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Thursday, 10 September 2020

राजा गोपीचंद का जीवन


नवीं शताब्दी में राजा त्रिलोकचंद घाटा बंगाला का राज करते  थें, राजा त्रिलोकचंद की पत्नी का नाम मैणावती था जो राजा भर्तृहरि की बहन थी,बंका पहाड़ों में जोगी जालंधर नाथ जी तपस्या कर रहे थे,एक दिन नाथ जी ने अपने शिष्य से कहां: बेटा ये मेरी झारी (पात्र) लेके जाओ जल्दी जल भरकर ले आओ ।


किसी तलाब से लाना मत, कहीं खड्डे में पड़ा भी लाना मत, नदी से मत लाना, किसी समुद्र से भी मत लाना, कुएं से मत लाना, मटके का भी मत लाना, किसी से मांगकर मत लाना, और खाली हाथ भी मत आना । शिष्य ने कहां हे प्रभु अब ये झारी (पात्र) कहां से और कैसे भरकर लाऊं,


 नाथजी ने कहां:
                                जाओ घाटा बंगाला में राजा त्रिलोकचंद उनकी अर्द्धांगिनी के हाथों से ये झारी भरके आ जाओ, शिष्य त्रिलोकचंद के महल (घाटा बंगाला) जाकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई, साधु को देख रानी मैणावती ने नमस्कार किया,, शिष्य ने कहां हे ! देवी ये पात्र मुझे जल से भरवा दीजिए मुझे आगे संतो के समागम में जाना है, रानी मैणावती ने मन में सोचा ये साधु जल मांग रहा हैं और क्यूं ना इनका पात्र में दुध से भर दूं ! रानी मैणावती दुध लाकर साधु (शिष्य) के पात्र में डाला मगर पात्र में दुध कम पड़ गया, रानी ने फिर से दुध लाकर पात्र (झारी) में डाला मगर वह पात्र भरा नहीं, तब मैणावती ने कहां महाराज आप साधु नहीं कोई जादुगर हो,तब उस शिष्य ने कहा: नहीं माता मैं अपने गुरुजी के लिए जल लेने आया हूं !



मैणावती रानी ने कहां: चलिए मुझे भी आपके गुरुजी के दर्शन करवा दीजिए ! शिष्य व रानी मैणावती वंका पहाड़ी में पहुंचे, रानी मैणावती ने जालंधरनाथ जी को देख नमन किया, जालंधरनाथ जी ने कहां मांगों बेटा तुम्हे क्या चाहिए, रानी मैणावती ने कहां हे ! प्रभु पुत्र के बिना मेरी कोख सुनी हैं, नाथजी महाराज खुश ने आशीर्वाद दिया और कहां बेटा तुम सत्यवती हो जहां सत्य होता है वहां ब्रह्म होते हैं जहां ब्रह्म वहां हम ! निसंकोच रहो तुम्हारी मुराद भगवान जल्द पूरी करेंगें ।


कुछ वर्षो में ही राजा त्रिलोकचंद के घर रानी मैणावती की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ,जिनका नाम गोपीचंद था, नगर (शहर) में ढिंढोरा पिटवा कर राजा के घर पुत्र प्राप्ति की दावत रखीं, एक रात रानी मैणावती ने त्रिलोकचंद से कहां: स्वामी कल सुबह ही हम और आप बंका पहाड़ जाएंगे जालंधरनाथ जी के आशिर्वाद से हमारे निजी जीवन में खुशियों की बौछार हैं,


अगले ही दिन राजा त्रिलोकचंद अपने पुत्र गोपीचंद व रानी मैणावती के साथ जलंधरनाथ जी के आश्रम में पहुंच गए, राजा व रानी ने दंडवत नमस्कार किया, पुत्र को देख नाथजी को अति प्रसन्नता हुई,फिर अचानक जलंधरनाथ जी का चेहरे पर उदासी छा गई, राजा त्रिलोकचंद ने जब उनकी उदासी का कारण पुछा: तो जलंधरनाथ जी ने कहां: भगवान शिव की कृपा से तुम दोनों की इच्छा पुर्ति से मैं स्वयं बहुत खुश हूं परन्तु...........


राजा त्रिलोकचंद ने कहां: हे ! ऋषिराज परंतु क्या,
जालंधरनाथ जी ने कहा: राजन् आपके जीवन में इस बालक का साथ 18 वर्ष तक का ही हैं, वर्ष के अंत में बालक भगवान को प्यारा हो जायेंगा, ये सुन रानी मैणावती के होश उड़ गए, रोती बिलखती हुई रानी नाथजी के चरणों में आ गिरी , हे ! प्रभु ये कैसा इंसाफ है खुशियों की झोली भरकर सारी खुशियां छीन लेना ।
जलंधरनाथ जी ने कहा: बेटी विधी (विधाता) का लिखा कोई पलट नहीं सकता, मैं एक पंथ (रास्ता)बता सकता हूं मगर उस पथ से कभी विचलित मत होना ।


जलंधरनाथ जी ने कहां: ये बालक 17 वर्ष के बाद यदि आप दोनों की भक्ति व अच्छे कर्मों के फल से जोगी (साधु) बन जाएं तो भगवान शिव की कृपा इस बालक पर हो सकती है, जोगी बनने पर वह सिर्फ आपका नहीं परमात्मा का पुत्र बन जायेगा, फिर उसकी फ्रिक आपको नहीं परमात्मा को हैं ! लेकिन याद रखना जोग तो भोगना ही पड़ेगा ।

मैणावती ने रोते हुए वचन दिया कहा : मैं गोपीचंद की माता मैणावती मेरे भरतार व साधु संतों के समक्ष ये वचन देती हूं मैं अपने पुत्र को जोगी बनाऊंगी,राजा त्रिलोकचंद व रानी मैणावती ने जलंधरनाथ जी का आशीर्वाद प्राप्त कर अपने महल को आ गए, भगवान शिव की आराधना के साथ अपना जीवन व्यापन करने लगें, प्रतिदिन रानी मैणावती व राजा अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करते रहे, समय निकलता गया गोपीचंद जब 14 वर्ष के हुए तब उनके पिता त्रिलोकचंद ने सोचा क्यूं न अपने पुत्र की शादी कर देता हूं इस माया में पड़ जाने के बाद वह जोगी (साधु) नहीं बनेगा, (मौत ही मेरे पुत्र की किस्मत है तो इसे कोई टाल नहीं सकता) ।


राजा त्रिलोकचंद ने अपने पुत्र गोपीचंद की शादी 16 रानियों से करवा दी, कुछ ही महीनों बाद राजा त्रिलोकचंद देवलोक गमन कर गए,राज को संभालने के साथ राजा गोपीचंद अपना गृहस्थ जीवन व्यापन करने लगे, माता मैणावती को बहुत दुःख हो रहा था, (जालंधरनाथ के वचन अनुसार गोपीचंद को 18वे वर्ष में जोगी बनाकर भक्ति के रास्ते भेजना होगा) ।
एक दिन राजा गोपीचंद सोने की बनी कुंडी में स्नान कर रहे थें, ऊपर महल से माता मैणावती ने गोपीचंद को देखा उनकी आंखों के आंसू गोपीचंद की पीठ पर गिरे,,


कहते हैं: दुःख के आंसू गरम व खुशी के आंसू ठंडे होते हैं, गोपीचंद ने अपनी माता को रोते देख, गोपीचंद अपनी माता के पास आए और दुःखी होने का कारण पुछा ! तब माता मैणावती ने सारी बात राजा गोपीचंद को बताई और कहां: बेटा तुम्हारे पिताजी की तरह हम सबको एक दिन चले जाना है, लेकिन जालंधरनाथ जी के वचन मुताबिक अभी तुम 18 वर्ष के हो चुके हों ।


उसी क्षण राजा गोपीचंद ने अपनी माता को नमन करके जोगी बनकर भगवान की भक्ति करने का वचन दिया ! जब यह खबर इस पास में फैली सारी नगरी के लोग राजा गोपीचंद के ना जाने को कह रहे थें, लेकिन राजा गोपीचंद को सिर्फ जोगी का वेश पहनकर अपनी माता के चरण छुए तब मैणावती ने गोपीचंद को 3 बातें बताई :
1. ऊंचे से ऊंचे कोर्ट (क़िले) में रहना ।
2. सदैव स्वादिष्ट भोजन करना ।
राजा गोपीचंद ने कहा: माता ये सब सुख यहां हैं ! वहां कैसे मिल सकता है।
मैणावती ने कहां: पुत्र ये सिर्फ दिखावे का सुख है,संतो के साथ हमेशा सत्संग में रहना ये सबसे बड़ा कोर्ट (क़िला) है,भुख लगे तो ही भोजन करना तुम्हें हर भोजन स्वादिष्ट लगेगा, माता का आशीर्वाद लेकर जालंधरनाथ जी को गुरु बनानें के लिए निकल पड़े, जालंधरनाथ को गुरु बनाकर भक्ति में लीन हो गए भक्ति करते-करते गोपीचंद उज्जैन पहुंचे, उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे अपने मामा राजा भर्तृहरि के पास अलग धुणा बनाकर तपस्या की ।

दोहा:

गोपीचंद जोगी भया लीना भगवा बाना ।

राज पाठ छोड़ घर घर अलख जगाना ।।