Showing posts with label सायब कबीर जी. Show all posts
Showing posts with label सायब कबीर जी. Show all posts

Tuesday, 15 September 2020

कबीर जी का भगवान से मिलन

कबीर जी काशी में हर रोज भगवान का भजन करते थें, उठते बैठते भगवान का सुमिरन अपने मुख से करते रहते थे ! सुमिरन के साथ सत्संग करना भी उन्हें अच्छा लगता था, जब भी उनसे मिलने कोई आता कबीर जी उनके साथ रात में ही प्रभु की सत्संग शुरू कर देते, आस पास के लोगों को अच्छा नहीं लगा (लोगों को निंद लेने बाधा उत्पन्न होने लगी)।


तब सभी ने मिलकर सोचा आखिर हम कबीर जी को कैसे कहें कि तुम्हारी सत्संग से हमें परेशानी होती है, किसी ने कहां कुछ ऐसा करें कि कबीर जी खुद ये गांव छोड़ दूर चले जाएं, गांव के कुछ लोगों ने मिलकर एक तरकीब निकाली कि जिवित भंडारे के आमंत्रण पत्र छपवा कर सारे संतों के भिजवा देते हैं, जब बड़े बड़े साधु संतो का आगमन यहां होगा तो कबीर लज्जा के कारण काशी छोड़ कर चले जाएंगे ।



लोगों ने तारीख के साथ आमंत्रण पत्र छपवाकर कबीर जी के दस्तखत कर दिए, वे पत्र हर जगह के साधु संतों को भिजवा दिए ! काशी में कबीर जी भक्त हैं इस नाम को सभी जानते थे लेकिन मिलना-जुलना कम ही होता था, कुछ दिनों के बाद भंडारे की तारीख के साथ संत काशी में आने लगे, इधर कबीर भिक्षा के लिए घर से बाहर निकले कबीर जी ने देखा आज इतने संत एक साथ कहां जा रहे हैं, कबीर ने पास में जाकर एक संत से पुछा: आज सारे साधु संत मिलकर कहां जा रहे हो, तब उस संत ने कहां: इसी काशी में एक भक्त कबीर है जिन्होंने जिवित भंडारे का निमंत्रण हम सब को दिया हैं उन्हीं के घर जा रहे हैं।



संत की बात पर कबीर जी आश्चर्य में पड़ गएं कबीर जी को संत की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! तब संत ने कबीरजी को वह आमंत्रण पत्र दिखाया, कबीर जी ने जब उस पत्र (कुंकुपत्री) को देखा तो बिना कुछ कहे कबीरजी घर से दुर निकल गये, आंखों से आंसूओं की धारा बह रही थी,उनको समझ नहीं आ रहा था ये किसने और क्यूं किया ‌।
कबीर जी ने भगवान से कहां हे प्रभु मैं नहीं जानता मेरे साथ ऐसा किसने किया, इतने साधु संतों को भोजन करवाने के लिए घर में अन का एक दाणा नहीं है ! मेरा कोई भाई भी नहीं जो मुझे आकर धीरज बंधाए, यदि मैंने सच्ची भावना से भक्ति की हैं तो मेरा लाज रख लो, कबीर जी ने कहां: या तो मेरा काम सुधारों नहीं तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा ।

दोहा (कथनी)-

आप कबीर जी केवण लागा, सुण लिजो रघुवीर ।

या तो मेरा काज सुधारों, नहीं तो तज दूं शरीर ।।


 जब कबीर जी की आवाज़ भगवान के कानों तक पहुंची ।

दोहा (कथनी)- 

मथुरा नगरी में बैठे कृष्ण, सुण लीनी तजवीर ।

मेवा और मिठाई भरने, कर लीनी बालद विर ।।


भगवान कृष्ण तरह तरह के भोजन को रथ (बालद) में भरकर मथुरा से काशी को रवाना हो गये, काशी पहुंचते ही भगवान ने कबीर का स्वरुप बना लिया, कबीर जी के घर जा पहुंचे अब भगवान खुद कबीर के स्वरुप में संतो की सेवा करने लग गए,जब भोजन का समय हुआ तब भगवान ने सारे संतों को एक साथ पंगत में बैठाया और भोजन करवाया, संत कबीर जी के घर आदर भाव देखकर बहुत प्रसन्न हुए ।


दोहा (कथनी)-

मेवा ने मिठाई जिमावे और जिमावे खीर ।

दौड़ घर को आया कबीर नैणे आयो नीर ।।

भोजन करने के बाद सभी साधु संत कबीर जी की खुब तारीफ की, ऐसा कहां जाता है साधु संतों के भंडारे शंख व नगारे बजाएं जाते हैं,जैसे ही साधु संतों ने शंख व नगारे बजाएं, कबीर जी के कानों में आवाज़ पहुंची कबीर जी दौड़कर अपने घर को आएं तो उन्होंने देखा एक कबीर संतो की सेवा में खड़ा हैं। कबीर जी ने जब अपने ध्यान करके भगवान को देखा उनकी आंखों में आंसू आ गएं, भगवान ने आकर कबीर जी के आंसू पोंछे और कहां: अब रोना बंद करो अब तुम भी भोजन करो, फिर साधु संतों को भेंट देकर विदाई दो ।




कथनी :-

काशी में जात जलावे, निर्गुण भक्ति चलाई ।

प्रेम काज हरि आ गया, बालद लान ढलाई ।।








Tuesday, 1 September 2020

आए थे हरि भजन को (कबीर कहावत)

"आए थें हरि भजन को ओटन लगे कपास"



साहेब कबीर युवा अवस्था में ही ईश्वर की ओर झुक गए, ना चाहते हुए भी कबीर को पारिवारिक बंधन में बंधना पड़ा, जब पारिवारिक बंधन में बंध ही गए तो दुनिया से विमुख कैसे हो पाते,, अतः वे अपनी गृहस्थी चलाने के लिए काम करने लगे ! मजदूर की तरह सुबह से शाम तक काम में लगे रहते थे, कुछ दिन बाद कबीर पक्के जुलाहे (बुनने वाला) बन गए थे, धीरे-धीरे कबीर ने घर पर ही कपड़े बुनने का काम शुरू कर दिया, पुरा दिन कपड़े की बुनाई (काम) में चला जाता था ।



प्रभु भक्ति के लिए समय ना मिलने पर अपने हृदय में परमात्मा को दिन भर याद करते रहते थे, एक दिन कबीर ने निश्चय कर लिया आज से कुछ दिन काम करेंगे कुछ दिन परमात्मा की सत्संग में भरेंगे, ऐसे ही कबीर का जीवन चलता रहा, (साहेब कबीर गृहस्थी होते हुए संत थे संत होते हुए गृहस्थी थे) फिर उनके घर कमाल और कमाली का जन्म हुआ ! तब वे जरुरतों के मुताबिक काम में और समय देने लगे, अब कबीर रोज सुबह उठकर कपास से सुत, सुत से धागा, धागे पूनी आदि बनाने में शाम तक लगे रहते, काम की वजह से कबीर सत्संग में नहीं जा पाते थे संतो से मिलना-जुलना कम हो गया ।




अधिकतर साधु संत उनकी साधना व उनके जीवन को भली भांति जानते थे, तब साधु संत खुद कबीर से मिलने उनके घर आने लगे, एक बार कबीर का 1 प्रिय साथी व और भी संत उनके घर आएं, जब वे कबीर की कुटिया के पास पहुंचे ! उन्होंने देखा कबीर बुनाई के काम में लगे हुए हैं, कुछ धीरे-धीरे गुनगुनाए जा रहे थे, वे कबीर को बस देखते रहे, जब कबीर की नज़र उन पर पड़ी तो कबीर कह उठे आओ संत गण ! बैठो, वे संत फिर भी कबीर को एकटक देख रहे थें ।


कबीर ने कहा: क्या सोच रहे हो..?  
उनमें से 1 संत ने कबीर कहा: आएं थे हरि भजन को ओटन लगे कपास, कबीर ने जब सुना तो मुस्कुरा दिए, तब से ये कहावत लोकप्रिय हो गई ।

अर्थ:- 

वांछित कार्य को छोड़कर, किसी अन्य कार्य में लग जाना ।