सगराम दास जी के दोहे :
कहे संत सगराम राम ने भुला किकर
भुल्या भुंडी होवसी माजनो जासी बिखर
बिखर जासी माजनो देवे गधे री धूण
मोरों पड़सी टाकिया ऊपर लगसी लुण
ऊपर लगसी लुण चढ़ावे सामो शिखर
कहे संत सगराम राम ने भुला किकर
अर्थ:
सगराम दास जी ने कहा है, परमात्मा को हम भुलने पर हमारे जीवन काल में आपत्ति हो सकती है, आपत्ति के साथ जीवन में मान सम्मान भी कम पड़ सकता है,
जिस तरह गधा बोझ लेकर चलता है उसके पीठ पर घांव के निशान बन जाते हैं, फिर उस घांव पर मालिक नमक लगाता है जितनी तकलीफ उस गधे को होती उसी तरह हमें अपने जीवन में परमात्मा को भूलने पर होगी ! इसलिए कहां है परमपिता परमात्मा को भी याद रखें
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कहे संत सगराम हाथ में हीरा आया,
पड़ी नहीं पहचाण गाल गोपण में वाया !
वावत वावत वाविया लारे वछियो एक,
आया हीरो या पारखी तो रोयो मारो टेक ।
रोयो माथो टेक ऐडा़ मैं घणा गमाया,
कहे संत सगराम हाथ में हीरा आया ।
अर्थ:
सगराम दास जी कहते हैं एक नासमझ इंसान को हीरो की पोटली मिल गई, कहते है हीरे की परख सिर्फ जौहरी को होती है, वह इंसान चमकदार पत्थरो को अपने खेत में बौने चला गया, खेत में जाकर एक एक हीरे को फेंकने लग गया,
जब अंतिम में एक हीरा उसके हाथ में था तब एक (जौहरी) व्यक्ति उसके पास आया और उसने कहा तुझे पता है इसकी कीमत लाखों में है तब वह सिर पटक कर रोने लगा, ऐसे हीरे तो मैंने पूरे खेत में फेंककर गवां दिये,
इसलिए सगराम दास जी ने कहां हैं मनुष्य जन्म अनमोल है, इसमें जो वक्त है वही हीरा है,अपने हाथों से अच्छे वक्त को गंवा देंगे तो अंतिम में आपको पछतावा ही होगा (कि वक्त मिला था और फिजुल गवां दिया) |
तो समय (हीरे) का सदुपयोग करें और परमात्मा को याद रखे ।
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कहे संत सगराम सुणो सज्जन मीता,
राम रटो दिन रात लक्ष्मण ने कियो सीता !
लक्ष्मण ने सीता कियो अर्जुन ने भगवान,
पार्वती ने शिवजी कियो धरो राम रो ध्यान
धरो राम रो ध्यान थारा दिनडा़ जावे वीता,
कहे संत सगराम सुणो सज्जन मीता ||
अर्थ: इस श्लोक में सगराम दास जी ने नाम की ताकत बताई हैं।
सगराम दास जी ने कहा है राम के नाम का सुमिरन करो, इस नाम को रटते रहो,सीता ने लक्ष्मण से कहा (राम) नाम का सुमिरन करो, यही बात अर्जुन को भगवान कृष्ण ने और भगवान शिव ने पार्वती को बताई ।
राम के नाम (सुमिरन) में मोक्ष है,सदैव अपने मन में इस नाम का सुमिरन करते रहो, इसलिए कहां है सज्जनो हमारे दिन बीते जा रहे हैं ! सुमिरन करते रहो ||
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कहे संत सगराम एक माने अचरज आवे,
मिनख कियो भगवान भेल कोई थु सावे !
कोई सावे बावरा यूं तो माने बताय,
राम भजन कर लें जन्म सफल हो जाय ।
जन्म सफल हो जाय वास अमरापुर पावे,
कहे संत सगराम एक माने अचरज आवे ||
अर्थ:-
सगराम दास जी ने कहा है,मैं अचंभित हूं ! परमात्मा ने हमें मनुष्य बना दिया और परमात्मा से आख़िर तुम और क्या चाहते हो, परमात्मा का सुमिरन कर लो जन्म सफल हो जाएगा, यदि जन्म सफल है मोक्ष (अमरापुर)की प्राप्ति अवश्य है। वरना मैं तो क्या परमात्मा भी आपसे अचंभित है! बस सुमिरन करते रहो||
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कहे संत सगराम तू भोदू भज रे पीवं,
बैठो क्यो सगराम केवे थू उंडी दे ने नींव !
उंडी दे ने नींव हिया भुठोडा़ गेला,
कर आगे री ठौड़ अटे कुण रेवण देला ।
लख चौरासी जुण में रुलियो फरसी जीव,
कहे संत सगराम जी तू भोदू भज रे पींव ||
अर्थ:
इस श्लोक में सगराम दास जी ने भोदू (मानव) को बताया है, और पीवं परमात्मा को कहा है ऐसे क्यों बैठा है अपने जीवन को धोखे में रख कर,
सगराम दास जी ने कड़वे शब्दों में कहा है : जगह (ठौड़) यहां नहीं वहां बनाओ जहां हम सबको जाना है, सिर्फ यहां जगह बनाने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी, और 8400000 लाख जोणियो का भुगतान करना पड़ेगा,और इस जीव को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी,अंत में पछतावा ही रहेगा ।
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