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Sunday, 23 August 2020

धरती माता हंसे, कथनी

 राजस्थान की सिणधरी रियासत में एक संत हुएं ! जिनका नाम जमालाराम था,जब धन को जमीन में गाढ़ा जाता था,तब उन्होंने ये बात लिखी थी। 

धन गाढ़त धरती हंसे, ओगट काडत काल ।

बाल खेलावत माता, ज्यो कारण कोईन जमाल ।।


अर्थ:

              सालों पहले लोगो के पास जितना भी धन होता था,वो जमीन में गाढते थे,(बैंक का जमाना नहीं था)।
तब संतो ने कहा है: ये धरती माता खुद हंसती थी,लोगों पर जब धन मुझे ही सौंफ रहे हैं, फिर इतनी मेहनत करके इक्कठा क्यों करते हैं लोग, उतना ही कमाएं ताकि आराम जीवन यापन कर सके ।


 (ओगट+ काल) यानि मौत तो द्वार पर खड़ी है, घर वाले सभी कहते है,(मरीज को) इनको निंबू पिलाओ,कोई कहता है शिकंजी बनाओ, तब संतों ने कहा है: कुछ भी खिलाओगे या पिलाओगे,आई मौत तो लेकर ही जायेगी ।


(बाल+माता) यानि १/२ वर्ष के बच्चे को माता लाड लडाती हुई सपने देखती है, मेरा बच्चा बड़ा होगा, नौकरी लगेगी ! संतो ने कहा है: बड़ा तो वो गर्भ में हो गया, बाहर आने के बाद इंसान की उम्र घटती जा रही है,(हर इंसान प्रतिदिन मौत के नजदीक जा रहा है) ।


जब संत महात्माओं में इस बात का कारण जानने की कोशिश की,, तो सिर्फ एक आशा बताई ! तब अंत में लिखा है, इसका कारण कुछ नहीं एक आशा है।
                     

Saturday, 15 August 2020

कवि गंग के दोहे

कवि गंग ने कलयुग में पैसों को अहम बताया है:


पैसा बिन माता कहती,पुत मेरा कपुत।
पैसे बिन भाई कहता, है ये दुःखदाई ।।
पैसे बिन काका कहता किसका भतीज तू।
पैसे बिन सास कहती किसका जवांई है।।
पैसे बिन पंच लोगों में बैठने का हक नहीं।
पैसे बिन लोक वाक यूंही हंसाई है।।
कहे कवि गंग ये है इस दुनिया के रंग ।
कलयुग में जीना है तो पैसो की बढ़ाई है ।।


अर्थ:

                                 पैसे ना हो तो मां कहती पुत्र (पुत) मेरा कुपुत्र (कपुत) है, पैसों ना हो तो भाई कहता है ये दुःख देता है, पैसे ना हो तो काका (चाचा) कहता किसका भतीज है तू ! पैसा ना हो तो सासु मां भी कहती किसका जवांई है,
पैसा पास है तो लोगों की सभा (समूह) में सबसे आगे बैठ पाओगे,पैसे नहीं तो दुनिया भी हंसेगी आप पर, कवि गंग कहते हैं ये कलयुगी दुनिया का ऐसा ही रंग है, यहां लोगों ने ही जीने के लिए पैसों को अधिक महत्व दिया है।


धनवंता धर्म ना करें दोहा व सार

 दोहा व सार


धनवंता धर्म ना करें,नर्पत करे न न्याव ।
भक्त होय भजन न करें,क्या कीजे ऊपाए ।।
क्या कीजे उपाय,सलाह मानो एक मारी ।
दो वेती रे पूर नदियों,आवे जद भारी ।।
जाए घडी़दा खावता,धरती टिके न पांव।
धनवंता धर्म ना करें,नर्पत करे न न्याव ।।:

    

अर्थ:

                     संतों ने कहां है जो धनवान होते हुए धर्म नहीं करते हैं, जो राजा होकर न्याय नहीं कर सकते, भक्त हैं लेकिन भजन नहीं करता हो, तो उन लोगों का संतो के पास एक उपाय है।
 उनको नदी आए तब पीछे से धक्का दे दो बस ! फिर जाने दो डुबते डुबते (घड़िदा),ताकि इनके धरती पर पैर भी ना टिके ।

Friday, 14 August 2020

संत सगराम दास जी के दोहे पढ़ें

सगराम दास जी के दोहे :


कहे संत सगराम राम ने भुला किकर 
भुल्या भुंडी होवसी माजनो जासी बिखर 
बिखर जासी माजनो देवे गधे री धूण
मोरों पड़सी टाकिया ऊपर लगसी लुण 
ऊपर लगसी लुण चढ़ावे सामो शिखर
कहे संत सगराम राम ने भुला किकर 

अर्थ: 

                                सगराम दास जी ने कहा है, परमात्मा को हम भुलने पर हमारे जीवन काल में आपत्ति हो सकती है, आपत्ति के साथ जीवन में मान सम्मान भी कम पड़ सकता है,
 जिस तरह गधा बोझ लेकर चलता है उसके पीठ पर घांव के निशान बन जाते हैं, फिर उस घांव पर मालिक नमक लगाता है जितनी तकलीफ उस गधे को होती उसी तरह हमें अपने जीवन में परमात्मा को भूलने पर होगी ! इसलिए कहां है परमपिता परमात्मा को भी याद रखें

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कहे संत सगराम हाथ में हीरा आया, 
पड़ी नहीं पहचाण गाल गोपण में वाया !
वावत वावत वाविया लारे वछियो एक,
आया हीरो या पारखी तो रोयो मारो टेक ।
रोयो माथो टेक ऐडा़ मैं घणा गमाया,
कहे संत सगराम हाथ में हीरा आया ।

अर्थ:

                        सगराम दास जी कहते हैं एक नासमझ इंसान को हीरो की पोटली मिल गई, कहते है हीरे की परख सिर्फ जौहरी को होती है, वह इंसान चमकदार पत्थरो को अपने खेत में बौने चला गया, खेत में जाकर एक एक हीरे को फेंकने लग गया,

जब अंतिम में एक हीरा उसके हाथ में था तब एक (जौहरी) व्यक्ति उसके पास आया और उसने कहा तुझे पता है इसकी कीमत लाखों में है तब वह सिर पटक कर रोने लगा, ऐसे हीरे तो मैंने पूरे खेत में फेंककर गवां दिये,
इसलिए सगराम दास जी ने कहां हैं मनुष्य जन्म अनमोल है, इसमें जो वक्त है वही हीरा है,अपने हाथों से अच्छे वक्त को गंवा देंगे तो अंतिम में आपको पछतावा ही होगा (कि वक्त मिला था और फिजुल गवां दिया) |
तो समय (हीरे) का सदुपयोग करें और परमात्मा को याद रखे ।

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कहे संत सगराम सुणो सज्जन मीता,
राम रटो दिन रात लक्ष्मण ने कियो सीता !
लक्ष्मण ने सीता कियो अर्जुन ने भगवान,
पार्वती ने शिवजी कियो धरो राम रो ध्यान 
धरो राम रो ध्यान थारा दिनडा़ जावे वीता,
कहे संत सगराम सुणो सज्जन मीता ||

अर्थ: इस श्लोक में सगराम दास जी ने नाम की ताकत बताई हैं।

                          सगराम दास जी ने कहा है राम के नाम का सुमिरन करो, इस नाम को रटते रहो,सीता ने लक्ष्मण से कहा (राम) नाम का सुमिरन करो, यही बात अर्जुन को भगवान कृष्ण ने और भगवान शिव ने पार्वती को बताई ।
राम के नाम (सुमिरन) में मोक्ष है,सदैव अपने मन में इस नाम का सुमिरन करते रहो, इसलिए कहां है सज्जनो हमारे दिन बीते जा रहे हैं ! सुमिरन करते रहो ||
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कहे संत सगराम एक माने अचरज आवे,
मिनख कियो भगवान भेल कोई थु सावे !
कोई सावे बावरा यूं तो माने बताय,
राम भजन कर लें जन्म सफल हो जाय ।
जन्म सफल हो जाय वास अमरापुर पावे,
कहे संत सगराम एक माने अचरज आवे ||

अर्थ:-

                          सगराम दास जी ने कहा है,मैं अचंभित हूं ! परमात्मा ने हमें मनुष्य बना दिया और परमात्मा से आख़िर तुम और क्या चाहते हो, परमात्मा का सुमिरन कर लो जन्म सफल हो जाएगा, यदि जन्म सफल है मोक्ष (अमरापुर)की प्राप्ति अवश्य है। वरना मैं तो क्या परमात्मा भी आपसे अचंभित है! बस सुमिरन करते रहो||

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कहे संत सगराम तू भोदू भज रे पीवं,
बैठो क्यो सगराम केवे थू उंडी दे ने नींव !
उंडी दे ने नींव हिया भुठोडा़ गेला,
कर आगे री ठौड़ अटे कुण रेवण देला ।
लख चौरासी जुण में रुलियो फरसी जीव,
कहे संत सगराम जी तू भोदू भज रे पींव ||

अर्थ:

                      इस श्लोक में सगराम दास जी ने भोदू (मानव) को बताया है, और पीवं परमात्मा को कहा है ऐसे क्यों बैठा है अपने जीवन को धोखे में रख कर,  
सगराम दास जी ने कड़वे शब्दों में कहा है : जगह (ठौड़) यहां नहीं वहां बनाओ जहां हम सबको जाना है, सिर्फ यहां जगह बनाने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी, और 8400000 लाख जोणियो का भुगतान करना पड़ेगा,और इस जीव को मोक्ष  की प्राप्ति नहीं होगी,अंत में पछतावा ही रहेगा ।

इसलिए मानव जन्म हीं सारी इच्छा पुर्ति व जीव के लिए सर्वश्रेष्ठ है ।

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Tuesday, 11 August 2020

बैताल और विक्रम दोहे लिरिक्स

बैताल की कही बात राजा विक्रमादित्य सुन रहे थे ।

दोहा:


वौरो भलो नी होय,काल मे पालण नी सोंन्धे ।
सगो भलो नी होय रात दिन छाती रोन्दे ।
पिता भला नी जाण राख दे कन्या कवारी ।
पुत्र भलो नी होय सिख ले चोरी  जारी ।
पुत्री भली नी होय पियर में श्र्ँगार सजावे ।
पत्नी भली नी होय पति पेला भोजन पावे ।
ठाकर भलो नी जारा, लोफर चोर नी रखवाले ।
लोभी भलो मींत, निर्धन भलो नी सालो ।
जमाई भलो नी सासरे,जीण रो घटे कायदो ।
बैताल कहे सुणो विक्रम,ईतरा मे नही फायदो ।।

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दोहा:

मरो सूम जजमान,मरो अड़ीयल टटू ।
मरो करगसा नार,मरो पुरुष निकटू ।
पुत्र वही मर जाविये,कुल में दाग लगावे।
मित्र वो मर जाविये,अड़ी मे काम नी आवे।
मरो अन्याई राजा,इतरा मरे नी रोविये ।
बेताल कहे सुणो विक्रम ए मरिया !
सुख री नीन्द सोविये ।


Thursday, 23 July 2020

जल से पतला, कबीर कथनी

जल से पतला कौन है कौन भुमी से भारी।

 कौन अग्न से तेज है,कौन काजल से कारी।।

अर्थ:

                           एक बार कबीर जी रामानंद जी के साथ सत्संग में गए, वहां बड़े-बड़े महर्षि ज्ञानी संत विराजमान थे, तब एक संत ने सोचा कबीर कैसा शिष्य हैं  उनकी परीक्षा लेनी चाहिए, तब पास आकर एक ऋषि ने कबीर जी से कहां आप रामानंद जी के परम (पाठवी) शिष्य हो। मुझे एक प्रश्न का उत्तर नहीं मिल रहा है क्या आप मेरी मदद कर सकते है।

कबीर जी ने कहा अवश्य आप मुझे प्रश्न बताइए:

तब यह प्रश्न बताया गया:


जल से पतला कौन है, कौन भूमि से भारी ।

कौन अग्नि से तेज है, कौन काजल से कारी ।।


उत्तर:   जल से पतला ज्ञान है,पाप भुमि से भारी ।

           क्रोध अग्नि से तेज,कंलक काजल से कारी ।।

अर्थ:

                 कबीर जी ने जल की तुलना ज्ञान से की, जल से पतला ज्ञान ! भूमि से भारी पाप को बताया क्योंकि जब पाप बढ़ जाता है तो (विनाश) धरती फट जाती है।
फिर अग्नि से तेज क्रोध को और बताया क्योंकि इंसान को जब क्रोध आता है तो उसकी जलन अग्नि से भी खतरनाक होती है, काजल से कारी कंलक को बताया क्योंकि जब इंसान के सर कलंक लग जाता है, तो वह दिखता नहीं लेकिन काजल से भी कारा (काला) है।

इसलिए मित्रो कबीर जी को रामानंद जी का परम (पाठवी) शिष्य कहां जाता है।


Wednesday, 9 October 2019

बाल से आल बुढ़े कवि गंग

दोहा:   

बाल से आल, बुढ़े से विरोध, कुलक्षण नारी से ना हंसिये।
ओछे की प्रीत गुलाम की संगत,ओगट घाट ना धसिये।। 
बैल को नाथ घोङे को लगाम, हाथी को अंकु से कसिये ।
कवि गंग कहें सुण शाह अकबर कुङ से सदा दूर बचिये ॥


अनुवाद:

                  कवि गंग ने अकबर से कहा कभी खेलते छोटे बच्चे को सताना नही चाहिए, कभी बुढ़े आदमी की परेशानी कारण ना बने, जिस औरत में लक्षण नही हो उसके सामने कभी हंसना नहीं चाहिए। जिस व्यक्ति में गुण नही उससे कभी प्रीत नहीं करनी चाहिए।



जो गुलाम है उसकी संगत नही करनी चाहिए, जहां पर भूकंप हड़कंप हो वहा ना जाना ही बेहतर है! बैल हमेशा नाक में रस्सी से हाथी अंकु से और घोङा लगाम से बंधा होता है उसी शरीर को भी अपने वश में रखे, कवि गंग ने कहा है जहाँ झूठ चलता हो वहाँ से बचकर निकल जाए (कभी खङे ना रहें) ।

         

                

Tuesday, 8 October 2019

कवि गंग व विक्रमादित्य विचार कथनी

मित्रो लग भग ढाई हजार वर्षों पहले लिखी गई बात बैताल ने कही और राजा वीर विक्रमादित्य ने लिखी थी ।


जब अकबर 700/800 वर्ष पहले लिखी गई बात को पढा तो उनकी आंखे भर आयी, और उनके राज में रहते कवि गंग को बुलाया, अकबर ने कवि गंग को कहा:- तुम भी कवि हो लेकिन एसी बात कभी नही लिखी तुमने ।

कवि गंग ने पढ़ा--



 समय से होता ज्ञान, समय से सरवर चूकें।  
 समय मूर्ख बुध्दि होय,समय से पंडित चूंकि॥ 
 समय फूले वनराय,समय सज्जन घर आवे ।  
 समय भोम छुट जाय,समय नर फेर बसावे ॥
 समय डिगावे पुरूष को,समय फेर छत्र धरे। 
बैताल कहे सूणो विक्रम समय करे नर क्या करे॥



अनुवाद:- 

            बैताल ने राजा विक्रमादित्य को कहा था, इस दूनिया में जन्म लेकर आने वाले इंसान का कोई दोष नहीं है, समय ही दोषी हैं  बुढापे में जब इंसान के हाथ में कुछ ना हो, मौत नजदीक हो! तब वह इंसान ज्ञान की ही बाते करता हैं (क्यूँ कि उसका समय अब आ गया इसलिए)। 

और समय जब इंसान का खराब आता हैं तब इंसान की बुद्धि हीन हो जाती है ! दुनिया कहती है,ये इंसान तो गलत था भी नही और इसने एसा कैसे कर दिया ! (समय उसका गलत आ गया इसलिए) समय से पंडित भी चूक जाता है लोग कहते है (इसके हिरदे से भगवान निकल गये) समय अच्छा चलता है तब मन ही मन इंसान खुश रहता है! और सज्जनों का घर पर आना जाना रहता हैं, जब समय खराब आता हैं इंसान को रहने वाली प्रोपटी को भी बेचना पङता हैं।



और समय आने पर वही इंसान उसके जैसी हजारों प्रोपटी खरीद लेता है (क्यू कि समय अच्छा आया) बैताल ने कहा है- समय ही पुरूष को राजा को रंक से जंक बनाता हैं , जब ये बात कवि गंग ने पढ़ी (कवि गंग पर भी सरस्वती माँ की असीम कृपा थी) अकबर से गंग ने कहाँ कि हुजूर ये बात गलत हैं सही नही लिखा इसमे अधूरी बात हैं।

अकबर ने कहाँ तो तू बता सही बात मैं लिख देता हूँ ।


कवि गंग कहते हैं:- 


    "कर्म प्रताप तुरंग नचावत कर्म से पुनः छत्रपती होई ।
     कर्म से कपूत सपूत कहावे, कर्म से मानुष देव कहा ॥
    कर्म गया  रावण का, सोने की लंका पल में खोई ।
    कवि गंग कहे सुण अकबर,कर्म करे करता नही कोई ।


अनुवाद:--

         कवि गंग ने कहा:- सब दोष समय का नही हैं! दोष कर्म का है इंसान को अपने कर्मो का फल जरूर मिलता है, कर्म अच्छे किए हो और समय साथ हो तो रंक भी राजा बन जाता है,सपूत बेटे को दुनिया यश नही देती हैं, कपूत हो और सपूत बन जाए तो दुनिया कहती है इसने गलत काम तो बहुत किए मगर अब तो भगवान की तरह हो गया हैं। क्यूँ (क्यूंकि बाद में कर्म अच्छे किए इसलिए कर्मो का फल है)।




इंसान जब बुरे कर्मों का भुगतान करता है तब समय साइड में हो जाता और दुनिया के सामने इंसान का सर झुक जाता हैं।(क्यूँ कि कर्म अच्छे नही किए)रावण ने कर्म अच्छे किए थे 14 विधा का विद्वान था, लेकिन सीता का हरण ही उसका मरण बन गया,जब हम कुछ भी गलत करते है तो समय हमारा कभी साथ नही देता और जब इंसान गलत करने के वर्ष बाद भी पकङा जाता हैं तो समय निकल जाता है उसे बुरे कर्मों का दंड मिलने के बाद वापस आ जाता हैं, फिर कर्म अच्छे होंगें तो समय कभी छोङकर नही जाता।
कवि गंग का ये श्लोक सुनकर अकबर फूले ना समाये और कवि गंग को दूनिया का सबसे ज्ञानवान और गुणीवान कवि बताया ।

 कर्म अच्छे करते रहो हमारा समय खुद साथ देगा । 







     

Saturday, 5 October 2019

हम भी तो इंसान थे, कथनी

एक इंसान (अभिमानी) बाहर से घर को निकला,आगे से दो रास्ते उसके घर कि और जा रहे थे! एक शमशान के अंदर से एक जंगल कि तरफ से,
उसने मन में सोचा मैं डरने वाला किसी से नही, श्मशान से होकर निकला!


उसको शमशान ने पड़ी जली हुई हड्डी कि ठोकर लगी,तब वह हड्डी दूर जाकर गिरी और बोलने लगी, उसने सोचा यहॉ बोल कौन रहा है ! उस हड्डी के बयान थे:


दोहा:


"घर से निकले जंगल मन में कुछ अरमान थे।

 एक तरफ जंगल दुसरी ओर शमशान थे ।।

चलते हुए हड्डी कि ठोकर लगी उस हड्डी के ये बयान थे,

 चलने वाले थोड़ा सम्भल कर चल।

 कभी हम भी तो इंसान थे ॥




हे ! मानव (इंसान) थोड़ा सम्भल कर चल हम भी तेरी तरह किसी से नही डरते थे, यहां मिट्टी मे मिल गये, तुझे भी एक दिन यही जलाया जायेगा ।

दोहा:

  मंजिल तो सबकी यहीं (श्मसान)है,

  बस थोड़ा समय लगेगा यहां आते आते ।

अरे क्या देगी ये दुनिया तुझे ! देखना

अपने ही जला देंगे तुझे जाते जाते ।।


इसलिए मित्रो कभी इंसान को किसी भी बात का अभिमान नही करना चाहिएं ।
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दोहे लिरिक्स! दादूदयाल के,रैदासजी, डुंगरपूरीजी चौहटन ,ईशवरदास भादेसर,रामदासजी खेड़ापा,
और अनेको अनेक संतो के प्राचीनतम विचार धाराए ।

मन के दोहे व सार ! प्राचीन काल

मन तु मारी मान ले बार बार कोई तोय।
हरि के भजन बिन निचतारो नहीं होय ।।
निचतारो नहीं होय गुदड़ा खावतो जावे ।
भवसागर में सत्गुरु बिना कोई नहीं छुड़ावे ।।
प्रताप राम सच कहत है घट में लीजे जोय ।
मन तु मारी मान ले बार बार कोई तोय ।।

अर्थ: 

             संतों ने मन और शरीर को समझाया है, हे मन ! तु इंसान को उछाल मत आखिर कर हरि के सुमिरन बिना मोक्ष नहीं मिलेगा,और ये शरीर दुनिया में मारा मारा फिरेगा, तुझे बाद में भी गुरु का चरण लेना पड़ेगा ! प्रताप राम जी कहते हैं अभी तक समय है अपने घट में परमात्मा की छवि बना लें ।




दोहा:  मन जावे तो जावण दे,दर्ढ़ राख शरीर।
        बिना खेच्या कबाण कीण विध छुटे तीर ।।

अनुवाद:

                      संतो ने लिखा है: इंसान का मन कही भी जाये उसे जाने दो! बस अपने शरीर को वश में रखो,मन अपने आप लौट आएगा ।




दोहा: मन कि हारे हार है,मन कि जीते जीत ।
              मन पहुंचा दे बैकुंठ में मन करा दे फजीत ।।

अनुवाद:

                संतो ने लिखा है,इंसान खुद कि इच्छा से नही बल्कि मन कि इच्छा से चलता है, मन इंसान को हरा सकता है,मन से इंसान जीत भी सकता है! मन चाहे तो इंसान को भगवान से मिला देता है और मन इंसान कि फजीती(बेइज्जती)भी करवा सकता है ।





दोहा:-   मैं जाणू मन मर गया बल जल गया भबुत ।
           मन कुत्ता आगे खड़ा ज्योँ जंगल में भुत ।।

अनुवाद:

             संतो ने कहा है मन कभी मरता नहीं है! कभी ऐसा लगता है अब कुछ मन में नहीं है ! हर प्रकार से सुकुन है फिर अचानक इच्छाएं आकर खड़ी हो जाती है,और मन कुछ और करने की सोच लेता है ! यानि मन भुत बनकर वापस इच्छाएं ले आता है।





दोहा:   मन लोभी मन लालची मन चंचल मन चोर।
        मन के मते नी चालणो मन पलक-२ कही ओर।।

अनुवाद:

              मन लोभी है,मन ही लालची है, मन है चंचल है और मन ही चोर है! मन के पिछे नही चलना चाहिए मन कब चोरी करवा दे और कब वापस पकङवा दे! इसका कोई पता नही रहता ।
           





 दोहा: मन ही महा अनिति कहिजे बड़ा बड़ा भुप ठगिजे।
         योद्धा जब्बर हार गया इण सू पड़ीया कैद मे सीजे।


उदाहरण:

                मन ही अनिती है ! इस मन ने बड़े बड़े राजाओं (भुप) को ठग लिया है, मन की करणी से योद्धाओं को हारना पड़ा और उन्हें जेल भिजवा दिया इसलिए मन का कहना ना करें ।
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