Thursday, 17 September 2020

रानी रूपादे व रावल मालदे का जीवन

सती रूपादे का जन्म १४०९  ई. स. राजस्थान के बाड़मेर जिले के दुधवा गांव में ठाकुर बद्रीजी बाला के घर हुआ था, रूपादे के गुरू उगमजी थें, रूपादे के द्वारा अनेक कथित भजनों को आज मारवाड़ में खूब गाया जाता हैं ।



रूपादे को बचपन से ही सत्संग के साथ भगवान की भक्ति करना अच्छा लगता था, इसके लिए वे अपने धर्म के भाई धारू मेघ के साथ सत्संग (कीर्तन) में जाया करते थे, बाद में रूपादे का विवाह दुधवा के पास गांव मेवानगर के शासक रावल मालदे से हो गया,(मालदे का जन्म राजस्थान में बाडमेर जिले के गोपड़ी गाांव में हुआ था) ,।  मारवाड़ में उनका प्रचलित नाम मालजी था, रूपादे ने विवाह में अपने धर्म भाई धारु मेघ को साथ में मांग लिया था ! ताकि वे हर सुख दुःख में मन की बात धारू से कर सकें, मालजी ने धारू को मेवानगर में ही अपने महल के कुछ दूरी पर रहने की मंजूरी दे दी थी ।



रावल मालदे अतिक्रोधी व टेढ़े स्वभाव के थें ! रावल मालदे की 2 पत्निया थी रानी चंद्रावल व रानी रूपादे, मालजी रूपादे से अतिप्रेम करते थें, मालजी का रूपादेय से अतिप्रेम चंद्रावल को रास नहीं आता था, विवाह के बाद रावल मालदे का स्वभाव को देख रूपादे कभी कीर्तन में नहीं गये । 
एक बार गुरु उगमजी के सानिध्य में धारू मेघ (धर्म भाई) के घर सत्संग रखी गईं तब उगमजी ने धारू से कहा : आज इस सत्संग में रूपादे को बुलाया जाएं तो सत्संग की शोभा और भी बढ़ जायेगी ।




धारू ने कहा : विवाह के बाद उनको कभी किसी सत्संग में नहीं देखा, मालजी के टेढ़े स्वभाव के कारण सती रूपादे कीर्तन में जाना छोड़ ही दिया है,
                  उगमजी ने कहा : नहीं धारू सती सत्संग में आ जाएं तो अच्छा है नहीं आ पाएंगे तो भी तुम्हारा ये फर्ज बनता हैं कि तुम खुद जाकर सती रूपादे को वायक (निमंत्रण) दो ।
गुरू के आदेश पर धारू रूपादे के पास आया और अपने घर सत्संग में आने का निमंत्रण दिया, रूपादे ने कहां : मेरे भाई तुझे सब पता है मैं सत्संग में नहीं आ सकती फिर भी यहां आने का कष्ट क्यूं उठाया, धारू ने कहां : बहन मुझे सब पता है मगर गुरुदेव के बार-बार कहने पर मुझे यहां आना पड़ा । 
इस पर संतों ने भी लिखा है :

रूपा रावल मालदे इण मालाणी   रे माय ।

रूपा भजन करें पर रावल करण दे नाय ॥




रूपादे ने कहां : हमारे गुरू को मेरा प्रणाम कहना, और सत्संग में न आने की माफ़ी चाहती हूं ठीक बहन मगर आपको थोड़ा सा भी टाइम मिले तो गुरु के दर्शन करने जरुर आ जाना बस इतना कहकर धारू अपने घर लौट आया,आते ही सारी बात गुरु उगमजी को बता दी ।
इधर रूपादे ने मन में सोचा कभी गुरुदेव के आदेश को टाला नहीं यदि कुछ देर ही सही सत्संग में जाकर आ जाऊं तो गुरु के दर्शन भी हो जायेंगे सभी को खुशी भी होगी, रूपादे ने रात्रि में अपने दुसरे धर्म भाई तक्षक नाग को याद किया, तक्षक नाग हाजिर हो गया ।



(एक समय रूपादे अपनी सहेलियों के साथ घुम रही थी, रास्ते में एक बड़ा सांप शरीर में कांटा लग जाने से तड़प रहा था, रूपादे ने बिना डरे उस नाग के शरीर से कांटा निकाल उसकी पीड़ा दुर की, तब नाग ने कहां  ! आज से तु मेरी बहन जब भी अपने भाई की जरूरत पड़े याद करना मैं तुरंत हाजिर हो जाऊंगा) 





नाग ने कहां : बहन बहुत दिनों बाद आज मुझे याद किया ।
सती ने कहां : मुझे कुछ नहीं तुम्हारी थोड़ी सी मदद चाहिए ! मैं आज गुरुदेव के दर्शन करने अपने भाई घारू के यहां जा रही हूं जल्दी लौट आऊंगी तब तक तुझे मेरी सैज (पलंग) पर कंबल ओढ़ कर सोना होगा, ताकि मालजी को लगेगा मैं यहीं महल में सो रहीं हूं सती ने नाग को पलंग पर सुलाया और कंबल ओढ़ा दी और कहां : मैं ना लौट आऊं तब तक हिलना डुलना भी मत ।




इतना कर रुपादेय सत्संग को रवाना हो गई ! सत्संग में जाकर पहले रूपादे ने गुरुदेव का आशिर्वाद लिया, विवाह के बाद सती को फिर सत्संग में देख सभी को प्रसन्नता हुई, उगमजी व धारू सती को देख अत्यधिक खुश हुएं, कुछ देर ठहरने के बाद सती रूपादे ने गुरु से कहां अब मुझे इजाजत दीजिए ।
                         उगमजी (गुरू) ने कहां : इतने दिनों बाद आये हो २/४ भजन सुनाओं ऐसी सभी की इच्छा है।
सती ने कहां : गुरुदेव मैं अपने पति से छुपकर इस सत्संग में आई हूं मुझे जल्द ही महल में जाना होगा ‌।
उगमजी ने कहां : आप घबराइए मत आपके आधीन भगवान खुद खड़े हैं, एक भजन तो आपको सुनाना ही होगा ।




गुरुदेव के बार-बार कहने पर रुपादे ने वीणा (वाद्य यंत्र) हाथ में लिया और भजन शुरु किया, रूपादे की आवाज महल में सो रही रानी चंद्रावली के कानों तक पहुंची, झट से उठकर चंद्रावल खड़ी हो गई और अपनी दासी (गोमली) से कहां : जहां से यह आवाज आ रहीं हैं वहां रुपादे बैठी है या नहीं पता करके आओ, दासी सत्संग के बाहर छुपकर रुपादे को देखा दौड़कर आई और यह बात चंद्रावल को बताई, तब चंद्रावल ने गहरी निंद्रा में सो रहे रावल मालदे को जगाया और कड़वे शब्दों में कहां : आप अपने आपको ठाकुर कहते हैं आपकी रानी रूपादे महल से बाहर हैं, रावल मालदे की आंख खुली चंद्रावल से कहां अगर ये बात झूठ निकली तो ! चंद्रावल ने फिर कहां अगर मेरी बात झूठ निकले तो मेरा सर कलम कर दे देना ।



रावल मालदे झट से उठे चंद्रावल की बातों पर आग बबूला हो गए, रावल मालदे हाथ में दीपक का उजाला करके रूपादे के कमरें में जा पहुंचे, रावल मालदे ने चंद्रावल से कहां देखो रूपा सो रहीं हैं चंद्रावल ने जैसे ही चादर को हटाया तक्षक नाग (फन गुराता हुआ) खड़ा हो गया, नाग को देख चंद्रावल और रावल मालदे कमरे से बाहर आ गिरे, मालजी और भी क्रोधित हो गए, अपने हलकारो से कहां जाओ गांव की हर गली में खड़े हो जाओ जहां भी रूपादे दिखे उसका मस्तक काट कर ले आओ, रावल मालदे गांव की हर गली व मोड़ पर हलकारों को खड़ा कर दिया, रावल मालदे स्वयं घुड़सवार होकर गांव के बीच हाथ में तलवार लिए खड़े हो गये, रावल माल ने सोचा सिर्फ चंद्रावल के कहने पर मैं ये सब कर रहा हूं क्यो न अपने एक आदमी को भेजकर पता करवाया जाएं ।




उस दरबार में वर्षो से काम करने वाला नाई (विलू) को बुलाया रावल मालदे ने उसे धारू के घर पता करने भेजा, जब वह विलू धारू के घर पहुंचा रूपादे महल वापसी को रवाना हो रहीं थीं, तब वह वहां से रूपादे की एक पैर की मोजड़ी को बगल में रखकर भागा भागा रावल मालदे के पास आया,
 रावल मालदे : क्या देखा तुमने, खबर पक्की लाएं हो,
विलू : हुजूर इन आंखों से देख आया हूं रूपादे हाथ में प्रसाद का थाल लेकर महल को लौट रही है और उनकी एक सबूत चुराकर ले आया हूं ।



रावल मालदे : अच्छा हमें दिखाओ ! जब विलू ने बगल की मोजड़ी निकालने के लिए अपना हाथ ऊपर किया, वहां से मोजड़ी विलुप्त हो गई व नई बीमारी का जन्म हो गया जिसे मारवाड़ी भाषा में खागोलाई (खागबलाई) कहते हैं अपने बगल में गोल आकार का दडा़ देख विलू नाई हक्का बक्का रह गया ।   [ इसका इलाज रूपादे के उस स्थान पर होता है जहां से वह अपने पति को लेकर स्वर्ग सिधाये थे, यदि किसी व्यक्ति की बगल में ये बीमारी हो जाएं तो तिलवाड़ा और जसोल के बीच रूपादे का स्थान (रूपादे-पालिया) है वहां जाकर एक नारियल व थोड़ा सा गुड़ रखने पर ये बीमारी जड़ से खत्म हो जाती हैं, यहीं साक्षात चमत्कार हैं ] ।





उधर से रूपादे अपने गुरुजी के चरण स्पर्श कर थाल लेकर रवाना हो गई, गुरुदेव उगमजी ने कहां: चिंतित ना हो मालजी से कह देना हम आपके लिए फुल लेने गए थे ! रूपादे सती अंतर मन से ध्यान करके देखती है मालजी को पता चल चुका है और गली-गली में उनके सिपाई खड़े हैं, तब उन्होंने सोचा यदि मालजी के सामने जाकर खड़ी हो जाऊं तो मेरा सर कांट देंगे तो भी मुझे इसका दुःख नहीं होगा ! वो मेरे पति (परमेश्वर) है ।



रूपादे कपड़े से ढका हुआ प्रसाद का थाल हाथ लेकर रावल मालदे के सामने आकर खड़े हो गए, रुपादे को देख मालजी ने कहां: आप एक राजघराने की रानी हो इतनी रात को महल से बाहर जाना हमारी नाक कटने जैसा है, ऐसी कौनसी जरूरत आन पड़ी जो आपको इस समय महल छोड़ बाहर जाना पड़ा ।
रुपादे ने कहां : पतिदेव हम अपने लिए नहीं आपकी सेवा के लिए फुल लेने बाग (बग़ीचे) में गये थें, उस समय में मेवानगर के नजदीक किसी गांव में एक भी बाग नहीं था, एकमात्र बाग मंडोर (जोधपुर) में वह भी बहुत दूर था, वहां तक जाने के लिए सुबह से शाम लग जाती थी । इसलिए......




रावल मालदे ने रूपादे से कहां आप झूठ बोल रहे हो, जब नजदीक में एक भी बगीचा नहीं हैं ! अकेले दूर जाकर आ नहीं सकते, फिर फुल कौनसे बाग में लेने गये थें, रूपादे मन ही मन अपने भगवान को याद कर रहीं थीं, जब रावल मालदे ने प्रसाद के ऊपर लगे कपड़े को तलवार से हटाया, उनकी आंखे फटी की फटी रह गई उस प्रसाद के थाल में भगवान ने फूलों का बगीचा सज़ा लिया । हर प्रकार के फुल देख रावल माल खुद मोम की तरह पिघल गए, एक क्षण के लिए उनके मुंह पर चुप्पी छा गई उनको महसूस होने लग गया, रुपादे के रक्षक भगवान खुद हैं,  रावल मालदे घोड़े से निचे उतरकर रुपादे को नमन किया और कहां हे ! सती आपने अपना जीवन प्रभु की भक्ति से जोड़ा तभी आज प्रभु ने आपका साथ दिया,  मैंने अपना जीवन सिर्फ अभिमान में गवां दिया इसलिए आज मैं झूठा साबित हो गया ।




रावल मालदे ने रूपादे से कहां : मैं सब कुछ छोड़ कर इसी मार्ग को अपनाना चाहता हूं ! मुझे भी ये रास्ता (भक्ति का) दिखा दीजिए । सती ने कहां : पतिदेव इस रास्ते के लिए मुझे गुरुदेव की आज्ञा लेनी होगी, रूपादे ने अपने पति को वचन दिया उनको भक्ति करने का अवसर जरुर मिल जायेगा,,
                 अगले दिन सती रूपादे ने जाकर गुरुदेव उगमजी से कहां :हे ! गुरुवर मालजी की इच्छा हैं वो हमारे साथ सत्संग करके अपने जीवन को सुधारना चाहते हैं, रावल मालदे का नाम सुनते ही उगमजी ने कहां : देखो सती (रूपादे) सत्संग करना आसान है भक्ति करना बहुत कठिन है, मालजी ने तो अपने जीवन में किसी मारना पीटना ऐसे काम किए हैं वो भक्ति नहीं कर सकते,




रूपादे ने कहां : हे ! प्रभु मैंने उनको वचन दिया हैं, मुझे पता है मेरे पति लोहे के समान है उनमें निवण पद के गुण नहीं हैं मगर प्रत्येक मनुष्य का उद्धार संतो की सत्संग से ही हुआ हैं, अपनी शिष्या रूपादे के सामने देख इस लोहे को सोना बना दीजिए ।
गुरु उगमजी ने रूपादे से कहां : ठीक है तो रावल मालदे से जाकर यह कह दो, यदि भक्ति का रास्ता अपनाना चाहते हो पहले उस गाय को मारना होगा जिनका दुध वे हर रोज पीते हैं, दुसरा जो दहेज में मिला घोड़ा (हंसा) उसे मारो, फिर रानी चंद्रावल को मार देंगे तो इस भक्ति के रास्ते में आपको ले लिया जायेगा, जब रूपादे ने जाकर ये बात मालजी से कहीं तो रावल मालदे सभी को मारने के लिए तैयार हो गये, तब गुरू के कहने पर रूपादे ने रावल मालदे से कहां : पतिदेव सच में इनको नहीं मारना हैं, इनको मन से मार दो ताकि आपका मन भक्ति से विचलित ना हो ।



बाद में जाकर रावल मालदे को सारी बात समझ में आ गई ! उगमजी रूपादे के गुरु थें इसलिए वे रावल मालदे को उपदेश नहीं दे सकते थें, सनातन  धर्म की मान्यता अनुसार पति पत्नी दोनों के गुरू अलग-अलग होने चाहिए । इसलिए गुरू उगमजी ने नवलनाथ जी को बुलाया, नवलनाथ जी ने रावल मालदे को उपदेश दिए व संतो ने रावल मालदे का नाम मल्लीनाथ जी रख दिया ।



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