एक इंसान (अभिमानी) बाहर से घर को निकला,आगे से दो रास्ते उसके घर कि और जा रहे थे! एक शमशान के अंदर से एक जंगल कि तरफ से,
उसने मन में सोचा मैं डरने वाला किसी से नही, श्मशान से होकर निकला!
उसको शमशान ने पड़ी जली हुई हड्डी कि ठोकर लगी,तब वह हड्डी दूर जाकर गिरी और बोलने लगी, उसने सोचा यहॉ बोल कौन रहा है ! उस हड्डी के बयान थे:
दोहा:
"घर से निकले जंगल मन में कुछ अरमान थे।
एक तरफ जंगल दुसरी ओर शमशान थे ।।
चलते हुए हड्डी कि ठोकर लगी उस हड्डी के ये बयान थे,
चलने वाले थोड़ा सम्भल कर चल।
कभी हम भी तो इंसान थे ॥
हे ! मानव (इंसान) थोड़ा सम्भल कर चल हम भी तेरी तरह किसी से नही डरते थे, यहां मिट्टी मे मिल गये, तुझे भी एक दिन यही जलाया जायेगा ।
दोहा:
मंजिल तो सबकी यहीं (श्मसान)है,
बस थोड़ा समय लगेगा यहां आते आते ।
अरे क्या देगी ये दुनिया तुझे ! देखना
अपने ही जला देंगे तुझे जाते जाते ।।
इसलिए मित्रो कभी इंसान को किसी भी बात का अभिमान नही करना चाहिएं ।
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दोहे लिरिक्स! दादूदयाल के,रैदासजी, डुंगरपूरीजी चौहटन ,ईशवरदास भादेसर,रामदासजी खेड़ापा,
और अनेको अनेक संतो के प्राचीनतम विचार धाराए ।

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