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Friday, 4 September 2020

संत पीपाजी का भगवान मिलन

पीपाजी महाराज 


पीपाजी का का जन्म 1426 ई. में (चैत्र सुदी पुर्णिमा) को राजपुत परिवार में माता लक्ष्मीवती की कोख से गागरोन गढ़ कोटा (राजस्थान) में हुआ,


गागरोन का राज्य संभालने के साथ-साथ भगवान की भक्ति भी करते थे, (माता के भक्त) एक दिन रामानंद महाराज की सत्संग पीपाजी के गागरोन में हुई,तब पीपाजी रामानंद जी के शिष्य बन गए, पीपाजी का मन राज पाट छोड़ भगवान की भक्ति करने में लग गया, पीपाजी की 1 रानी सीता ने कहां यदि आप भजन करेंगे तो मैं भी आपके साथ भक्ति करना चाहती हूं, पीपाजी ने मन में सोचा एक से भले दो अच्छे ! (आखिर करनी तो हमें भक्ति है), आषाढ़ शुक्ल पुर्णिमा संवत 14सौ ई. में राज-पाट अपने भाई को सौंप दिया ।


माता सीता व पीपाजी दोनों एकांत में एक कुटिया बनाकर भगवान का भजन करने लगे,पीपाजी जी की भक्ति से प्रेरित होकर अनेक संतों का आवागमन उनकी कुटिया पर रहता था, बिना भोजन के पीपाजी किसी को जाने नहीं देते थे, एक दिन पीपाजी घर नहीं थें, 4/5 संतो आना हुआ तब माता सीता ने देखा तो घर में रसोई बनाने का समान भी खत्म हो गया था, माता सीता ने सोचा अगर संत बिना भोजन किये बिना निकल गए ! तो हमारा भक्ति के साथ जीना भी निष्फल है ।



माता सीता एक सेठ की दुकान गई जिसका नाम आरबिया  था (जहां से किराने का सामान आता था) वहां माता सीता ने कहां : सेठजी मेरे घर पर संत पधारें है, कुछ सामान की जरूरत है पीपा जी आते ही सामान का हिसाब दे देंगे, पुराने पैसे बाकी होने के कारण सेठ ने मना कर दिया, माता सीता ने कहा: मेरे पास गिरवी रखने के लिए भी कुछ नहीं है, और संतो को भोजन करवाना है ! (अरबिया) सेठ सीता को देख  उसकी बुद्धि हीन हो गई और सीता से कहां : सामान आपको मिल जाएगा उसके लिए कर्ज चुकाना पड़ेगा,


माता सीता : आप जो बोलोगे वह कर लूंगी,बस संतो को भोजन करवाना जरूरी है, तब सेठ ने कहां: ठीक है तो सामान के बदले आपको एक रात पति पत्नी की तरह मेरे साथ (महल में) रहना पड़ेगा, यह सुनते सीता के पैरों के नीचे से ज़मीन खींचक गई, अब वह करती भी क्या । बस संतो की खुशी के लिए माता सीता ने सेठ से कहां: सेठ मैं वचन देती हूं संतो को विदा करने के बाद में आपके महल आ जाऊंगी, माता सीता घर जाकर संतो को भोजन करवाया, संतो ने माता सीता को प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया,संध्या हो गई थी, रानी सीता अपने वचन के मुताबिक सेठ के घर रवाना हो गई ।


रास्ते में पीपाजी सामने मिल गए, सीता से पुछा: इस समय आप कहां जा रहे हो, सीता ने सारी बात पीपाजी को बताई और कहां : संतो को भोजन करवाने के लिए मैंने आज ये बदन (काया) गिरवी रख दिया, पीपाजी ने शांत भाव से कहां कोई बात नहीं साधु संत भोजन पाकर गए ये हमारे लिए खुशी की बात है, आइये रात्रि का समय है मैं आपको सेठ के घर तक छोड़ देता हूं, सेठ के महल के आगे जाकर पीपाजी ने आवाज लगाई आरबिया सेठ ये मेरी रानी बाहर खड़ी है दरवाजा खोले ।


पीपाजी की आवाज सुनकर सेठ थर थर कांपने लगा, गागरोन के राजा आज उनकी पत्नी के वचनों को निभाने के लिए इतने निर्मम हो गए हे ! भगवान मेरी बुद्धि हीन कैसे हो गई, बस यह कहकर पीपाजी कुटिया को निकल गये, सेठ एक चुनडी़ (ओढ़नी) लेकर बाहर आया और सीता के पैरों में गिर पड़ा, बहन मुझे माफ़ कर दो, मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी ।


रानी को चुनडी़ ओढ़ाकर वापस सेठ (आरबिया) सीता को लेकर पीपाजी की कुटिया पर गया और पीपाजी को आवाज लगाई बहनोई सा (बहन का भाई) आज से ये मेरी बहन है, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिन्दा हूं । पीपाजी सुनकर बहुत खुश हुए और भगवान से कहां हे ! प्रभु मुझे आप पर पुर्ण विश्वास था,आप कुछ ऐसा ही करोंगे ।

तब पीपाजी ने लिखा: 

पीपा परमेश्वर तणा मता नहीं जाणे कोय ।

आरबिया ऊंबा रेगा हरि करें जकी होय ।।

अर्थ:     

             पीपाजी ने भगवान से कहां आपकी पहचान हर कोई नहीं कर सकता,आरबिया जैसे लोग हर जगह हैं लेकिन वहां जो परमात्मा चाहे वहीं होता है ।