर के पात्र में जल नहीं पीते, लक्ष्मी जी ने अपनी झोली में हाथ डाल कर एक चांदी की गिलास निकाली और कहां सेठ जल इस भरवा दीजिए, चांदी की गिलास देख सेठ ने सोचा ये साध्वी कोई उच्च स्तर (VIP) की है, लक्ष्मी जी ने पानी पीकर उस चांदी के गिलास को फेंक दिया, 
सेठ ने कहा : हे साध्वी जी ये आपने क्या कर दिया चांदी का गिलास  क्यूं फेंक दिया, 
लक्ष्मी जी : सेठ हम किसी ओर के पात्र का प्रयोग नहीं करते और एक ही बार नये बर्तन का उपयोग करते हैं फिर वह भी हमारे लिए झूठा हो जाता है, इसलिए उसे फेंक देते हैं, Use and throu
सेठ ने कहां : तो क्या ये गिलास में ले सकता हूं !
लक्ष्मी जी : हां सेठ ये बर्तन तुम्हारे काम आ जायेगा, चांदी का गिलास लेकर सेठ अत्यंत प्रसन्न हुआ ।


सेठ ने सोचा महल में भोजन कुछ देर पहले ही बना हुआ है क्यों न साध्वी जी को भी भोजन करवा देते हैं।
सेठ : माताजी आप अंदर चलकर भोजन ग्रहण कर लीजिए,
लक्ष्मी जी : नहीं सेठ हमें बहुत देर हो रही है,
सेठ : माताजी मेरे घर तक पधारें आप दो निवाले ही सही भोजन ग्रहण करोगे तो मेरा भाग्य उदय हो जायेगा ।
लक्ष्मी : चलिए सेठ जब तुम्हारी इतनी इच्छा है तो भोजन कर लेते हैं, सेठ बहुत प्रसन्न हुआ, महल में जाकर साध्वी जी के लिए हलवे के साथ थाल सजाया, थाल देखकर लक्ष्मी जी ने कहां : सेठ मैंने तुम्हें पहले ही कहां है हम किसी और के बर्तन को उपयोग में नहीं लेते,



लक्ष्मी जी ने अपनी झोली में हाथ डालकर एक सोने का थाल निकाला और कहां सेठ भोजन इस थाल में डाल दीजिए, सोने का थाल देख सेठ की आंखें दंग रह गई, लक्ष्मी जी ने भोजन ग्रहण कर उस थाल को फेंक दिया, 
सेठ ने कहां : साध्वी जी ये तो सोने का था,
लक्ष्मी जी : सोने का हो या हीरे का हमारे लिए झूठा हो गया, तुम्हें चाहिए तो तुम ले सकते हो, सेठ सोने का थाल पाकर फुले नहीं समा रहा था ! फिर सेठ ने कहां : माताजी जी आप अब आगे कहां पर जा रहे हो,


लक्ष्मी जी : देख तुम्हारे यहां भोजन ग्रहण कर लिया अब आगे कहीं अच्छे भक्त का मिल जाएं बस चतुर्मास के लिए बैठना है, सेठ ने सोचा यदि ये माताजी जहां भी चार महिने चतुर्मास करेंगी तो हर रोज भोजन करके कितने सोने के थाल फेंकेगी, मेरे घर में जगह बहुत हैं इन साध्वी जी को भी यहीं बिठा दूं तो चार महिने में तो धन ही धन इकट्ठा हो जायेगा ‌।
सेठ ने कहां : माताजी आपको ऐतराज नहीं तो एक बात कहूं ! 
लक्ष्मी जी : हां सेठ बोलो,
सेठ : मेरे घर सुबह एक संत और आएं हुएं चतुर्मास में बैठें हैं यदि आप भी यहीं चतुर्मास कर लो तो मेरा जीवन सफल हो जायेगा ।
लक्ष्मी जी : सेठ मुझे चतुर्मास में तो बैठना ही है लेकिन एक घर में दो लोग चतुर्मास के लिए नहीं बैठ सकते, तुम चाहते हो मैं तुम्हारे घर चार महिने चतुर्मास करूं तो उस संत को निकालना ही होगा, अन्यथा ये मुमकिन नहीं हैं ! सेठ।


सेठ लालच में आ गया ये साध्वी यहां चतुर्मास करेंगी तो धन ही धन इकट्ठा होगा, उस साधु से हमारा कोई फ़ायदा नहीं होगा, लक्ष्मी जी से कहां : माताजी आप बैठिए मैं उस साधु को भेजता हूं ! सेठ ने आकर भगवान विष्णु से कहां : हे महाराज आपको थोड़ी कष्टा होगी, मेरे घर के पास ही मेरे भाई का घर है आप वहां चतुर्मास कर लो मेरे यहां कोई अजीज संत पधारें है,
भगवान विष्णु : सेठ मैंने तुम्हें पहले ही कहां था हम चार महिने तक अपना स्थान नहीं बदलते, अभी तुम अपनी बातों से मुकर रहे हो ।
सेठ : महाराज आपको जाना ही होगा मैं नहीं चाहता आपको जबरदस्ती घर से निकालना पड़े ।



भगवान ने सोचा इसके मन में लालचा का पत्थर बैठ गया है, ये आवेश में आकर पता नहीं क्या करेंगा, 
भगवान ने कहां : वाह सेठ हम कहीं और चले जायेंगे, मगर याद रखना लालच ही सभी से दूरियां बनाता है, मगर सेठ को बस सोने के थाल दिखाई दे रहे थे, आंखों पर लालच की पट्टी बंध चुकी थी ।
बस इतना कहकर भगवान विष्णु वहां से अपने बैकुंठधाम को चल दिएं ! लक्ष्मी जी साध्वी के रूप में उसी महल में भगवान विष्णु की जगह पर बैठ गई ।


उसी रात लक्ष्मी जी महल की दीवार पर कुछ लिखकर भगवान विष्णु के पास बैकुंठधाम पहुंच गये, सुबह सेठ उठे तो देखा वहां साध्वी जी नहीं थें, तब सेठ ने देखा दीवार पर कुछ लिखा हैं ! सेठ ने पढ़ा :
उस सेठ का नाम सुजाराम था,
दीवार पर लिखा था :-

"सुजा" सेजे मिलाया राम किकर सारू तेरो काम ।
तृष्णा कर ने थे दोई गंवाया माया मिली नी राम ॥
 
अर्थ : सुजा (सेठ का नाम) सेजे मिलाया राम यानि भगवान मिले थे तुझे, किकर सारू तेरो काम यानि तुम्हारा काज कैसे सुधारू, तृष्णा कर ने दोई गंवाया यानि लालच में अंधा होकर तुने दोनों को गवां दिया, माया मिली नी राम यानि ना तो माया को प्राप्त कर पाया ना परमात्मा को । भगवान तेरे घर आएं मगर तु पहचान नहीं पाया, लक्ष्मी खुद चलकर आई तब आंखों पर लालच पट्टी बांध ली ।

अंत में भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी जी की बात को सत्य माना इस मृत्युलोक में लोक सिर्फ लक्ष्मी यानि पैसों के पुजारी हैं।


इसलिए मित्रों कभी लालची ना बने, लालच में इंसान सब कुछ खो देता है ‌।
 

Thursday, 24 September 2020

नारद व भगवान विष्णु का संवाद



एक समय नारद मुनि धरती पर (मृत्युलोक) गमन कर रहें थे, एक सेठ के घर जाकर उन्होंने विश्राम किया, सेठ ने नारद मुनि की अच्छी तरह से मेहमानवाजी की ! नारद मुनि बहुत खुश हुए, सेठ के घर किसी बात की कमी नहीं थी मगर उनको कभी संतान की प्राप्ति नहीं हुई सेठ और नारद दोनों के बीच अच्छी मित्रता हो गई,




जब भी नारद मुनि मृत्यु लोक आते तो वे सेठ के घर जाना
नहीं भुलते, एक बार सेठ ने नारद से कहां : आप भगवान विष्णु को जानते हो, इस बात पर नारद को हंसी आ गई तब सेठ ने कहां आप हंस रहे हो मेरी बात पर ।
नारद मुनि : मेरे मित्र तुमने बात ही ऐसी की है मेरी हंसी निकल पड़ी । भगवान विष्णु को मैं नहीं जानता ऐसा कभी हो सकता है, उनके साथ तो मेरा हर रोज का उठना बैठना होता है ।





सेठ ने कहा : अच्छा तो मित्र मेरा एक काम कर दोगे,
नारद मुनि : अवश्य ही काम बताओ ।
सेठ : जब भी आप भगवान विष्णु के पास जाओ तो ये पुछना मेरी किस्मत में संतान का सुख है या नहीं है ।
नारद मुनि :  मित्र चिंता ना करे तुम्हारी बात मै भगवान विष्णु से अवश्य करूंगा, तब सेठ को बहुत खुशी हुई । नारद मुनि वहां से बैकुंठधाम निकल आए आते ही भगवान विष्णु से कहने लगें हे ! नारायण मृत्युलोक में एक सेठ मेरा मित्र हैं उनकी किस्मत में संतान का सुख है भी या नहीं है, भगवान विष्णु ने अन्तर ध्यान करके नारद से कहां आपके मित्र के जीवन में संतान का सुख नहीं लिखा हैं।





एक महिने के बाद पुनः नारद मुनि मृत्युलोक में अपने मित्र सेठ से मिलने आए तब सेठ ने नारद मुनि को देखा वे अति प्रसन्न हुएं ! नारद मुनि ने सेठ से कहां : मित्र मैंने तुम्हारे जीवन के बारे में भगवान विष्णु से पुछा मगर उन्होंने बताया आपके जीवन में संतान का सुख नहीं लिखा है । सेठ का मन थोड़ा सा उदास हुआ और कहां जरुर पिछले जन्म में मैंने अच्छे कर्म ना किए हो ।
नारद मुनि : चिंता ना करें मित्र इस जन्म में अच्छे कर्म करते रहो इसका फल अगले जन्म में अवश्य मिलेगा, इतना कहकर नारद मुनि अपने धाम को लौट आए ।





कुछ महिनों के बाद सेठ और सेठानी रात्रि में अपने घर पर सो रहे थे, किसी फकीर (साधु) ने आवाज लगाई उस (फकीर) साधु को जोर की भुख लगी थी, 1 रोटी देगा उसे 1 पुत्र व दो रोटी देने वाले को 2 पुत्र मिलेंगे, सेठानी ने सेठ से कहां पतिदेव आपने कुछ सुना, सेठ ने कहा हां मैंने सुना मगर यह फकीर भूखा हैं इसलिए वह पुत्र प्राप्ति का लालच दे रहा है जब भगवान विष्णु ने कह दिया हमारे जीवन में संतान का सुख नहीं है, तो इस फकीर की बातों का क्या भरोसा करना ।





फिर भी सेठानी से रहा नहीं गया उसने जाकर फकीर को 2 रोटी लाकर दी, तब उस फकीर ने कहां : जाओ बेटा आज से 9 महीने बाद तुम्हारे घर पर दो पुत्रों का जन्म होगा, सेठानी बहुत खुश हुई, कहते हैं संतों के शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाते । उसी समयानुसार फकीर के आशीर्वाद से सेठ के घर एक साथ 2 पुत्रो का जन्म हुआ, सेठ ने पूरे गांव के लिए दावत रखी, सेठ बहुत खुश थे ।





कुछ दिनों बाद नारद मुनि का मृत्युलोक में आगमन हुआ, जब वे अपने मित्र सेठ के घर पहुंचे तो उन्होंने देखा दो बच्चे पालने में झूल रहे थे, इतना देख नारद मुनि सोच में पड़ गए, सेठ से बिना मिले  ही नारद मुनि भगवान विष्णु के पास गए और भगवान विष्णु से कहां : हे नारायण आपने तो मेरी बेइज्जती करवा दी, 
भगवान विष्णु : ऐसा क्या हुआ मुनिवर जो आप इतना गुस्सा कर रहे हो ।
नारद मुनि : जब मैंने आपसे पूछा मेरे मित्र के जीवन में संतान का सुख है या नहीं आपने कहां नहीं है ! लेकिन मैं इन आंखों से मेरे मित्र के घर दो बच्चों को देखकर आ रहा हूं जब उनके जीवन में संतान का सुख है तो नारायण आपने मुझसे झूठ क्यों कहा । 





भगवान विष्णु को नारद की बात पर हंसना आ गया, भगवान विष्णु ने कहा नारद इसमें कौन सी बड़ी बात है, तुमने सिर्फ बच्चों को देखा हैं ।
नारद मुनि : हां मगर आपने मुझसे झूठ बोलकर मुझे अपने मित्र की नजरों में गिरा दिया तब भगवान विष्णु ने कहा नारद अभी भी हमारे यहां पर तुम्हारे मित्र के जीवन में संतान का सुख नहीं है, यदि तुमने उनके घर पर दो बच्चों को देखा है तो उन पर किसी और की कृपा हुई होगी । कोई हमसे भी बड़े होंगे उन्होंने उनको पुत्र दिए होंगे ।





नारद मुनि : हे ! नारायण इस संसार में आपसे भी बड़ा कौन हो सकता है तब भगवान विष्णु ने कहा नारद भगवान से भी बड़े तपस्वी बहुत है वक्त आने पर मैं तुमको बताऊंगा कि हमसे बड़े कौन है।
इतना सुनकर नारद मुनि वहां से निकल गये ।





एक दिन भगवान विष्णु ने नारद को अपने पास बुलाया और कहा नारद मेरे पेट में जोर से दर्द हो रहा है इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए मुझे जीवित मनुष्य का कलेजा चाहिए, जल्दी जाओ नारद कलेजा ले आओ तब ही मेरा दर्द ठीक होगा, नारद वहां से दौड़कर मृत्यु लोक में आए, सबसे कहने लगे भगवान विष्णु के पेट में दर्द है कोई भी कलेजा निकाल कर दे दीजिए, कलेजा देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था, तब वहीं फकीर पास से होकर निकला नारद की आवाज सुनकर फकीर ने नारद मुनि से कहां मेरा कलेजा ले लो उसी क्षण  फकीर (साधु) ने अपनी झोली से कटार (चाकू) निकाली अपना कलेजा निकाल कर नारद के हाथों में रख दिया ।





फकीर ने कहा : जल्दी जाओ नारद भगवान विष्णु को बहुत दर्द हो रहा होगा, नारद मुनि कलेजा हाथ में लेकर भगवान विष्णु के पास आकर बोले हे ! नारायण ये लो कलेजा किसी फकीर ने अपने हाथो निकाल कर दिया है, तब भगवान विष्णु ने कहा नारद तुमने आने में देर कर दी मेरा पेट दर्द अब ठीक हो गया है, 
नारद मुनि : हे प्रभु अब यह कलेजा कहां रखु ।
भगवान विष्णु : नारद यह कलेजा वापस उस फकीर को दे दो, नारद दौड़कर फकीर के पास आए और कहां महात्मा जी अपना कलेजा यह वापस ले लीजिए भगवान विष्णु का दर्द अब ठीक हो गया है।





 फकीर ने कहा: नारद दिया हुआ दान हम कभी वापस नहीं लेते, जाओ ये कलेजा किसी जानवर को खिला दो, यह सुन नारद हक्के बक्के रह गये, नारद को कुछ समझ नहीं आ रहा था उनके साथ ये सब क्या हो रहा था, नारद मुनि थके हुए भगवान विष्णु के पास आए तब भगवान विष्णु ने कहा: नारद आपको कुछ समझ में आया,
नारद मुनि : नहीं प्रभु, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है।
भगवान विष्णु : याद करो नारद तुमने मुझे कहा था, तुम्हारे मित्र के जीवन में संतान का सुख है या नहीं, मैंने मना कर दिया फिर तुमने अपने मित्र के घर दो बच्चों को देखा था, वो पुत्र किसी और ने नहीं दिए इन्हीं फकीर (साधु) ने दिए हैं ।




भगवान विष्णु : नारद जो बिना परवाह किए अपना कलेजा निकाल कर दे सकता है तो वह पुत्र भी दे सकता है, नारद कलेजा तो तुम्हारे पास भी था, तुम्हें कहीं और जाने की कहां जरूरत थी तुम खुद भी कलेजा निकाल कर दे सकते थे, भगवान विष्णु की बात सुनकर नारद की आंखों में आंसू आ गए । 
भगवान विष्णु : नारद ये जो तपस्वी फकीर (साधु) है इनके वचन कभी व्यर्थ नहीं जाते, तब नारद को सब कुछ समझ आया ।


इसलिए मित्रों सनातन धर्म को मजबुत साधु संतों ने बनाया है,यदि साधु संतो की हम पर कृपा बनी है तब तक भगवान की कृपा हम पर बनी रहेगी ।

Tuesday, 18 August 2020

नारद के गुरु, जीवनी

।। देव ऋषि नारद के गुरु ।।


एक समय नारदमुनि भगवान विष्णु के पास बैठे थे, तो भगवान विष्णु ने नारद को उनके गुरु के बारे में पूछा, तो नारद नारायण की बात सुनते ही हंसने लग गए,भगवान विष्णु ने पूछा हे ! देव ऋषि (नारद) आप हंस क्यों रहे हो, तब नारद ने कहा हे ! नारायण आप मुझे पूछ रहे हो मेरे गुरु कौन है, जब आपको पता है मैं (जगतपिता) ब्रह्मा जी का पुत्र हूं ! मुझे गुरु की क्या जरूरत है, जब मेरे पिताजी ने ही सृष्टि की रचना की है।


भगवान विष्णु ने कहा : - हे देव ऋषि अंधेरे में चलने के लिए रोशनी की जरूरत होती है ठीक उसी प्रकार संसार के प्रत्येक मनुष्य के साथ-साथ देवताओं को भी हर पथ पर गुरु की जरूरत रहती है,यदि आपके गुरु नहीं है तो आपको देवताओं के प्रतिष्ठापन (सभा) में नहीं जाना चाहिए,, 


भगवान विष्णु की यह बात सुन नारद ने कहा हे प्रभु मुझे रास्ता दिखाइए मैं किसको गुरु बनाऊं, भगवान विष्णु ने कहा: देव ऋषि आप प्रभात के समय मृत्यु लोक में जाए सर्वप्रथम जो भी मनुष्य मिले उनको अपना गुरु मान लेना, वहीं आपके सच्चे गुरु कहलायेंगे ।

तब नारद मुनि सुबह जल्दी उठकर मृत्युलोक (धरती) की तरफ बढ़े! तब उनको सबसे पहला मनुष्य एक मछुआरा मिला, जिसका नाम कालूकीर था ! जो व्यापार के लिए आया था, उस मछुआरे को देख नारद के मन में कई सवाल उत्पन्न हो गए । कि इसको गुरु कैसे बनाएं, जब इसका काम भी मछलियों को पकड़ना है, और मैं एक ब्राह्मण हूं ।

तब नारद बिना कुछ सोचे वापस वैकुंठ धाम निकल गए, भगवान विष्णु ने कहा: नारद आप गुरु कर आए, बताओ कौन है आपके गुरु, तब नारद ने कहा: हे ! नारायण मृत्युलोक गया था लेकिन मुझे कोई मिला ही नहीं, तो भगवान ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं कल सुबह जल्दी जाना ।।


नारद फिर दूसरे दिन प्रभात को मृत्युलोक(धरती) पर आएं, अब नारद देखते हैं वहीं मछुआरा उनके सामने आ रहा था, नारद मछुआरे को देखकर वहां से निकल गए,नारद भगवान के पास ना जाकर तीसरे दिन का इंतजार कर रहे थे! जब तीसरे दिन नारद मुनि वापस मृत्युलोक में आए, तो वहीं मछुआरा उनके सामने आया, तो नारद ने सोचा आज इस मछुआरे से बात कर ली जाए,


नारद कुछ बोलने वाले थे, उससे पहले मछुआरे ने देव ऋषि नारद से कहा: हे ! देव ऋषि आप सर्वव्यापी हो,आपको तो होनी और अनहोनी का पता रहता है, आप मुझे बताएं आज 3 दिन हो गए, पता नहीं मैं किसका मुंह देखता हूं थोड़ा सा भी व्यापार नहीं कर पा रहा हूं । 

ऐसा संतो ने कहा है: जिनके गुरु नहीं सुबह उनका मुंह दिख जाए तो पूरा दिन खराब हो जाता है।



यह सुनते ही नारद अंदर ही अंदर पिघलने लग गए, मन में सोच रहे थे 3 दिनों से इनके सामने मैं ही आ रहा हूं। नारद ने पैर पकड़ लिए और कहां हे ! नाथ में ही हूं वह मेरे गुरु नहीं है, आप मुझे शिष्य बना लो, तब कालू कीर (मछुआरे) ने नारद को अपना शिष्य बना लिया, नारद बहुत खुश हुए।


नारद वहां से बैकुंठ धाम निकल गए धाम को गए, भगवान विष्णु ने कहा: हे देव ऋषि आज बहुत खुश लग रहे हो, अब तो आपको गुरु मिल गए होंगे,तब नारद ने मन में सोचा भगवान विष्णु के सामने मेरे गुरु मछुआरे का नाम कैसे ले, तब नारद ने कहा: हे प्रभु मैंने गुरु तो बना लिए पण (- निंदा)


यह निंदा का शब्द सुनते नारद को भगवान विष्णु ने कहा नारद आपने अपने गुरु की निंदा की है, इसलिए आपको चौरासी भुगतनी होगी,(सारे जन्मो का भुगतान करना होगा,84 लाख योनियों में जन्म )चौरासी का नाम सुनते ही नारद की आंखों में आंसू आ गए भगवान विष्णु से कहा: से प्रभु मुझे माफ कर दीजिए अनजाने में मुझसे यह पाप हो गया,,

भगवान ने कहा अब तो शायद आपको आपके गुरु ही इस से मुक्ति दिला सकते हैं, अब नारद दौड़ कर अपने गुरु कालू कीर के पास गए,और सारी बात उनको बताई, तो मित्रों गुरु कभी नहीं चाहता शिष्य दुःखी हो, तब कालूकीर ने नारद से कहा: जाओ भगवान से कहो चौरासी क्या होती है, कैसी होती है, मुझे इस धरती पर चित्र बनाकर बताएं, जब भगवान चित्र बना दे तब नारद तुम उस चित्र के ऊपर लुट जाना, जब तक भगवान कुछ ना बोले तब तक लूटते रहना । 



तब नारद भगवान विष्णु के पास आए भगवान ने कहा: नारद आप चौरासी (84) भुगतने के लिए तैयार हो, तो नारद ने कहा, हे ! नारायण मैंने कभी चौरासी देखी नहीं है यह कैसी होती है मुझे आपके कर कमलों (हाथों) धरती पर चौरासी का चित्र दिखावे, तो भगवान विष्णु ने रेत (जमीन) पर एक हाथी का फोटो बनाया, उस हाथी के आधे भाग में कीड़े तड़प रहे थे, आधा भाग समान था । भगवान विष्णु ने कहा: जहां पर कीड़े लगे हैं यहीं चौरासी है।



तब नारद ने भगवान विष्णु से पुनः पुछा हे ! प्रभु यही चौरासी है, भगवान ने कहा: हां देव ऋषि यही चौरासी है, फिर नारद ने पूछा हे नारायण इसमें और उस चौरासी में कोई फर्क तो नहीं, तब भगवान ने हंसकर कहां: देव ऋषि जी यह भी मेरे हाथ की है वो भी मेरे हाथ की है तो फर्क क्या होगा,तब नारद खुश होकर अपने कपड़े उतार कर उस हाथी के चित्र पर लूटने लगे ।


भगवान विष्णु ने कहा: नारद आप यह क्या कर रहे हो,
 नारद ने कहा हे प्रभु मैं चौरासी का भुगतान रहा हूं, भगवान ने कहा ऐसे कैसे! तब नारद ने कहा हे ! प्रभु आपने कहां इसमें और उस में कोई फर्क नहीं, वह चौरासी आपके हाथ की यह भी आपके हाथ की बनी है ।


तब भगवान विष्णु आश्चर्य में पड़ गए, और नारद से कहा: हे ! मुनिवर आपको यह रास्ता किसने दिखाया, नारद ने कहा: मेरे गुरु ने ! भगवान ने कहा: देव ऋषि आपके इतने अच्छे गुरु है जिन्होंने आपको 1 मिनट में चौरासी का भुगतान करवा दिया, और आपने उनकी निंदा कर दी ।

नारद ने कहा: हे प्रभु अब मुझे पता चल गया है! गुरु हमेशा भगवान होते हैं।

इसलिए मित्रों नारद को कालू कीर गुरु मिले ।।