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Saturday, 15 October 2022

सती अनुसूया का जीवन

एक दिन नारद मुनि को भगवान विष्णु ने बैकुंठ धाम में बुलाकर कहां से मुनिवर मृत्युलोक में जाओ और मेरे लिए यह लोहे के चणे भुनाकर (पकाकर) ले आओ, नारद मन ही मन सोचने लगे भगवान यूं ही शर्मिंदा कर रहे हैं, हरि विष्णु ने कहां नारद मैं आपको शर्मिंदा नहीं कर रहा आपको मृत्युलोक जाकर यह चणे भुनाकर लाने हैं तब नारद ने  और कहां: हे प्रभु ऐसा कभी ना सूना ना किसी को देखा जो लोहे के चणे कौन पका सकता हो ! तब हरि बोले: हे मुनिराज इस धरती पर ऐसे कई भक्त रहते हैं जिनकी भक्ति के आगे भगवान भी शून्य हैं जाओ नारद आपको कोई ना कोई ऐसा जरूर मिलेगा जो यह काम पल भर में कर देगा, हे मुनिवर आप अपने विनम्र भाव से ही वहां तक पहुंचोगे ।


 नारायण की बात सुन नारद मृत्युलोक को निकले, आते जते सभी से कहने लगे मुझे लोहे के चणे पकाने हैं कोई मेरा मददगार बन सकता है कई लोग तो नारद मुनि पर हंसने लगे कई लोग मजाक बनाकर कहने लगे महाराज यहां पर खाने के चणे भी बहुत मुश्किल से पका पाते हैं आप लोहे के चणे कहां से लाए हो ये पकाना तो हमारे वश में नहीं तब नारद मुनि ने सोचा यदि भगवान ने मुझे इस काम के लिए भेजा हैं तो जरूर कोई ना कोई मेरा यह काम अवश्य करेगा ।







नारद मूनि दो से तीन घंटे तक भूलोक पर गमन करते रहें मगर ऐसा कोई नहीं मिला जो लोहे के चणे भुन सके तभी अचानक वहां से गुजर रहे एक सेठ ने यह बात सुनी और नारद से कहां मुनिवर आप जिस काम के लिए आए हो यह काम कोई साधारण मानव या स्त्री कर सकती हैं यह काम वहीं कर सकता हैं जिसका जीवन माया में नहीं भगवान के चरणों में पहले से अर्पण हो यहां पर कोई ऐसी सती एवं साधु नहीं जो आपको यह लोहे के चणे भूनकर दे सकता हैं।
सेठजी ने कहां मुनिवर मेरे पास एक जगह आप वहां जाओ तो आपका यह काम हो जायेगा, तभी नारद मुनि खुश होकर बोले कृपा करके हमें वह जगह बताएं तब सेठजी ने उनको कहां मुनिवर आप यहां से सीधे चले जाओ रास्ते में एक छोटा अत्रि मुनि का आश्रम आयेगा वहां जाओ वहां पर लोहे के तो क्या पत्थर के चणे भी पका दिए जायेंगे,





नारद मुनि बहुत खुश हुएं उसी रास्ते पर चल दिए मन ही मन मुस्कुराते रहे आश्रम पहुंच नारायण नारायण की आवाज लगाई तभी अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया माता बाहर आए नारद मूनि को देख बहुत खुश हुएं,
तभी नारद मुनि सती को प्रणाम करते हुए कहने लगे माता श्री मैं बैकुंठ धाम से आया हूं मुझे यह लोहे के चणे भुनाने है  मृत्यु लोक पर ऐसा कोई नहीं मिला जो हरि का यह काम कर सके फिर किसी ने मुझे आपके आश्रम की जानकारी दी, तभी शीघ्र मैं यहां लौट आया।







सती प्रसन्नतापूर्वक कहने लगी हे मूनिवर मैं आपके यह चणे भुनकर दे दूंगी पर अभी मैं मेरे गुरू मेरे पतिदेवता की सेवा में लगी हूं वह काम ही मेरा धर्म है इसलिए आपको कुछ देर तक ठहरना होगा एक घंटे बाद मैं शीघ्र आकर आपके यह चणे भूनकर दे दूंगी ! अब नारद मुनि करते भी क्या ठहरना जरूरी था एक घंटे तक नारद मुनि वहीं बैठे रहे एक घंटे बाद अनसूया माता बाहर आई प्रसन्ता से एक लोहे की सिगड़ी जलाकर ऊपर एक बर्तन (पात्र) में लोहे के चणे डाल दिए, नारद मुनि नजर भर कर देखने लगे तब तक तो लोहे के चणे भुनकर तैयार थे, यह देख नारद मुनि आश्चर्य में पड़ गये इतने में सती ने नारद मुनि को लोहे चणे भूनकर दे दिए ।





जब नारद मुनि ने लोहे के चणे हाथों में लिए तब हक्के बक्के हो गए नारद के हाथों में सारे चणे बिल्कुल पक्के हुए थे, 
मुनिवर ने सती अनुसूया माता को प्रणाम कर किया हे माते मेरे जीवन में यह पहला अद्भुत दर्शय है नारद मुनि की सोच से परेह था की ऐसा भी हो सकता है, आपको बारंबार प्रणाम कहकर नारद मुनि बैकुंठ धाम को चल दिए भगवान हरि विष्णु के चरणों में शिष निवाकर बोले हे प्रभु नामुमकिन को आज किसी ने मुमकिन कर दिखाया, मेरे मन में जाते वक्त पुरा संकोच था भगवान (आपने) ने ऐसा काम मुझे क्यों सौपा जो मुमकिन हैं भी नहीं ।






भगवान ने कहा: मुनिवर मैंने पहले भी कहां थी धरती पर सती जती सन्त महापुरुष जब तक है तब तक ही मृत्युलोक में मानव धर्म है समस्त मानव जीवन सनातन पर ही टिका है और इन्हीं सन्त सती जती महापुरुषों पर सनातन की मजबूती है।

 
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और भी सन्तो का महान जीवन सार जानने के लिए हमसे जुड़े रहें। 

Saturday, 26 September 2020

रूपादे व तौलण कटियाणी मिलन

मेवानगर में रूपादे रावल मालदे के साथ भगवान की भक्ति में लीन थें, और गुजरात के कच्छ काठियावाड़ में तौलण कटियाणी व जैसल जड़ेजा दोनों भगवान की भक्ति कर रहे थें,,


ऐसा माना जाता है संत दिव्य दृष्टि से हर जगह को देख सकते हैं, (कहां पर क्या हो रहा है सब)



सती रूपादे ने देखा काठियावाड़ में दो जन भगवान की भक्ति कर रहे हैं ! उधर से तौलण सती ने अंतर ध्यान करके रूपादे व रावल मालदे को भक्ति करते देखा,, रूपादे ने रावल मालदे से कहां : पतिदेव मैंने हमारी तरह ही काठियावाड़ में भक्ति कर रहे संतो को देखा, हमें उनसे मिलना चाहिए ।

यहीं बात सती तौलण ने अपने पति से कहीं, चारों संत मिलने के लिए इच्छुक थे ।


तौलण सती व जैसल दोनों काठियावाड़ से मेवानगर को रवाना हो गए, इधर से रूपादे व मालदे भी उनसे मिलने रवाना हो गए, भगवान की ऐसी कृपा हुई उन पर धोरीमन्ना (बाड़मेर) के धोरों में उनका मिलन हो गया ।


रावल मालदे ने जैसल जड़ेजा से पुछा :  आपका परिचय ।
जैसल जड़ेजा : हम काठियावाड़ से आएं हैं ! मेरे साथ मेरी अर्धांगिनी तौलण है, इन्होंने मेवानगर में 2 संतो को भक्ति करते देखा, सोचा उन संतों से मिल लिया जाएं ....


तब रावल मालदे व रूपादे को बहुत खुशी हुई ! उन्होंने उनको सारी बात बताई, कि हम खुद आप लोगों से मिलने काठियावाड़ ही आ रहे थे, भगवान ने चाहा इसलिए यहीं हमारा मिलना हो गया, रूपादे सती ने तौलण सती को देखा उनको बहुत खुशी हुई ‌।

इस पर संतों की कथनी :-


गढ़ मेवा से माल पधारें, कच्छ से जैसल आएं ।
चारों संत मिले मार्ग में, देख मन ही मन हर्षाएं ॥


रूपादे ने तौलण से कहां परमात्मा की चाह पर हम यहां मिलें हैं क्यूं ना आज इसी जगह पर परमात्मा की सत्संग कर ली जाएं तो अच्छा है । सभी को इस पर प्रसन्नता हुई, मालदे ने कहां यहां पर परमात्मा की सत्संग तो कर लेंगे मगर पीने का पानी नहीं हमारे पास, पानी के बिना तो यहां हम एक मिनट नहीं रूक पायेंगे ‌।



उसी क्षण एक अनजान शख्स वहां से गुजर रहा था, जैसल जड़ेजा ने उससे पूछा : भाई यहां पर पीने के लिए पानी कहां मिलेगा, तब उसने कहां आस-पास में जितने कुएं है वह पानी पीने योग्य नहीं है, बहुत खारा पानी हैं ।



मालदे ने सोचा क्यों ना इन संतों की परीक्षा ली जाएं, तब मालदे ने जैसल जड़ेजा से कहां : हमें तो पानी चाहिए उसे पीने योग्य तो आपकी अर्द्धांगिनी (तौलण) भी बना देंगी, जब वह भगवान की भक्ति करती है तो भगवान उनके लिए इतना कर सकते हैं, तब जैसल ने सती तौलण से कहां ये संत हमारी परीक्षा ले रहे हैं कि हमारे सुमिरन (माला) में कितनी शक्ति है ! तौलण सती ने कहां : पतिदेव आप इन संतों के साथ बैठिए मैं उस कुएं से पानी लेकर आती हूं ।

इस पर संतों की कथनी :

जैसल माल अमल अरोगे, नीर तौलण लासी ।
भाव कुएं में खारा पानी, कड़वा नीम कहासी ॥


तौलण सती झारी (पात्र) लेकर कुएं पर गई, और भगवान से प्रार्थना करने लगी,,

कथनी :

जा कुआं पर अलग जगाई, सुणो श्याम अविनाशी ।
जुग जुग हूं चरणों की दासी, मती कराई जो हासी ॥


तौलण ने कुएं पर जाकर भगवान से कहां हे प्रभु मैं आपके चरणों की दासी हूं ! इन संतों के सामने मेरी इज्जत रख लेना, इस पानी को मीठा पानी बना लेना,, जैसे ही भगवान ने विनती सुनी तो अचानक उस कुएं से पानी ऊपर आने लगा, सती ने पानी चखा ! बहुत प्रसन्नता हुई 

कथनी :

उंडा कुआं अथंग जल भरिया तौला री भक्ति हासी ।
ले हथेली नीर चाखियो, माई स्वाद अमि को आसी ॥


तौलण सती खुशी-खुशी झारी भरके संतों को पानी पिलाया, जैसल जड़ेजा ने पानी पिया मन को बहुत खुशी मिली, रावल मालदे ने पानी पीया तो उनका मुंह उतर गया, रूपादे ने पुछा: पतिदेव पानी पिते ही आपका चेहरा उदास कैसे हो गया,,

कथनी :

जैसल जी हंस हंस पीवे, मालदे पीते ही उदासी ।
तौलण की भक्ति सायब तक, आपरी वेला हांसी ॥


रावल मालदे ने रूपादे से कहां : तौलण सती की भक्ति के तप से परमात्मा ने पानी को मीठा बना दिया, मुझे चिंता है इन संतों ने हमारी परीक्षा ले ली और परमात्मा ने हमारा काम नहीं किया तो यहां संतों के बीच हमारी फजीती हो सकती है, रूपादे ने कहां पतिदेव उसकी चिंता आप ना करें, परमात्मा किसी एक के नहीं होते वह तो सर्वव्यापी हैं ।



चारों संत बैठे परमात्मा का गुणगान कर रहे थे, मालदे ने कहां: इस जगह पर धूप आने वाली हैं आईए हम जगह बदल देते हैं, तब जैसल जड़ेजा ने कहां : हमें कई और छांव में जाने की कहां जरूरत है, आपकी अर्द्धांगिनी रूपादे भक्ति के तप से हमारे लिए छांव का प्रबंध कर देंगी, तब रावल मालदे व रूपादे ने मन ही मन अपने परमात्मा को याद किया ।


रूपादे एक हाथ में सूखी लकड़ी लेकर रेत (ज़मीन) पर खड़ी कर दी, सती अपने अंतर मन से ध्यान कर रहीं थी जैसल और रावल मालदे देखते हैं वहीं सूखी लकड़ी पनप रही थी, देखते ही देखते एक बड़े पीपल का रूप ले लिया, सभी को रूपादे की भक्ति पर बहुत प्रसन्नता हुई ।



चारों संतो ने रात भर वहां सत्संग में परमात्मा का गुणगान किया, रामदेव जी (परमात्मा) खुद उनकी सत्संग में शामिल हुएं ! उन संतों की आराधना सुन ली, इसकी कथनी बाबा रामदेव जी के उपासक (परमभक्त) हरजी भाटी ने की ।

आज रो वधावो गाऊं गुरूदेव रो, धणीयो रे मेले वे आसी ।
अरज करूं अजमाल रा कंवरा, चारों मेला में मिल जासी ॥











Thursday, 24 September 2020

नारद व भगवान विष्णु का संवाद



एक समय नारद मुनि धरती पर (मृत्युलोक) गमन कर रहें थे, एक सेठ के घर जाकर उन्होंने विश्राम किया, सेठ ने नारद मुनि की अच्छी तरह से मेहमानवाजी की ! नारद मुनि बहुत खुश हुए, सेठ के घर किसी बात की कमी नहीं थी मगर उनको कभी संतान की प्राप्ति नहीं हुई सेठ और नारद दोनों के बीच अच्छी मित्रता हो गई,




जब भी नारद मुनि मृत्यु लोक आते तो वे सेठ के घर जाना
नहीं भुलते, एक बार सेठ ने नारद से कहां : आप भगवान विष्णु को जानते हो, इस बात पर नारद को हंसी आ गई तब सेठ ने कहां आप हंस रहे हो मेरी बात पर ।
नारद मुनि : मेरे मित्र तुमने बात ही ऐसी की है मेरी हंसी निकल पड़ी । भगवान विष्णु को मैं नहीं जानता ऐसा कभी हो सकता है, उनके साथ तो मेरा हर रोज का उठना बैठना होता है ।





सेठ ने कहा : अच्छा तो मित्र मेरा एक काम कर दोगे,
नारद मुनि : अवश्य ही काम बताओ ।
सेठ : जब भी आप भगवान विष्णु के पास जाओ तो ये पुछना मेरी किस्मत में संतान का सुख है या नहीं है ।
नारद मुनि :  मित्र चिंता ना करे तुम्हारी बात मै भगवान विष्णु से अवश्य करूंगा, तब सेठ को बहुत खुशी हुई । नारद मुनि वहां से बैकुंठधाम निकल आए आते ही भगवान विष्णु से कहने लगें हे ! नारायण मृत्युलोक में एक सेठ मेरा मित्र हैं उनकी किस्मत में संतान का सुख है भी या नहीं है, भगवान विष्णु ने अन्तर ध्यान करके नारद से कहां आपके मित्र के जीवन में संतान का सुख नहीं लिखा हैं।





एक महिने के बाद पुनः नारद मुनि मृत्युलोक में अपने मित्र सेठ से मिलने आए तब सेठ ने नारद मुनि को देखा वे अति प्रसन्न हुएं ! नारद मुनि ने सेठ से कहां : मित्र मैंने तुम्हारे जीवन के बारे में भगवान विष्णु से पुछा मगर उन्होंने बताया आपके जीवन में संतान का सुख नहीं लिखा है । सेठ का मन थोड़ा सा उदास हुआ और कहां जरुर पिछले जन्म में मैंने अच्छे कर्म ना किए हो ।
नारद मुनि : चिंता ना करें मित्र इस जन्म में अच्छे कर्म करते रहो इसका फल अगले जन्म में अवश्य मिलेगा, इतना कहकर नारद मुनि अपने धाम को लौट आए ।





कुछ महिनों के बाद सेठ और सेठानी रात्रि में अपने घर पर सो रहे थे, किसी फकीर (साधु) ने आवाज लगाई उस (फकीर) साधु को जोर की भुख लगी थी, 1 रोटी देगा उसे 1 पुत्र व दो रोटी देने वाले को 2 पुत्र मिलेंगे, सेठानी ने सेठ से कहां पतिदेव आपने कुछ सुना, सेठ ने कहा हां मैंने सुना मगर यह फकीर भूखा हैं इसलिए वह पुत्र प्राप्ति का लालच दे रहा है जब भगवान विष्णु ने कह दिया हमारे जीवन में संतान का सुख नहीं है, तो इस फकीर की बातों का क्या भरोसा करना ।





फिर भी सेठानी से रहा नहीं गया उसने जाकर फकीर को 2 रोटी लाकर दी, तब उस फकीर ने कहां : जाओ बेटा आज से 9 महीने बाद तुम्हारे घर पर दो पुत्रों का जन्म होगा, सेठानी बहुत खुश हुई, कहते हैं संतों के शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाते । उसी समयानुसार फकीर के आशीर्वाद से सेठ के घर एक साथ 2 पुत्रो का जन्म हुआ, सेठ ने पूरे गांव के लिए दावत रखी, सेठ बहुत खुश थे ।





कुछ दिनों बाद नारद मुनि का मृत्युलोक में आगमन हुआ, जब वे अपने मित्र सेठ के घर पहुंचे तो उन्होंने देखा दो बच्चे पालने में झूल रहे थे, इतना देख नारद मुनि सोच में पड़ गए, सेठ से बिना मिले  ही नारद मुनि भगवान विष्णु के पास गए और भगवान विष्णु से कहां : हे नारायण आपने तो मेरी बेइज्जती करवा दी, 
भगवान विष्णु : ऐसा क्या हुआ मुनिवर जो आप इतना गुस्सा कर रहे हो ।
नारद मुनि : जब मैंने आपसे पूछा मेरे मित्र के जीवन में संतान का सुख है या नहीं आपने कहां नहीं है ! लेकिन मैं इन आंखों से मेरे मित्र के घर दो बच्चों को देखकर आ रहा हूं जब उनके जीवन में संतान का सुख है तो नारायण आपने मुझसे झूठ क्यों कहा । 





भगवान विष्णु को नारद की बात पर हंसना आ गया, भगवान विष्णु ने कहा नारद इसमें कौन सी बड़ी बात है, तुमने सिर्फ बच्चों को देखा हैं ।
नारद मुनि : हां मगर आपने मुझसे झूठ बोलकर मुझे अपने मित्र की नजरों में गिरा दिया तब भगवान विष्णु ने कहा नारद अभी भी हमारे यहां पर तुम्हारे मित्र के जीवन में संतान का सुख नहीं है, यदि तुमने उनके घर पर दो बच्चों को देखा है तो उन पर किसी और की कृपा हुई होगी । कोई हमसे भी बड़े होंगे उन्होंने उनको पुत्र दिए होंगे ।





नारद मुनि : हे ! नारायण इस संसार में आपसे भी बड़ा कौन हो सकता है तब भगवान विष्णु ने कहा नारद भगवान से भी बड़े तपस्वी बहुत है वक्त आने पर मैं तुमको बताऊंगा कि हमसे बड़े कौन है।
इतना सुनकर नारद मुनि वहां से निकल गये ।





एक दिन भगवान विष्णु ने नारद को अपने पास बुलाया और कहा नारद मेरे पेट में जोर से दर्द हो रहा है इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए मुझे जीवित मनुष्य का कलेजा चाहिए, जल्दी जाओ नारद कलेजा ले आओ तब ही मेरा दर्द ठीक होगा, नारद वहां से दौड़कर मृत्यु लोक में आए, सबसे कहने लगे भगवान विष्णु के पेट में दर्द है कोई भी कलेजा निकाल कर दे दीजिए, कलेजा देने को कोई तैयार नहीं हो रहा था, तब वहीं फकीर पास से होकर निकला नारद की आवाज सुनकर फकीर ने नारद मुनि से कहां मेरा कलेजा ले लो उसी क्षण  फकीर (साधु) ने अपनी झोली से कटार (चाकू) निकाली अपना कलेजा निकाल कर नारद के हाथों में रख दिया ।





फकीर ने कहा : जल्दी जाओ नारद भगवान विष्णु को बहुत दर्द हो रहा होगा, नारद मुनि कलेजा हाथ में लेकर भगवान विष्णु के पास आकर बोले हे ! नारायण ये लो कलेजा किसी फकीर ने अपने हाथो निकाल कर दिया है, तब भगवान विष्णु ने कहा नारद तुमने आने में देर कर दी मेरा पेट दर्द अब ठीक हो गया है, 
नारद मुनि : हे प्रभु अब यह कलेजा कहां रखु ।
भगवान विष्णु : नारद यह कलेजा वापस उस फकीर को दे दो, नारद दौड़कर फकीर के पास आए और कहां महात्मा जी अपना कलेजा यह वापस ले लीजिए भगवान विष्णु का दर्द अब ठीक हो गया है।





 फकीर ने कहा: नारद दिया हुआ दान हम कभी वापस नहीं लेते, जाओ ये कलेजा किसी जानवर को खिला दो, यह सुन नारद हक्के बक्के रह गये, नारद को कुछ समझ नहीं आ रहा था उनके साथ ये सब क्या हो रहा था, नारद मुनि थके हुए भगवान विष्णु के पास आए तब भगवान विष्णु ने कहा: नारद आपको कुछ समझ में आया,
नारद मुनि : नहीं प्रभु, मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है।
भगवान विष्णु : याद करो नारद तुमने मुझे कहा था, तुम्हारे मित्र के जीवन में संतान का सुख है या नहीं, मैंने मना कर दिया फिर तुमने अपने मित्र के घर दो बच्चों को देखा था, वो पुत्र किसी और ने नहीं दिए इन्हीं फकीर (साधु) ने दिए हैं ।




भगवान विष्णु : नारद जो बिना परवाह किए अपना कलेजा निकाल कर दे सकता है तो वह पुत्र भी दे सकता है, नारद कलेजा तो तुम्हारे पास भी था, तुम्हें कहीं और जाने की कहां जरूरत थी तुम खुद भी कलेजा निकाल कर दे सकते थे, भगवान विष्णु की बात सुनकर नारद की आंखों में आंसू आ गए । 
भगवान विष्णु : नारद ये जो तपस्वी फकीर (साधु) है इनके वचन कभी व्यर्थ नहीं जाते, तब नारद को सब कुछ समझ आया ।


इसलिए मित्रों सनातन धर्म को मजबुत साधु संतों ने बनाया है,यदि साधु संतो की हम पर कृपा बनी है तब तक भगवान की कृपा हम पर बनी रहेगी ।

Tuesday, 15 September 2020

कबीर जी का भगवान से मिलन

कबीर जी काशी में हर रोज भगवान का भजन करते थें, उठते बैठते भगवान का सुमिरन अपने मुख से करते रहते थे ! सुमिरन के साथ सत्संग करना भी उन्हें अच्छा लगता था, जब भी उनसे मिलने कोई आता कबीर जी उनके साथ रात में ही प्रभु की सत्संग शुरू कर देते, आस पास के लोगों को अच्छा नहीं लगा (लोगों को निंद लेने बाधा उत्पन्न होने लगी)।


तब सभी ने मिलकर सोचा आखिर हम कबीर जी को कैसे कहें कि तुम्हारी सत्संग से हमें परेशानी होती है, किसी ने कहां कुछ ऐसा करें कि कबीर जी खुद ये गांव छोड़ दूर चले जाएं, गांव के कुछ लोगों ने मिलकर एक तरकीब निकाली कि जिवित भंडारे के आमंत्रण पत्र छपवा कर सारे संतों के भिजवा देते हैं, जब बड़े बड़े साधु संतो का आगमन यहां होगा तो कबीर लज्जा के कारण काशी छोड़ कर चले जाएंगे ।



लोगों ने तारीख के साथ आमंत्रण पत्र छपवाकर कबीर जी के दस्तखत कर दिए, वे पत्र हर जगह के साधु संतों को भिजवा दिए ! काशी में कबीर जी भक्त हैं इस नाम को सभी जानते थे लेकिन मिलना-जुलना कम ही होता था, कुछ दिनों के बाद भंडारे की तारीख के साथ संत काशी में आने लगे, इधर कबीर भिक्षा के लिए घर से बाहर निकले कबीर जी ने देखा आज इतने संत एक साथ कहां जा रहे हैं, कबीर ने पास में जाकर एक संत से पुछा: आज सारे साधु संत मिलकर कहां जा रहे हो, तब उस संत ने कहां: इसी काशी में एक भक्त कबीर है जिन्होंने जिवित भंडारे का निमंत्रण हम सब को दिया हैं उन्हीं के घर जा रहे हैं।



संत की बात पर कबीर जी आश्चर्य में पड़ गएं कबीर जी को संत की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! तब संत ने कबीरजी को वह आमंत्रण पत्र दिखाया, कबीर जी ने जब उस पत्र (कुंकुपत्री) को देखा तो बिना कुछ कहे कबीरजी घर से दुर निकल गये, आंखों से आंसूओं की धारा बह रही थी,उनको समझ नहीं आ रहा था ये किसने और क्यूं किया ‌।
कबीर जी ने भगवान से कहां हे प्रभु मैं नहीं जानता मेरे साथ ऐसा किसने किया, इतने साधु संतों को भोजन करवाने के लिए घर में अन का एक दाणा नहीं है ! मेरा कोई भाई भी नहीं जो मुझे आकर धीरज बंधाए, यदि मैंने सच्ची भावना से भक्ति की हैं तो मेरा लाज रख लो, कबीर जी ने कहां: या तो मेरा काम सुधारों नहीं तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा ।

दोहा (कथनी)-

आप कबीर जी केवण लागा, सुण लिजो रघुवीर ।

या तो मेरा काज सुधारों, नहीं तो तज दूं शरीर ।।


 जब कबीर जी की आवाज़ भगवान के कानों तक पहुंची ।

दोहा (कथनी)- 

मथुरा नगरी में बैठे कृष्ण, सुण लीनी तजवीर ।

मेवा और मिठाई भरने, कर लीनी बालद विर ।।


भगवान कृष्ण तरह तरह के भोजन को रथ (बालद) में भरकर मथुरा से काशी को रवाना हो गये, काशी पहुंचते ही भगवान ने कबीर का स्वरुप बना लिया, कबीर जी के घर जा पहुंचे अब भगवान खुद कबीर के स्वरुप में संतो की सेवा करने लग गए,जब भोजन का समय हुआ तब भगवान ने सारे संतों को एक साथ पंगत में बैठाया और भोजन करवाया, संत कबीर जी के घर आदर भाव देखकर बहुत प्रसन्न हुए ।


दोहा (कथनी)-

मेवा ने मिठाई जिमावे और जिमावे खीर ।

दौड़ घर को आया कबीर नैणे आयो नीर ।।

भोजन करने के बाद सभी साधु संत कबीर जी की खुब तारीफ की, ऐसा कहां जाता है साधु संतों के भंडारे शंख व नगारे बजाएं जाते हैं,जैसे ही साधु संतों ने शंख व नगारे बजाएं, कबीर जी के कानों में आवाज़ पहुंची कबीर जी दौड़कर अपने घर को आएं तो उन्होंने देखा एक कबीर संतो की सेवा में खड़ा हैं। कबीर जी ने जब अपने ध्यान करके भगवान को देखा उनकी आंखों में आंसू आ गएं, भगवान ने आकर कबीर जी के आंसू पोंछे और कहां: अब रोना बंद करो अब तुम भी भोजन करो, फिर साधु संतों को भेंट देकर विदाई दो ।




कथनी :-

काशी में जात जलावे, निर्गुण भक्ति चलाई ।

प्रेम काज हरि आ गया, बालद लान ढलाई ।।








Thursday, 10 September 2020

राजा गोपीचंद का जीवन


नवीं शताब्दी में राजा त्रिलोकचंद घाटा बंगाला का राज करते  थें, राजा त्रिलोकचंद की पत्नी का नाम मैणावती था जो राजा भर्तृहरि की बहन थी,बंका पहाड़ों में जोगी जालंधर नाथ जी तपस्या कर रहे थे,एक दिन नाथ जी ने अपने शिष्य से कहां: बेटा ये मेरी झारी (पात्र) लेके जाओ जल्दी जल भरकर ले आओ ।


किसी तलाब से लाना मत, कहीं खड्डे में पड़ा भी लाना मत, नदी से मत लाना, किसी समुद्र से भी मत लाना, कुएं से मत लाना, मटके का भी मत लाना, किसी से मांगकर मत लाना, और खाली हाथ भी मत आना । शिष्य ने कहां हे प्रभु अब ये झारी (पात्र) कहां से और कैसे भरकर लाऊं,


 नाथजी ने कहां:
                                जाओ घाटा बंगाला में राजा त्रिलोकचंद उनकी अर्द्धांगिनी के हाथों से ये झारी भरके आ जाओ, शिष्य त्रिलोकचंद के महल (घाटा बंगाला) जाकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई, साधु को देख रानी मैणावती ने नमस्कार किया,, शिष्य ने कहां हे ! देवी ये पात्र मुझे जल से भरवा दीजिए मुझे आगे संतो के समागम में जाना है, रानी मैणावती ने मन में सोचा ये साधु जल मांग रहा हैं और क्यूं ना इनका पात्र में दुध से भर दूं ! रानी मैणावती दुध लाकर साधु (शिष्य) के पात्र में डाला मगर पात्र में दुध कम पड़ गया, रानी ने फिर से दुध लाकर पात्र (झारी) में डाला मगर वह पात्र भरा नहीं, तब मैणावती ने कहां महाराज आप साधु नहीं कोई जादुगर हो,तब उस शिष्य ने कहा: नहीं माता मैं अपने गुरुजी के लिए जल लेने आया हूं !



मैणावती रानी ने कहां: चलिए मुझे भी आपके गुरुजी के दर्शन करवा दीजिए ! शिष्य व रानी मैणावती वंका पहाड़ी में पहुंचे, रानी मैणावती ने जालंधरनाथ जी को देख नमन किया, जालंधरनाथ जी ने कहां मांगों बेटा तुम्हे क्या चाहिए, रानी मैणावती ने कहां हे ! प्रभु पुत्र के बिना मेरी कोख सुनी हैं, नाथजी महाराज खुश ने आशीर्वाद दिया और कहां बेटा तुम सत्यवती हो जहां सत्य होता है वहां ब्रह्म होते हैं जहां ब्रह्म वहां हम ! निसंकोच रहो तुम्हारी मुराद भगवान जल्द पूरी करेंगें ।


कुछ वर्षो में ही राजा त्रिलोकचंद के घर रानी मैणावती की कोख से एक पुत्र का जन्म हुआ,जिनका नाम गोपीचंद था, नगर (शहर) में ढिंढोरा पिटवा कर राजा के घर पुत्र प्राप्ति की दावत रखीं, एक रात रानी मैणावती ने त्रिलोकचंद से कहां: स्वामी कल सुबह ही हम और आप बंका पहाड़ जाएंगे जालंधरनाथ जी के आशिर्वाद से हमारे निजी जीवन में खुशियों की बौछार हैं,


अगले ही दिन राजा त्रिलोकचंद अपने पुत्र गोपीचंद व रानी मैणावती के साथ जलंधरनाथ जी के आश्रम में पहुंच गए, राजा व रानी ने दंडवत नमस्कार किया, पुत्र को देख नाथजी को अति प्रसन्नता हुई,फिर अचानक जलंधरनाथ जी का चेहरे पर उदासी छा गई, राजा त्रिलोकचंद ने जब उनकी उदासी का कारण पुछा: तो जलंधरनाथ जी ने कहां: भगवान शिव की कृपा से तुम दोनों की इच्छा पुर्ति से मैं स्वयं बहुत खुश हूं परन्तु...........


राजा त्रिलोकचंद ने कहां: हे ! ऋषिराज परंतु क्या,
जालंधरनाथ जी ने कहा: राजन् आपके जीवन में इस बालक का साथ 18 वर्ष तक का ही हैं, वर्ष के अंत में बालक भगवान को प्यारा हो जायेंगा, ये सुन रानी मैणावती के होश उड़ गए, रोती बिलखती हुई रानी नाथजी के चरणों में आ गिरी , हे ! प्रभु ये कैसा इंसाफ है खुशियों की झोली भरकर सारी खुशियां छीन लेना ।
जलंधरनाथ जी ने कहा: बेटी विधी (विधाता) का लिखा कोई पलट नहीं सकता, मैं एक पंथ (रास्ता)बता सकता हूं मगर उस पथ से कभी विचलित मत होना ।


जलंधरनाथ जी ने कहां: ये बालक 17 वर्ष के बाद यदि आप दोनों की भक्ति व अच्छे कर्मों के फल से जोगी (साधु) बन जाएं तो भगवान शिव की कृपा इस बालक पर हो सकती है, जोगी बनने पर वह सिर्फ आपका नहीं परमात्मा का पुत्र बन जायेगा, फिर उसकी फ्रिक आपको नहीं परमात्मा को हैं ! लेकिन याद रखना जोग तो भोगना ही पड़ेगा ।

मैणावती ने रोते हुए वचन दिया कहा : मैं गोपीचंद की माता मैणावती मेरे भरतार व साधु संतों के समक्ष ये वचन देती हूं मैं अपने पुत्र को जोगी बनाऊंगी,राजा त्रिलोकचंद व रानी मैणावती ने जलंधरनाथ जी का आशीर्वाद प्राप्त कर अपने महल को आ गए, भगवान शिव की आराधना के साथ अपना जीवन व्यापन करने लगें, प्रतिदिन रानी मैणावती व राजा अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करते रहे, समय निकलता गया गोपीचंद जब 14 वर्ष के हुए तब उनके पिता त्रिलोकचंद ने सोचा क्यूं न अपने पुत्र की शादी कर देता हूं इस माया में पड़ जाने के बाद वह जोगी (साधु) नहीं बनेगा, (मौत ही मेरे पुत्र की किस्मत है तो इसे कोई टाल नहीं सकता) ।


राजा त्रिलोकचंद ने अपने पुत्र गोपीचंद की शादी 16 रानियों से करवा दी, कुछ ही महीनों बाद राजा त्रिलोकचंद देवलोक गमन कर गए,राज को संभालने के साथ राजा गोपीचंद अपना गृहस्थ जीवन व्यापन करने लगे, माता मैणावती को बहुत दुःख हो रहा था, (जालंधरनाथ के वचन अनुसार गोपीचंद को 18वे वर्ष में जोगी बनाकर भक्ति के रास्ते भेजना होगा) ।
एक दिन राजा गोपीचंद सोने की बनी कुंडी में स्नान कर रहे थें, ऊपर महल से माता मैणावती ने गोपीचंद को देखा उनकी आंखों के आंसू गोपीचंद की पीठ पर गिरे,,


कहते हैं: दुःख के आंसू गरम व खुशी के आंसू ठंडे होते हैं, गोपीचंद ने अपनी माता को रोते देख, गोपीचंद अपनी माता के पास आए और दुःखी होने का कारण पुछा ! तब माता मैणावती ने सारी बात राजा गोपीचंद को बताई और कहां: बेटा तुम्हारे पिताजी की तरह हम सबको एक दिन चले जाना है, लेकिन जालंधरनाथ जी के वचन मुताबिक अभी तुम 18 वर्ष के हो चुके हों ।


उसी क्षण राजा गोपीचंद ने अपनी माता को नमन करके जोगी बनकर भगवान की भक्ति करने का वचन दिया ! जब यह खबर इस पास में फैली सारी नगरी के लोग राजा गोपीचंद के ना जाने को कह रहे थें, लेकिन राजा गोपीचंद को सिर्फ जोगी का वेश पहनकर अपनी माता के चरण छुए तब मैणावती ने गोपीचंद को 3 बातें बताई :
1. ऊंचे से ऊंचे कोर्ट (क़िले) में रहना ।
2. सदैव स्वादिष्ट भोजन करना ।
राजा गोपीचंद ने कहा: माता ये सब सुख यहां हैं ! वहां कैसे मिल सकता है।
मैणावती ने कहां: पुत्र ये सिर्फ दिखावे का सुख है,संतो के साथ हमेशा सत्संग में रहना ये सबसे बड़ा कोर्ट (क़िला) है,भुख लगे तो ही भोजन करना तुम्हें हर भोजन स्वादिष्ट लगेगा, माता का आशीर्वाद लेकर जालंधरनाथ जी को गुरु बनानें के लिए निकल पड़े, जालंधरनाथ को गुरु बनाकर भक्ति में लीन हो गए भक्ति करते-करते गोपीचंद उज्जैन पहुंचे, उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे अपने मामा राजा भर्तृहरि के पास अलग धुणा बनाकर तपस्या की ।

दोहा:

गोपीचंद जोगी भया लीना भगवा बाना ।

राज पाठ छोड़ घर घर अलख जगाना ।।


Friday, 4 September 2020

संत पीपाजी का भगवान मिलन

पीपाजी महाराज 


पीपाजी का का जन्म 1426 ई. में (चैत्र सुदी पुर्णिमा) को राजपुत परिवार में माता लक्ष्मीवती की कोख से गागरोन गढ़ कोटा (राजस्थान) में हुआ,


गागरोन का राज्य संभालने के साथ-साथ भगवान की भक्ति भी करते थे, (माता के भक्त) एक दिन रामानंद महाराज की सत्संग पीपाजी के गागरोन में हुई,तब पीपाजी रामानंद जी के शिष्य बन गए, पीपाजी का मन राज पाट छोड़ भगवान की भक्ति करने में लग गया, पीपाजी की 1 रानी सीता ने कहां यदि आप भजन करेंगे तो मैं भी आपके साथ भक्ति करना चाहती हूं, पीपाजी ने मन में सोचा एक से भले दो अच्छे ! (आखिर करनी तो हमें भक्ति है), आषाढ़ शुक्ल पुर्णिमा संवत 14सौ ई. में राज-पाट अपने भाई को सौंप दिया ।


माता सीता व पीपाजी दोनों एकांत में एक कुटिया बनाकर भगवान का भजन करने लगे,पीपाजी जी की भक्ति से प्रेरित होकर अनेक संतों का आवागमन उनकी कुटिया पर रहता था, बिना भोजन के पीपाजी किसी को जाने नहीं देते थे, एक दिन पीपाजी घर नहीं थें, 4/5 संतो आना हुआ तब माता सीता ने देखा तो घर में रसोई बनाने का समान भी खत्म हो गया था, माता सीता ने सोचा अगर संत बिना भोजन किये बिना निकल गए ! तो हमारा भक्ति के साथ जीना भी निष्फल है ।



माता सीता एक सेठ की दुकान गई जिसका नाम आरबिया  था (जहां से किराने का सामान आता था) वहां माता सीता ने कहां : सेठजी मेरे घर पर संत पधारें है, कुछ सामान की जरूरत है पीपा जी आते ही सामान का हिसाब दे देंगे, पुराने पैसे बाकी होने के कारण सेठ ने मना कर दिया, माता सीता ने कहा: मेरे पास गिरवी रखने के लिए भी कुछ नहीं है, और संतो को भोजन करवाना है ! (अरबिया) सेठ सीता को देख  उसकी बुद्धि हीन हो गई और सीता से कहां : सामान आपको मिल जाएगा उसके लिए कर्ज चुकाना पड़ेगा,


माता सीता : आप जो बोलोगे वह कर लूंगी,बस संतो को भोजन करवाना जरूरी है, तब सेठ ने कहां: ठीक है तो सामान के बदले आपको एक रात पति पत्नी की तरह मेरे साथ (महल में) रहना पड़ेगा, यह सुनते सीता के पैरों के नीचे से ज़मीन खींचक गई, अब वह करती भी क्या । बस संतो की खुशी के लिए माता सीता ने सेठ से कहां: सेठ मैं वचन देती हूं संतो को विदा करने के बाद में आपके महल आ जाऊंगी, माता सीता घर जाकर संतो को भोजन करवाया, संतो ने माता सीता को प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया,संध्या हो गई थी, रानी सीता अपने वचन के मुताबिक सेठ के घर रवाना हो गई ।


रास्ते में पीपाजी सामने मिल गए, सीता से पुछा: इस समय आप कहां जा रहे हो, सीता ने सारी बात पीपाजी को बताई और कहां : संतो को भोजन करवाने के लिए मैंने आज ये बदन (काया) गिरवी रख दिया, पीपाजी ने शांत भाव से कहां कोई बात नहीं साधु संत भोजन पाकर गए ये हमारे लिए खुशी की बात है, आइये रात्रि का समय है मैं आपको सेठ के घर तक छोड़ देता हूं, सेठ के महल के आगे जाकर पीपाजी ने आवाज लगाई आरबिया सेठ ये मेरी रानी बाहर खड़ी है दरवाजा खोले ।


पीपाजी की आवाज सुनकर सेठ थर थर कांपने लगा, गागरोन के राजा आज उनकी पत्नी के वचनों को निभाने के लिए इतने निर्मम हो गए हे ! भगवान मेरी बुद्धि हीन कैसे हो गई, बस यह कहकर पीपाजी कुटिया को निकल गये, सेठ एक चुनडी़ (ओढ़नी) लेकर बाहर आया और सीता के पैरों में गिर पड़ा, बहन मुझे माफ़ कर दो, मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी ।


रानी को चुनडी़ ओढ़ाकर वापस सेठ (आरबिया) सीता को लेकर पीपाजी की कुटिया पर गया और पीपाजी को आवाज लगाई बहनोई सा (बहन का भाई) आज से ये मेरी बहन है, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिन्दा हूं । पीपाजी सुनकर बहुत खुश हुए और भगवान से कहां हे ! प्रभु मुझे आप पर पुर्ण विश्वास था,आप कुछ ऐसा ही करोंगे ।

तब पीपाजी ने लिखा: 

पीपा परमेश्वर तणा मता नहीं जाणे कोय ।

आरबिया ऊंबा रेगा हरि करें जकी होय ।।

अर्थ:     

             पीपाजी ने भगवान से कहां आपकी पहचान हर कोई नहीं कर सकता,आरबिया जैसे लोग हर जगह हैं लेकिन वहां जो परमात्मा चाहे वहीं होता है ।

Tuesday, 1 September 2020

आए थे हरि भजन को (कबीर कहावत)

"आए थें हरि भजन को ओटन लगे कपास"



साहेब कबीर युवा अवस्था में ही ईश्वर की ओर झुक गए, ना चाहते हुए भी कबीर को पारिवारिक बंधन में बंधना पड़ा, जब पारिवारिक बंधन में बंध ही गए तो दुनिया से विमुख कैसे हो पाते,, अतः वे अपनी गृहस्थी चलाने के लिए काम करने लगे ! मजदूर की तरह सुबह से शाम तक काम में लगे रहते थे, कुछ दिन बाद कबीर पक्के जुलाहे (बुनने वाला) बन गए थे, धीरे-धीरे कबीर ने घर पर ही कपड़े बुनने का काम शुरू कर दिया, पुरा दिन कपड़े की बुनाई (काम) में चला जाता था ।



प्रभु भक्ति के लिए समय ना मिलने पर अपने हृदय में परमात्मा को दिन भर याद करते रहते थे, एक दिन कबीर ने निश्चय कर लिया आज से कुछ दिन काम करेंगे कुछ दिन परमात्मा की सत्संग में भरेंगे, ऐसे ही कबीर का जीवन चलता रहा, (साहेब कबीर गृहस्थी होते हुए संत थे संत होते हुए गृहस्थी थे) फिर उनके घर कमाल और कमाली का जन्म हुआ ! तब वे जरुरतों के मुताबिक काम में और समय देने लगे, अब कबीर रोज सुबह उठकर कपास से सुत, सुत से धागा, धागे पूनी आदि बनाने में शाम तक लगे रहते, काम की वजह से कबीर सत्संग में नहीं जा पाते थे संतो से मिलना-जुलना कम हो गया ।




अधिकतर साधु संत उनकी साधना व उनके जीवन को भली भांति जानते थे, तब साधु संत खुद कबीर से मिलने उनके घर आने लगे, एक बार कबीर का 1 प्रिय साथी व और भी संत उनके घर आएं, जब वे कबीर की कुटिया के पास पहुंचे ! उन्होंने देखा कबीर बुनाई के काम में लगे हुए हैं, कुछ धीरे-धीरे गुनगुनाए जा रहे थे, वे कबीर को बस देखते रहे, जब कबीर की नज़र उन पर पड़ी तो कबीर कह उठे आओ संत गण ! बैठो, वे संत फिर भी कबीर को एकटक देख रहे थें ।


कबीर ने कहा: क्या सोच रहे हो..?  
उनमें से 1 संत ने कबीर कहा: आएं थे हरि भजन को ओटन लगे कपास, कबीर ने जब सुना तो मुस्कुरा दिए, तब से ये कहावत लोकप्रिय हो गई ।

अर्थ:- 

वांछित कार्य को छोड़कर, किसी अन्य कार्य में लग जाना ।

Sunday, 30 August 2020

सेवादास जी महाराज, जीवनी

सेवादास जी महाराज का जन्म नागौर जिले के मेड़ता तहसील में एक गांव में लांबा जाटान हुआ ।



सेवादास जी महाराज एक दिन अपने बड़े भाई के साथ खेत में हल चला आ रहे थे, बड़े भाई ने सेवादास जी को बोला सेवा हल की हलवाणी (हल के नीचे लगने वाली पाती) को लेकर जाओ लोहार के घर से पाना (तीखा) करवा कर लें आओ, रिमझिम बारिश हो रही थी सेवादास जी हलवाणी को लेकर लौहार के पास गए  लौहार ने कहां: सेवा भाई मेरे पास कोयला खत्म हो गया अब हलवाणी का पाना (तीखा) कैसे करूं (कोयले की आग से ही उसको तीखा किया जाता था,,)
सेवा भाई कहीं से कोयला ले आओ,,



तब सेवादास ने सोचा गांव में इतने घर है शायद किसी के घर पर कोयला मिल जाएं ! सेवादास जी एक एक बार सभी जनों के घर गए वहां जाकर थोड़ा सा कोयला मांगा, बारिश का समय था लकड़ियां सुखी नहीं थी इसलिए कोयले से लोग खाना बनाते थे, तो लोगों ने कोयला घर में होते हुएं भी मना कर दिया,, सेवादास जी गांव के लोगों पर निराश हो गए और गांव के लोगों को कहने लगे ! वाह गांव वालों वाह मैंने आज अंदाजा लगा लिया ।


 सिर्फ कोयला मांगने से मुझे आप सब की पहचान हो गई,, तुम लोग इतनी सी मदद नहीं कर सकते हो कल किसी व्यक्ति पर आई मुसीबत के साथी क्या बनोगे । फिर वहां सेवादास जी ने इस जीवन को नाशवान बताया व भगवान की भक्ति करने की मन में ठान ली । लांबा जाटान गांव से 2 किमी दूर बामणी नाडी (तालाब) की पाल है, वहां जाकर भगवान का भजन करने लगे,कहते हैं निंद्रा कभी भक्ति करने नहीं देती,जब भी आंख बंद कर ध्यान लगाते सेवादास जी को कुछ देर बार निंद आ जाती, सेवादास जी ने सोचा ऐसे तो मैं भक्ति नहीं कर पाऊंगा, उस नाडी के तट पर एक नीम का पेड़ था पेड़ का एक भाग नाडी के (पानी के) ऊपर आया हुआ था,




सेवादास जी उसी डाल पर बैठकर भगवान की भक्ति करने लगे, फिर से उन्हें नींद आ गई तो वह पानी में गिर गए ! सेवादास जी को खुशी हुई और कहां: ये जगह भक्ति करने के लायक है जब भी नींद आएगी पानी में गिरेंगे तो आंख खुल जायेंगी,वापस डाल पर चढ़ जाएंगेे, सेवादास जी बार बार पानी में गिरते वापस उसी पेड़ (नीम) की डाल पर चढ़ जाते, दिन जब वर्षों में बदल गए । सेवादास जी भक्ति में ऐसे लीन हो गए खाना पीना छोड़ दिया,, कहते हैं कि भक्ति में तप हो तो भगवान को आना ही पड़ता है, भगवान सेवादास जी महाराज के पिछे एक हाथ में पकवान का थाल (थाली) लेकर खड़े खड़े आवाज़ लगाई ।

कहां :-

मांग्या मिला नी कोयला बिन मांगे पकवान ।

सेवा तेरी अरज सुण आए खड़ा भगवान ।।

अर्थ: 

                         भगवान ने सेवादास जी से कहां: मांगने पर कोयले नहीं मिले तो क्या हुआ ! मैं बिना मांगे तेरे लिए पकवान लेकर आया हूं सेवा एक बार पिछे मुड़कर देख तेरी भक्ति से प्रसन्न होकर में आया हूं ।
जब सेवादास जी ने मुड़कर देखा तो आंखों से आंसू निकलने लगे भगवान ने सेवादास के आंसू पोंछे,और अपने हाथों से सेवादास जी को भोजन करवाया,,भगवान ने वचन दिया सेवादास तेरी इस तपो भूमि पर आने वाले हर एक श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होगी, ऐसे संत हुए सेवादास जी जिनका आज मंदिर वहीं बना हैं उसी नीम के निचे (बामणी नाडी की पाल) ।

कहां है:-

 पुष्कर जेडी़ पेढिया सेवा जेड़ा संत ।

गादी गिरधर दास री तारे जीव जंत ।।

अर्थ -

                    इस जगह को भक्तों (श्रद्धालुओं) ने पुष्कर धाम की तरह माना है, यहां गादीपति गिरधर दास जी थे फिर सेवादास जी महाराज हुए, यहां पर कई जीवो उद्धार होता है । 

---जय श्री राम 🚩---

               

Saturday, 29 August 2020

परसाराम जी खाती, जीवनी

परसाराम जी खाती

परसाराम जी खाती का जन्म विक्रम संवत 1519 में गांव कलरूं (राजस्थान) में हुआ, ये गांव नागौर जिले के मेड़ता तहसील में स्थित है ।


परसराम जी बचपन से ही माता के भक्त रहे, फिर एक दिन पीपाजी महाराज का आगमन उनके घर पर हुआ,पीपाजी महाराज ने उनको श्री राम का भक्त बना दिया,,
एक बार मेड़ता के राजा जयमल जी जोधपुर जा रहे थे, कलरुं गांव के पास मार्ग में उनके रथ का पहिया टूट गया,जयमल जी के साथ थे लावा (गांव) के ठाकुर लक्ष्मण सिंह उनको व हलकारों को नजदीक गांव कलरूं से खाती (मिस्त्री) लाने को भेजा, राजा के संत्री कलरूं गांव में जाकर खाती के बारे में पूछा तब लोगो ने खाती परसराम जी का घर बताया, लेकिन उस समय परसराम जी संतो की सेवा में लगे थे,

 भगवान  ने मन में सोचा मेरा भक्त संत सेवा में लीन है तो क्यों ना मैं अपने भक्त का काम कर देता हूं ! भगवान खुद परसराम खाती बनकर उनके सामने आ गए,कारीगर के मिल जाने पर सबको को खुशी हुई, भगवान कारीगर बने हुए राजा जयमल जी के पास गए व उस रथ के पहिए को ठीक किया, राजा जोधपुर को रवाना हो गए,आगे जाकर हलकारे (संत्री) देखते हैं रथ के तीन पहिए धरती पर टिके हूए चल रहे हैं, मगर जिस पहिए को ठीक किया गया वह बिना धरती के लगे चल रहा था ।


उन सब ने ये बात राजा को बताई राजा जयमल खुद रथ से उतरकर देखा तो वाकई में एक पहिया जमीन से 1 फीट ऊंचा था, राजा जयमल को आश्चर्य हुआ, फिर से राजा ने पहिए को गौर से देखा तो उस पहिए में ना कील थी ना कोई जोड़ था,ये देख जयमल जी और भी आश्चर्य में पड़ गए, तब उन्होंने लावा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह को कहां उस परसराम खाती को वापस बुलाओ, परसराम को बुलाया और कहां जिस तरह इस पहिए को बनाया वैसे तीनों पहियों को बना दिजिए, जब परसराम जी ने पहिए को देखा वह भी आश्चर्य में पड़ गए, राजा से कहां ऐसा पहिया ना मैं बना सकता हूं ना कोई कारीगर बना सकता है। परसराम जी ने कहा: ऐसी बिना जोड़ की कारीगरी परमात्मा के अलावा कोई नहीं कर सकता ।



सबने ने कहां : क्या कह रहे हो परसाराम जी हम सभी अपनी आंखों से आपको पहिया ठीक करते देखा है, परसाराम ने कहां: हे राजन् मैंने ये पहिया नहीं बनाया आप उन संतों से पुछ लिजिए मैं सुबह से अभी तक उनकी सेवा में था । तब जयमल जी को पश्चाताप होने लगा भगवान खुद आए मगर वो पहचान नहीं कर पाएं, राजा जयमल जी ने कहां : परसजी आप भगवान को पुनः बुलाए,अब तो मैं परमात्मा के दर्शन के लिए इच्छुक हूं !



परसराम जी ने कहां : राजन् सिर्फ कहने पर भगवान कभी दर्शन नहीं देते हैं, राजा ने हाथ जोड़कर कहां : परस जी आप चाहें तो भगवान के दर्शन हो सकते हैं अगर आपने मुझे दर्शन नहीं करवाएं तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा ।

राजा ने कहां

नहीं जाऊं मैं मेड़ता नहीं जाऊं जोधाण ।

प्राण तजु तुझ बारणे,मोहे गुरु की आण ।।

विनय करें कर जोड़कर,कहे जयमल राय ।

के तो हरि मिलाय दे,के मरु कटारी खाय ।।


अर्थ:

                            राजा जयमल जी ने कहां : अब ना तो मेड़ता जाऊंगा ना जोधपुर जाऊंगा, कसम मेरे गुरु की यहीं प्राण त्याग दूंगा, हाथ जोड़कर जयमल जी ने फिर कहां या तो मुझे भगवान से मिलवा दो नहीं तो मैं अपनी तलवार से अपने आप को खत्म कर दूंगा ।


तब परसराम ने भगवान से प्रार्थना की है प्रभु आप तो सर्वोपरि हो, घट घट की पहचान है आपको हे ! प्रभु एक बार मेरी प्रार्थना स्वीकार करें । बस उसी क्षण भगवान ने राजा जयमल को वह दर्शन दे दिए,, ये घटना संवत 1604 में चैत्र सुदी, बुधवार की है । राजा जयमल अति प्रसन्न हूए और परसराम जी को संतो की सेवा के लिए 500 एकड़ ज़मीन भेंट की व कलरुं गांव में चतुर्भुज जी का मंदिर बनवाया ।
विक्रम संवत 1681 में परसराम जी ने समाधि ली,

 भाद्रपद में परसराम जी का दिन होता है,तब पुरे कलरूं गांव की सरहद में केसर की रिम झिम बारिश होती है।




Friday, 28 August 2020

रामदास जी खेड़ापा, जीवनी

रामदास जी खेड़ापा

रामदास जी का जन्म (बीकमकोर) भिकमकोर में मेघवाल परिवार में हुआ,भिकमकोर जोधपुर जिले में ओसिया गांव के पास स्थित है। बचपन से ही रामदास जी ने अपना तन मन भक्ति में लगा दिया था, महाराज जी जहां भी जाते थे वहां राम नाम का सुमिरन करते थे, सुमिरन करते करते महाराज एक दिन जोधपुर के खेड़ापा गांव में पहुंचे, 


रामदास जी ने सोचा कुछ दिन यहीं परमात्मा का सुमिरन करते हैं,महाराज ने वहीं राम नाम की धुन लगाई खेड़ापा गांव के लोग महाराज को सुमिरन करते देखा तो सबको बहुत खुशी हुई ! सभी ने कहां हमारे गांव में ऐसे परम पुरुष पधारे हैं ये हमारा सौभाग्य है। गांव के सभी लोग महाराज की देखभाल करने लगे,कोई कहता आज महाराज भोजन मेरे घर करेंगे,सभी गांव वाले महाराज के साथ भगवान का भजन करने लगे,१/२ महिने के बाद गांव वालों को किसी ने आकर कहां: जिनको आप महाराज महाराज कर रहे वो कौन है ! पता है, गांव वालों ने कहां : नहीं पता हमें ।


तब उसने कहां: ये महाराज भिकमकोर का मेघवाल है, तब सभी ने कहां अब हम क्या करे, इन्होने तो हर घर में रसोई की है हम सब तो भ्रष्ट हो गए, सभी खेड़ापा वासी जोधपुर दरबार के पास फरियाद लेकर गए, जोधपुर दरबार ने कहां: आप सब की बोलो क्या फरियाद है।

गांव वालों ने कहा: भिकमकोर से एक मेघवाल जाति का महाराज हमारे यहां राम नाम का सुमिरन करने लगा, तो हमें सोचा कोई संत हैं उसने १/२ महिने में हम सब के घर रसोई कर कर के हमें भ्रष्ट कर दिया, ऐसा कहां जाता है: जोधपुर दरबार रथ लेकर खेड़ापा आए,और रामदास जी महाराज को कहां: महाराज आप भक्ति कर रहे हो बहुत अच्छी बात है,लेकिन गांव वालों को बता देना चाहिए था, आप मेघवाल जाति के हो,, 

तब रामदास जी ने जोधपुर दरबार से कहां: ये मुझसे भुल हो गई मैंने गांव वालों को ये नहीं बताया मेरी ये काया(चमड़ा) मेघवालों के घर की है, रामदास जी महाराज ने कहा: इस दुनिया को संत बनने के बाद भी जाति से ऐतराज है तो ये लिजिए मेरी काया, रामदास जी ने चमड़ा उतार कर जोधपुर दरबार के सामने रख दिया,ये चमत्कार देख गांव वाले थर थर कांपने लगे,

रामदास सिमरे राम ने गांव खेड़ापा माई ।

राजा प्रजा निवण करें फिर गई राम दुहाई ।।


 दरबार ने हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगी कहां हे ! प्रभु ऐतराज़ मुझे नहीं दुनिया को था, लेकिन अब सब की भ्रमना दुर हो गई,, फिर सभी लोगों ने रामदास जी से माफ़ी मांगी । रामदास जी ने कहा: संत बनने के बाद किसी भी संत की जाति नहीं होती, उनकी सिर्फ एक ही जाति होती है सनातन धर्म ।।

जाति मत पुछो संत की, पुछ लेना ज्ञान ।

मौल करो तलवार का,पड़ी रेण दो म्यान ।।


                            

Tuesday, 25 August 2020

शेख फरीद व डूंगरपुरी मिलाप

"डुंगरपुरी जी महाराज"

शेख फरीद को अपनी भक्ति पर अभिमान हो गया था,उसने सोचा अब मेरी माला सफल हो गई,शेख फरीद अपनी माला का दुरुपयोग करने लगा, पक्षियों को कहता: पक्षियो मर जाओ, पक्षी मर जाते ! वापस जिंदा हो जाओ: पक्षी जिंदा हो जाते,, कुछ दिनों में ही माला का तप पुरा हो गया ।
फिर एक दिन शेख फरीद अपने मुख से पशु पक्षियों को वहीं बोला (सारे मर जाओ) कोई फर्क नहीं पड़ा ।



शेख फरीद को बहुत दुःख हुआ, उसे पता चल गया उसके अभिमान के कारण बचपन से (जो भक्ति की) उसकी माला का तप खत्म हो गया,,शेख फरीद बहुत दुःखी था,तब किसी ने शेख फरीद को बताया, हिन्दू धर्म में एक प्रवीण संत हैं डूंगरपुरी जी महाराज जो राजस्थान में है उनको अपने यहां बुलाकर सत्संग करवाओ और आप उनके शिष्य बन जाओ आपका जीवन सार्थक हो जायेगा।



तब शेख फरीद ने डूंगरपुरी जी महाराज को पत्र लिखा: पत्र में अपने यहां आने व शिष्य बनने की बात रखी,महाराज ने पत्र लिखकर जबाब भेज दिया ! फिर दुसरे ही दिन डूंगरपुरी जी महाराज अपने एक नये शिष्य को साथ लेकर रवाना हो गए,(वह शिष्य कुब्दी व लालची था) शेख फरीद के वहां से कुछ दुरी पर ही रास्ते में महाराज को प्यास लगी तो अपने शिष्य को कहा बेटा वहां एक कुआं है तुम पानी का एक कमंडल (झारी) भर कर लेके आ जाओ, महाराज जी का शिष्य कुएं पर गया, उसने मन में सोचा शेख फरीद व डूंगरपुरी जी का मिलन कभी नहीं हुआ, क्यों ना मैं डूंगरपुरी बनकर शेख फरीद के वहां चला जाऊं, महाराज को इस कुएं में धकेल देता हूं ! शेख फरीद के वहां से जो भी भेंट (पैसा) होगा वह लेकर कहीं दूर चला जाऊंगा ।



अब वह शिष्य महाराज जी से बोला इस कुएं के पानी में कुछ है,आप खुद देख लिजिए ! डूंगरपुरी जी ने आकर जैसे ही कुएं में देखा तो पिछे से उस शिष्य ने धक्का दे दिया,और वह शिष्य सीधा शेख फरीद के चला घर गया, शेख फरीद ने सोचा डूंगरपुरी जी महाराज यहीं है ! शेख फरीद ने डूंगरपुरी जी समझकर उस शिष्य का खूब स्वागत किया, डूंगरपुरी जी के आसन पर वह शिष्य जाकर बैठ गया ।



उधर डूंगरपुरी जी महाराज जिस कुएं में थे, वहां से कुछ औरतें खेत से अपने अपने घर जा रही थी जैसे ही औरतो के पैरों में पहने गहनें आवाज़ महाराज जी के कानों में पड़ी, तब महाराज जी ने कुएं से आवाज लगाई बेटा मैं आंखों से अंधा हूं मुझे बाहर निकाल लिजिए, एक औरत के कानों तक आवाज पहूंची तो उसने दुसरी औरत से कहां इस कुएं से हमें मदद के लिए किसी ने आवाज लगाईं है, जब कुएं में देखा तो सारी औरतों ने अपनी ओढ़नी को गांठ बांधकर एक किया (महाराज जी अपने शरीर को फूल जैसा हल्का बना लिया)
और महाराज जी को कुएं से बाहर निकाल दिया ।



फिर बाद में डूंगरपुरी जी महाराज ने अपना नाम पता उन महिलाओं को बताया,और कहां मुझे शेख फरीद के वहां जाना है ! रास्ता बता दीजिए,औरतो ने महाराज जी को   रास्ता बता दिया ! डूंगरपुरी जी महाराज  सत्संग शुरू होने से पहले पहूंच गए वहां और भी संत बैठे थे महाराज उनके पास जाकर बैठ जाते हैं: महाराज जी देखते हैं सामने एक बड़ा आसन है,जो कि डूंगरपुरी जी के लिए है (यानि स्वयं का) वहां उनका वहीं नुगरा शिष्य बैठा था !



जब सत्संग शुरू करने का समय हुआ, शेख फरीद ने वीणा लाकर उस शिष्य को दिया (जो डूंगरपुरी जी के आसन पर बैठा था) और कीर्तन शुरू करने का आग्रह किया,वह शिष्य  कीर्तन-भजन शुरू करने लगा तो वहां अपने आप कुछ अनहोनी छा: गई,जलते हुए दीपक बुझ गए, शेख फरीद ने वहां पर बैठे सभी संतों से वीनती की,डूंगरपुरीजी महाराज जैसे प्रवीण संत यहां विराजमान है,और ये विघ्न कैसे आ गया, तब वहां जो दुसरे संत बैठे थे उन्होंने कहां अगर डूंगरपुरी जी के आसन पर सच में डूंगरपुरी जी ही विराजमान हैं तो ये दीपक अपने आप प्रज्वलित होना चाहिए,, उस शिष्य ने सोचा अब यहां से निकलना ही बेहतर है ! डूंगरपुरी जी महाराज का आसन छोड़ शिष्य वहां से निकल गया, जब शेख फरीद आया तो आसन खाली देख इधर-उधर घुमने लगा, (महाराज कहां गये) ।



शेख फरीद दुसरे संतो के सामने हाथ जोड़कर फिर से खड़ा हो गया, हे ! प्रभु ये मेरी कौन सी परीक्षा ली जा रही है तब वहां अचानक दीप प्रज्वलित हो गए, शेख फरीद ये देख आश्चर्य में पड़ गया,, आसन पर कोई नहीं और ये चमत्कार कैसे हुआ । शेख फरीद ने फिर से कहां: हे ! प्रभु आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करो और मेरे सामने आओ । तब डूंगरपुरी जी महाराज ने अपना आसन ग्रहण किया, शेख फरीद के मुंह से कुछ भी शब्द भी नहीं निकल गए थे ।



महाराज जी वहां अपने आसन पर जाते ही वीणा लेकर भजन कीर्तन शुरू किए 4 भजन गाते ही डूंगरपुरी जी का आसन जमीन से 3 से 4 फ़ीट ऊपर उठ गया,शेख फरीद आकर महाराज के शरणो में गिर पड़ा,और कहां प्रभु आप कौन हो,  डूंगरपुरी जी महाराज ने हंसकर कहा: आजकल तो पत्र लिखकर बुलाने वाले ही भुल जाते हैं ! शेख फरीद को ज्ञात हो गया डूंगरपुरी जी महाराज यहीं है, महाराज जी ने शेख फरीद से कहां: ये मत पुछना आप कहां थे ये सब क्यूं (डूंगरपुरी जी नहीं चाहते थे,अपने ही शिष्य की बुराई हो)



शेख फरीद ने महाराज जी को अपने मन की एक बात बताई, हे प्रभु इस दुनिया में जितने भी परमार्थी जीव है,वह पारस जैसे होते है ये दुनिया लोहे जैसी है लेकिन आपकी (पारस की) संगति मिल जाए तो दुनिया लोहे से सोने में बदल सकती हैं ! डूंगरपुरी जी महाराज ने शेख फरीद से कहां: बताओ तुम्हें हमसे क्या चाहिए,


 शेख फरीद: हे ! देवपरुष मुझे आपकी चरण ! आपका शिष्य बना लिजिए ।

शिष्य का नाम सुनते ही डूंगरपुरी जी का मन उदास हो गया मगर कहते हैं हर शिष्य भी एक जैसा नहीं होता, डूंगरपुरी जी महाराज ने शेख फरीद को अपना शिष्य बना लिया और कहा:

 शब्द झालो वचने हालो भक्ति खांडेधार है।

बाबो डूंगरपुरी बोले यूं प्रीत लगिया पार है ।।

अर्थ:  

                    शेख फरीद को महाराज ने अपने पास बुलाया और कहां शब्द (शिष्य बनना) ले रहे हो तो वचन में चलना,ये भक्ति तलवार की धार से तेज है! डूंगरपुरी जी कह रहे हैं, भगवान से प्रेम ही हमें पार कर सकता है।

शेख फरीद डूंगरपुरी जी महाराज का एक नेक भक्त एवं शिष्य हुआ ।


Sunday, 23 August 2020

डूंगरपुरी जी महाराज, जीवनी

 डूंगरपुरी जी महाराज


बाड़मेर के पास स्थित एक गांव चौहटन (मठ) से जुड़ी ये कहानी ! 1863 में जेष्ठ वदी ग्यारस को महाराज ने जीवित समाधि ले ली:-  


बालपन में ही अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात डूंगरपुरी जी महाराज भावपुरी जी को गुरु मान कर उनकी चरण में आ गए,, फिर वही मठ में घुणा बनाकर भक्ति के साथ साथ भजन गाते थे, भक्ति(भजन) का तप इतना बढ़ गया,ऐसा कहां जाता है: महाराज जी 4 भजन गाने के बाद उनका आसन जमीन से २/३ फुट ऊपर आ जाता था, आस-पास के गांवो में महाराज की चर्चा होने लगी, 
 डुंगरपुरी जी महाराज अपने भक्तों से खूब प्रेम रखते थे,और भक्तों ने महाराज को ही अपना भगवान मान लिया था, समय के साथ-साथ डूंगरपुरी जी महाराज को परमेश्वर की उपाधि दे दी गई,बाद में लोग महाराज को  डूंगरा (परमेश्वरा) नाम से जानने लगे ।



एक बार तो गुरु भावपुरी जी ने महाराज के पैर पकड़ लिए:-

ऐसा मानना है: भावपुरी जी को मोक्ष की प्राप्ति के लिए बार बार मानव जन्म में आना पड़ा, फिर भी उनको मोक्ष का मार्ग नहीं मिला, (भक्ति के लिए श्मशान भूमि अति उत्तम मानी जाती है) एक दिन भावपुरी जी भक्ति के लिए श्मशान में गए, उनका मिलाप कुछ भूतों से हो गया,भावपुरी जी और सारी प्रेत आत्माओं में मित्रता हो गई, हर रोज शमशान जाते थे,उन भूतों से साथ खेलना उनसे बातें करना उनको अच्छा लगता था ‌।



एक दिन डूंगरपुरी जी ने उनको रात में जाते देख लिया,महाराज ने मन में सोचा मेरे गुरु अभी कहां जा रहे हैं, डूंगरपुरी जी अपने गुरु का पिछा करते हुए श्मशान भूमि तक पहुंच गए, वहां जाकर देखा तो भावपुरी जी भूतों साथ समय बिता रहे थे ! डूंगरपुरी जी वहां से सीधा मठ में आए और रात भर सोचते रहे, मेरे गुरु जब तक इन नुगरो की संगत नहीं छोड़ेंगे तब तक उनकी मोक्ष नहीं होगी,,



दुसरे दिन डूंगरपुरी जी अपने गुरु से पहले एक कमंडल लेकर श्मसान में आ गए, और उन प्रेत आत्माओं से कहां: मैं आप सभी की मुक्ति करने आया हूं ! मुक्ति का नाम सुनते ही सारे भूत इकट्ठा हो गए, सभी कहने लगे हम सब को मोक्ष चाहिए! डूंगरपुरी ने अपने कमंडल के जल का छिड़काव जैसे ही उन भूतों पर किया, सब की गति (मोक्ष) हो गई ।


एक भूत जो पैरों से कमजोर था, वह दौड़कर आया मगर नहीं पहुंच पाया ! डूंगरपुर जी महाराज वहां से मठ आ गए, भावपुरी जी श्मसान में गए तो देखा सिर्फ एक भूत बैठा था वह भी उदास था,भावपुरी ने पुछा: मित्र तुम यहां अकेले बैठे हो बाकि सब कहां है।



तब उसने कहां: आपका शिष्य डूंगरपुरी यहां आया था, उन्होंने कमंडल के जल से सब की मोक्ष कर दी,भावपुरी जी आश्चर्य में पड़ गए । वहां से भावपुरी मठ में आकर डूंगरपुरी के चरण पकड़ लिए, तब डूंगरपुरी ने कहा: हे ! गुरुवर आप मेरे गुरु हो आप मेरे पैर ना पकड़े । भावपुरी जी ने कहा: अब तो तब तक नहीं छोडुंगा जब तब मुझे मोक्ष का मार्ग ना मिले,,



तब डूंगरपुरी ने कहां: हे ! गुरुदेव आप मोक्ष के पथ पर ही थे, लेकिन इन भूतों की संगत से आप उस मार्ग से विचलित हो गए, आप मेरे गुरु हो इसलिए इस जन्म में आपको मोक्ष का रास्ता नहीं दिखा सकता,मैंने आपकी मोक्ष कर दी तो दुनिया का गुरु पर से विश्वास उठ जाएगा,, लोग कहेंगे शिष्य ने गुरु की मोक्ष की, हे ! मोक्ष के लिए गुरुदेव आपको एक बार और मानव जन्म धारण करना पड़ेगा।


संतों ने कहा है: भावपुरी जी ने फिर से एक बार मनुष्य जन्म धारण किया,और डूंगरपुरी जी महाराज के शिष्य हुए ।
जब डूंगरपुरी जी महाराज ने एक छोटे बच्चे के रुप में अपने गुरु भावपुरी जी को देखा, महाराज फूले न समाये ।

कथित:

आज हमारे गुरु आगंन आए,अलख पुरूष अविनाशी ।।

अर्थ: - डूंगरपुरी जी महाराज ने कहा: आज मेरे गुरु मोक्ष के लिए एक और जन्म धारण कर पधारे हैं,अलख के पुत्र हैं ! और वे अविनाशी है यानि जिनकी कभी मौत नहीं होती है।

Tuesday, 18 August 2020

नारद के गुरु, जीवनी

।। देव ऋषि नारद के गुरु ।।


एक समय नारदमुनि भगवान विष्णु के पास बैठे थे, तो भगवान विष्णु ने नारद को उनके गुरु के बारे में पूछा, तो नारद नारायण की बात सुनते ही हंसने लग गए,भगवान विष्णु ने पूछा हे ! देव ऋषि (नारद) आप हंस क्यों रहे हो, तब नारद ने कहा हे ! नारायण आप मुझे पूछ रहे हो मेरे गुरु कौन है, जब आपको पता है मैं (जगतपिता) ब्रह्मा जी का पुत्र हूं ! मुझे गुरु की क्या जरूरत है, जब मेरे पिताजी ने ही सृष्टि की रचना की है।


भगवान विष्णु ने कहा : - हे देव ऋषि अंधेरे में चलने के लिए रोशनी की जरूरत होती है ठीक उसी प्रकार संसार के प्रत्येक मनुष्य के साथ-साथ देवताओं को भी हर पथ पर गुरु की जरूरत रहती है,यदि आपके गुरु नहीं है तो आपको देवताओं के प्रतिष्ठापन (सभा) में नहीं जाना चाहिए,, 


भगवान विष्णु की यह बात सुन नारद ने कहा हे प्रभु मुझे रास्ता दिखाइए मैं किसको गुरु बनाऊं, भगवान विष्णु ने कहा: देव ऋषि आप प्रभात के समय मृत्यु लोक में जाए सर्वप्रथम जो भी मनुष्य मिले उनको अपना गुरु मान लेना, वहीं आपके सच्चे गुरु कहलायेंगे ।

तब नारद मुनि सुबह जल्दी उठकर मृत्युलोक (धरती) की तरफ बढ़े! तब उनको सबसे पहला मनुष्य एक मछुआरा मिला, जिसका नाम कालूकीर था ! जो व्यापार के लिए आया था, उस मछुआरे को देख नारद के मन में कई सवाल उत्पन्न हो गए । कि इसको गुरु कैसे बनाएं, जब इसका काम भी मछलियों को पकड़ना है, और मैं एक ब्राह्मण हूं ।

तब नारद बिना कुछ सोचे वापस वैकुंठ धाम निकल गए, भगवान विष्णु ने कहा: नारद आप गुरु कर आए, बताओ कौन है आपके गुरु, तब नारद ने कहा: हे ! नारायण मृत्युलोक गया था लेकिन मुझे कोई मिला ही नहीं, तो भगवान ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं कल सुबह जल्दी जाना ।।


नारद फिर दूसरे दिन प्रभात को मृत्युलोक(धरती) पर आएं, अब नारद देखते हैं वहीं मछुआरा उनके सामने आ रहा था, नारद मछुआरे को देखकर वहां से निकल गए,नारद भगवान के पास ना जाकर तीसरे दिन का इंतजार कर रहे थे! जब तीसरे दिन नारद मुनि वापस मृत्युलोक में आए, तो वहीं मछुआरा उनके सामने आया, तो नारद ने सोचा आज इस मछुआरे से बात कर ली जाए,


नारद कुछ बोलने वाले थे, उससे पहले मछुआरे ने देव ऋषि नारद से कहा: हे ! देव ऋषि आप सर्वव्यापी हो,आपको तो होनी और अनहोनी का पता रहता है, आप मुझे बताएं आज 3 दिन हो गए, पता नहीं मैं किसका मुंह देखता हूं थोड़ा सा भी व्यापार नहीं कर पा रहा हूं । 

ऐसा संतो ने कहा है: जिनके गुरु नहीं सुबह उनका मुंह दिख जाए तो पूरा दिन खराब हो जाता है।



यह सुनते ही नारद अंदर ही अंदर पिघलने लग गए, मन में सोच रहे थे 3 दिनों से इनके सामने मैं ही आ रहा हूं। नारद ने पैर पकड़ लिए और कहां हे ! नाथ में ही हूं वह मेरे गुरु नहीं है, आप मुझे शिष्य बना लो, तब कालू कीर (मछुआरे) ने नारद को अपना शिष्य बना लिया, नारद बहुत खुश हुए।


नारद वहां से बैकुंठ धाम निकल गए धाम को गए, भगवान विष्णु ने कहा: हे देव ऋषि आज बहुत खुश लग रहे हो, अब तो आपको गुरु मिल गए होंगे,तब नारद ने मन में सोचा भगवान विष्णु के सामने मेरे गुरु मछुआरे का नाम कैसे ले, तब नारद ने कहा: हे प्रभु मैंने गुरु तो बना लिए पण (- निंदा)


यह निंदा का शब्द सुनते नारद को भगवान विष्णु ने कहा नारद आपने अपने गुरु की निंदा की है, इसलिए आपको चौरासी भुगतनी होगी,(सारे जन्मो का भुगतान करना होगा,84 लाख योनियों में जन्म )चौरासी का नाम सुनते ही नारद की आंखों में आंसू आ गए भगवान विष्णु से कहा: से प्रभु मुझे माफ कर दीजिए अनजाने में मुझसे यह पाप हो गया,,

भगवान ने कहा अब तो शायद आपको आपके गुरु ही इस से मुक्ति दिला सकते हैं, अब नारद दौड़ कर अपने गुरु कालू कीर के पास गए,और सारी बात उनको बताई, तो मित्रों गुरु कभी नहीं चाहता शिष्य दुःखी हो, तब कालूकीर ने नारद से कहा: जाओ भगवान से कहो चौरासी क्या होती है, कैसी होती है, मुझे इस धरती पर चित्र बनाकर बताएं, जब भगवान चित्र बना दे तब नारद तुम उस चित्र के ऊपर लुट जाना, जब तक भगवान कुछ ना बोले तब तक लूटते रहना । 



तब नारद भगवान विष्णु के पास आए भगवान ने कहा: नारद आप चौरासी (84) भुगतने के लिए तैयार हो, तो नारद ने कहा, हे ! नारायण मैंने कभी चौरासी देखी नहीं है यह कैसी होती है मुझे आपके कर कमलों (हाथों) धरती पर चौरासी का चित्र दिखावे, तो भगवान विष्णु ने रेत (जमीन) पर एक हाथी का फोटो बनाया, उस हाथी के आधे भाग में कीड़े तड़प रहे थे, आधा भाग समान था । भगवान विष्णु ने कहा: जहां पर कीड़े लगे हैं यहीं चौरासी है।



तब नारद ने भगवान विष्णु से पुनः पुछा हे ! प्रभु यही चौरासी है, भगवान ने कहा: हां देव ऋषि यही चौरासी है, फिर नारद ने पूछा हे नारायण इसमें और उस चौरासी में कोई फर्क तो नहीं, तब भगवान ने हंसकर कहां: देव ऋषि जी यह भी मेरे हाथ की है वो भी मेरे हाथ की है तो फर्क क्या होगा,तब नारद खुश होकर अपने कपड़े उतार कर उस हाथी के चित्र पर लूटने लगे ।


भगवान विष्णु ने कहा: नारद आप यह क्या कर रहे हो,
 नारद ने कहा हे प्रभु मैं चौरासी का भुगतान रहा हूं, भगवान ने कहा ऐसे कैसे! तब नारद ने कहा हे ! प्रभु आपने कहां इसमें और उस में कोई फर्क नहीं, वह चौरासी आपके हाथ की यह भी आपके हाथ की बनी है ।


तब भगवान विष्णु आश्चर्य में पड़ गए, और नारद से कहा: हे ! मुनिवर आपको यह रास्ता किसने दिखाया, नारद ने कहा: मेरे गुरु ने ! भगवान ने कहा: देव ऋषि आपके इतने अच्छे गुरु है जिन्होंने आपको 1 मिनट में चौरासी का भुगतान करवा दिया, और आपने उनकी निंदा कर दी ।

नारद ने कहा: हे प्रभु अब मुझे पता चल गया है! गुरु हमेशा भगवान होते हैं।

इसलिए मित्रों नारद को कालू कीर गुरु मिले ।।









Saturday, 8 August 2020

मलूक दास जी का जीवनी

यह श्लोक मलूक दास जी ने उस समय लिखा:


अजगर करे नी चाकरी पंछी करे नी काम।
दास मलुका यूं कहते हैं सबके दाता राम।।

एक दिन मलुक दास जी सत्संग में गये वहां उनको एक शब्द सुनने को मिला,कि कभी इंसान को चिंता नहीं करनी चाहिए भगवान उसे प्रतिदिन का भोजन (निवाला) अपने आप देता है ! तब मलुकदास जी ने तय कर लिया कल हम मजदुरी पर नहीं जायेंगे और घर पर भी नहीं रुकेंगे फिर पेट में निवाला आता है के नहीं, बस अगले दिन मलुकदास जी सुबह ही घर से जंगल की ओर रवाना हो गए, और मन में सोचते रहे आज कई भोजन के नजदीक भी नहीं जाएंगे तो हमारी पेट में कैसे निवाला जाएगा।


फिर धीरे-धीरे आगे बढ़े, तो रास्ते में देखा एक टिफिन पड़ा मिला जिसमें भोजन था, तब मलूक दास जी ने सोचा हो सकता है किसी ने भोजन की व्यवस्था की हो,लेकिन हम भोजन करेंगे नहीं (देखते हैं निवाला कैसे पेट में जाता है)|बस यही सोचते-सोचते मलूक दास जी पेड़ के ऊपर चढ़ गए और ऊपर बैठ गए,


तभी वहां 2 चोर आ गए और टिफिन देख उनके मन में भोजन करने कि इच्छा जताई, मगर अनजान जगह टिफिन देख चोरो ने सोचा क्या पता किसी ने हमें मारने की साजिश रची हो टिफिन में जहर भी हो सकता है|चोरों ने एक दूसरे से कहा किसी ने टिफिन यहां पर यह रखा है, तो यहां पर जरूर कोई व्यक्ति भी होगा। तब एक चोर की नजर अचानक ऊपर पेड़ पर पड़ी, जहां पर मलूक दास जी बैठे थे! 

दोनों चोरों ने मलूक दास जी को नीचे बुलाया और कहां यह टिफिन आपका है। मलूक दास जी के मना करने पर चोरों ने जबरदस्ती मलूक दास जी से टिफिन खुलवाया,पहले मलूक दास जी को जबरदस्ती भोजन करवाया! मलूक दास जी बार-बार मना करते रहे मगर वह चोर ऊपर से ऊपर निवाला देते रहे ।


तब मलूक दास जी के मन में एक विचार आया इस दुनिया में देने वाला भगवान है जिनको (भोजन) निवाला देना है कैसे देख करके भगवान उन तक पहुंचा देते हैं ।

इसलिए मलूक दास जी नहीं यह श्लोक लिखा था ।


Friday, 7 August 2020

तुलसीदास जी का चमत्कार

ये उस समय की कहानी है जब तुलसीदास जी भगवान की भक्ति करते थे, मगर लोग उनकी भक्ति को नहीं मानते थें ।


तुलसीदास जी को गांव मे सब लोग तुलसी तुलसी कहते है उनकी भक्ति को मानते नही थे ।
 एक बार गांव से बाहर निकले तो गांव के लोग किसी कि लाश को लेकर जा रहे थे! उसके पिछे एक औरत भाग रही थी,
औरत ने सोचा मे भी मर जाऊं तब तुलसीदास जी सामने मिल गये-


दोहा:-

तुलसी आवत देखिया,सती नमायो शीश ।

तुलसी मुख से यू भणे,अमर छुड़ौ आशीष ।।


विस्तार:- वह औरत तुलसीदास जी के चरण मे गिर गई,और तुलसीदास ने कहा बेटा हमेशा सुहागन रहो!फिर औरत ने कहा:


दोहा:- 

 पीयु मारा मर गया,मैं मरने को तैयार ।

         तुलसी तेरे सवाल का क्या होगा हवाल ।।


    औरत ने कहा:- महाराज मेरा पति मर गया मैं मरने को तैयार हूँ!अब आपने सुहागन का आशीर्वाद दिया मुझे उसका क्या होगा ।


    दोहा:- तुलसी मड़ा मंगाविया मस्तक धरिया हाथ।

              मैं कुछ नी जाणू प्रभू तुम जाणो रघूनाथ ।।


    तुलसीदास जी ने गांव वालो को बोला लाश को मेरे पास लाओ! और भगवान से मन ही मन विनती कि हे!प्रभू भगत ने वचन दे दिया अब आपको ये वचन पार करना होगा! सिर पर हाथ धरते ही उस लाश मे प्राण आ गये, पुरा गांव चमत्कार देख तुलसीदास जी कि जय जय कार करने लगे ! तब तुलसी दास जी ने कहा:-


    दोहा:- तुलसी तुलसी क्या करो,तुलसी वन का घास।

             मेहर हुई रघुनाथ कि जद बणिया मैं तुलसीदास ।।


    फिर तुलसीदास जी को लोग मानने लग गये ।



    दोहा: तुलसी नर का क्या बड़ा समय बड़ी बलवान।

              काबे लूटी गोपिया वोही अर्जून वही बाण ।।

    अनुवाद:

                > तुलसीदास जी ने कहा है,इंसान समय कि वजह से ही गिरता उठता है,(जब इन्सान गलत करता है तब उसका समय गलत आ जाता है)
    दोष समय का है!अर्जून के पास एसा बाण था,(जो एक ही बार चलाने पर  सामने खड़ी सेना खत्म कर सके)लेकिन जिस समय काबो ने आतंक मचाया, गोपियो कि इज्जत खतरे मे पड़ी तब अर्जुन और उसका वो बाण साथ होते हुये भी काम नही आया ।
    क्यू कि समय बदल गया था !

    Saturday, 26 October 2019

    राजा बलि की जीवनी

    हिरणाकश्यप के पुत्र प्रहलाद जी, के पुत्र विलोचन और विलोचन के घर राजा बलि का जन्म हुआ, बलि ने बिलाङा(जोधपुर) में 99 यज्ञ संपूर्ण कर दिए थे,

     बलि की माता का नाम सीता था। 11 रानियों के साथ राजा विलोचन ने कारण वश अग्नि में प्रवेश ले लिया, 1 रानी गर्भवती (सीता) थी, जिनकी कोख में बलि था ! इसलिए उन्होंने अग्नि प्रवेश नहीं लिया ।


    भगवान विष्णु ने सोचा एक यज्ञ सम्पन्न हो गया तो ये सब राज पाठ बलि के हाथ चला जायेगा। बलि को हराना जरूरी हैं नही तो संसार पर इसका ही राज होगा ।

    बलि के गुरू का नाम था सुकराचार्य मुनि था ।

    (गुरू ने बलि को हमेशा से एक बात बताई हुई थी,कोई भी ठिंगना आदमी आकर तुझे कुछ भी बोले तो उससे दूर ही रहना।)



    बलि ने सोचा 99 यज्ञ सम्पन्न हो गये हैं तो एक यज्ञ  तो आसानी से सम्पन्न हो जायेगा । भगवान ने सिर्फ 52 अंगुली की देह बनाई और बलि के वहाँ आये ! बलि के पहरेदार को बोले जा तेरे राजा से बोल एक दानी कुछ मांगने आया हैं ! क्या वो मुझे दान दे सकता हैं ।




    बलि आया और बोला: हे महाराज जो मांगो मिलेगा मैने आज तक किसी को निराश नही किया, भगवान ने कहा नही मैं मांग लू और तू नही दे पाया तो, हे राजन पहले मुझे संकल्प भरवा, बलि पानी की जारी लेने अंदर गया, अचानक बलि के गुरू को पता चल गया ये तो भगवान है और बलि को हराने के लिए आए हैं ! तब सुक्राचार्य मुनि पानी की जारी में मेंढक का रूप करके नली में घुस गये ।




    बलि वही जारी लेके आया लेकिन जारी की पाईप में सुक्राचार्य मुनि के कारण पानी नही आ रहा था, वहां खङे लोगो में से एक बोला जारी की नली में तिनका डाले ताकि नली साफ हो जाए, जैसे ही एक छोटा तिनका नली में डाला तो सुक्राचार्य मुनि की आंख में जा लगा,आंख फुट गई पानी आना शुरू हो गया

     तब संतो ने लिखा है:-

                  भाग पुरबला उदय हुआ मने जासण आयो इश।

                    उपर हाथ कंगाल को तले हाथ जगदीश ॥




    जब संकल्प लिया तो भगवान् ने कहाँ मुझे ढाई (2.50) पांव जमीन चाहिए, बलि हंसने लगा हे महाराज बस इतनी ही जमीन । तो फिर जारी मंगवाने की कहाँ जरूरत थी ।
    अब भगवान ढाई पांव जमीन के लिए अपनी देह को बढ़ानी शुरू किया ! 2 पैर में पुरी जमीन ले ली, भगवान बोले बलि अभी तक आधा पैर बाकि हैं ।



                       बलि भागकर अपनी माँ के पास गया, मां ने कहा बेटा भगवान खुद तेरे पास मांगने के लिए आ गए हैं तो इससे अच्छा और क्या होगा, जाकर भगवान से बोल  आधा पैर तेरे सिर पर रखें जब भगवान तेरे सिर पर पैर रखकर दबाव दे तो भगवान का पैर पकङकर कुछ मांग लेना, बलि आया और भगवान से कहने लगा, हे ! प्रभु संसार की सारी जगह पर आपका हक हो गया अब मेरे पास सिर्फ मेरी काया है, मेरे सर पर अपना पैर रख जमीन पूरी कर लो। भगवान ने बलि के सर पर पैर रखा और बलि को दबाकर पाताल लोक में डाल दिया।



    बलि ने भगवान का पैर पकङ कर भगवान को भी अपने पास खींच लिया, भगवान से बलि ने कहाँ नही मुझे अकेला छोड़कर आप नही जा सकते । (भगवान को पहरेदार के रूप में रख लिया) लक्ष्मी जी ने सोचा भगवान अभी तक आए क्यू नहीं, नारद को लक्ष्मी ने भेजा जाओ पता करो भगवान कहाँ पर हैं । नारद पुरी पृथ्वी पर घुमने पर भी भगवान नहीँ मिले तब पाताल लोक गये तो नारद ने विष्णु भगवान को बलि की पहरेदारी करते देखा।



    लक्ष्मी जी को जाकर सारी बात बताई, तब लक्ष्मी जी पाताल लोक जाकर एक दुःखियारी (अबला) रूप बनाया, बलि ने देखा तो पुछा कौन हो तुम और यहाँ क्या कर रही हो ।

                            लक्ष्मी जी ने कहाँ

    मैं एक दुःखियारी हूँ जिसका कोई सहारा नही हैं,तब बलि ने कहाँ चिंता ना कर आज से तू मेरी बहन हैं ।
    तब लक्ष्मी ने बलि को एक धागा बांधा और भाई बना दिया! उसी दिन से धर्म भाई का त्यौहार शुरू हुआ है।
          अब बलि ने कहाँ बहन मांग ले जो मांगना तेरा भाई देने को तैयार हैं ।


    तब लक्ष्मी जी ने कहाँ:-

                         ददि सुत के निके बसे,विलोचुन के बीच ।

                         वो मांगत हैं लक्ष्मी हरि करो बगसीस॥

    अनुवाद:

                 ददि कहते  है समुद्र को समुद्र का बेटा हैं मोती
    विलोचुन राजा का बेटा है राजाबलि, हमारे आंख में भी है मोती, तेरी आंखों के बीच में खङे भगवान को छोङा दो मुझे और कुछ नही चाहिए!
    बलि बोला: नही बहन



                 मोती दे दूँ मौखला, हीरा दे दूँ हजार।

               ये तो जग में एक हैं,कैसे कर लूं  विचार ॥

    अनुवाद:

               बलि ने लक्ष्मी जी से कहाँ कि मोती ले जाओ, हीरे ले जाओ, मेरी दूनियाँ तो बस भगवान ही हैं नही दे सकता हूँ ।
    तब लक्ष्मी जी विलाप करती हुई, ब्रह्माजी के पास गई !लक्ष्मी ने सारी बात ब्रह्माजी को बताई, ब्रह्माजी पाताल लोक गये और भगवान के सामने बलि से विनती करने लगे।
    हे बलिराज तू विष्णुजी को छोड़, इनके बिना पुरा बैकून्ठ सुना हैं! मुझे यहां पर रख ले। तब बलि ने कहाँ मैने मना कब किया, मेरे यहाँ तो कोई भी छोटा हो या बड़ा एक को रहना ही होगा ॥




    उस दिन से आज तक माना जाता है भगवान ब्रह्मा जी विष्णु जी और शंकर भगवान बलि के वहाँ पहरेदारी  करते हैं । ब्रह्मा जी पहरेदारी करके आते है तो सर्दी का मौसम आता है,जब शंकर भगवान आते है तो गर्मी का मौसम आता हैं ।और भगवान विष्णु आते ही बरसाती मौसम आता हैं ।

    इसलिए कवि ने लिखा हैं !

    दोहा :- 


               ब,र,ना, शक्ति कहा गये ब,ग,ह, के असवार ।

               ल,प,सा, सहित जा खङे विलोसुत के द्वार ।।

    अनुवाद: बरना

                 ब यानि ब्रह्मा //

                 र  यानि रूद्र (शंकर)

                 ना यानि नारायण (विष्णु) ये तीनो भगवन ब र ना ।

    ___________________________

              ब,ग,ह, (तीनो भगवन का वाहन)

                  ब - बैल

                  ग-  गरङ

                  ह-  हंस 

    _________________________

              ल,प,सा, तीनो भगवन की अर्धांगनी

               ल - लक्ष्मी जी (विष्णु भगवान)

               प - पार्वती जी (शंकर भगवान)

               सा- सावित्री जी (ब्रह्मा भगवान)

    _________________________
    विलोसुत के द्वार - विलोचन राजा का बेटा(सुत) बलि ! जब देव जब पहरेदारी करके बाहर आते है तब उनकी असवारी और अर्धांगनीया साथ रहती हैं ।
    और
     जब भगवान विष्णु पाताल से पहरेदारी करके धरती पर आये तो बलि की मां से मिलना चाहा,मिलते ही भगवान ने मां से कहा आपको किसी वस्तु की जरूरत हो तो हमे बता दीजिये, हम आपकी सेवा में हाजिर रहेंगे ।


    तब बलि की मां कहती है ! वो इंसान मुझे क्या दे सकता है जो मेरे बेटे के सामने हाथ फैला चुका हो जो खुद भिक्षक हो,

     श्लोक : भली हुई मैं नही जली विलोसन के साथ ।

               मेरी कोख से ऐसा जन्मा मढ़ा दिया हरि को हाथ ।।


    अनुवाद:

             बलि की मां का कहना था कि अच्छा हुआ कि मैं मेरे पति के साथ अग्नि में ना जली, 12वी थी जो बलि की मां (सिता) का कहा !आज मुझे गर्व हो रहा है मेरे बेटे के आगे भगवान को भी हाथ फैलाना पङा ।

    मित्रो कोई त्रुटि हो तो 🙏 माफ करना


               





                  

    Friday, 4 October 2019

    ईशवरदास जी भादेसर जीवन

    ईश्वरदास जी (भादरेस) बाड़मेर 


    दोहा:- अलख भरोसे उखले,आदण ईशरदास ।

              उकलियो में ओरसी कोई बड़ो भगत है विश्वास ।।

    अनुवाद:- 

                         ईश्वरदास जी एक दिन बैठे भजन कर रहे थे,  पास मे चूल्हे पर पानी गरम हो रहा था, थोड़ी देर बाद एक भक्त आया जिसके पास मूँग और चावल मिंक्स थे ! उसने ईशवरदास जी से कहा बावजी पानी गरम हो रहा है इसमे मूँग चावल डाल डालकर खिचड़ी बना दूँ ,,




    ईशवरदास जी ने कहा:- देख भक्त तेरी मर्जी मेरे लिये मत करना कुछ, उस भक्त ने गरम पानी मे मूँग चावल डाल दिये! पास से एक और भक्त घी लेकर जा रहा था, जैसे ही खींचड़ी कि सुगंध आने लगी, और घी लेके वो भक्त वही आ गया और बोला ये खिचड़ी बनी हुई है! इसमे घी डाल दूँ ! ताकी मुझे भी संतो का परसाद मिल जाये ।



    ईशवर दास जी ने कहा तेरी मर्जी भक्त,,(अब गरमागरम खिचड़ी ऊपर घी स्वाद अलग ही है) दोनों भक्तो ने जब 1 थाली मे खिचड़ी डालकर ईश्वरदास जी को परोसा तो ईशवरदास जी ने भगवान से कहां हे ! भगवंन मुझे पता था, आप अपने भक्तों को कभी भूखा रहने नही दोगे मेरे पास सिर्फ गर्म पानी था लेकिन आपने तो खिचड़ी बना कर मुझे परोस दी  || विश्वास ||

    (इश्वरा /परमेश्वरा)


      दोहा':-

             सांगा जल थल उपणो इशर तणी आवाज।

              वेगो आव भलण कर कोम्भल बक्सण काज।।

    यह दोहा इश्वरदास जी ने गुजरात रैणू नदी के किनारे रहते उनके मित्र(भक्त) साँगा गौड़ को जीवित किया तब आवाज लगाई थी ।


    दोहा:-    ईशवर घोड़ा  हाकीया भावसागर रे माय।

                 तारण वालो तारसी साई! पकड़ी  बाय ।।


    अनुवाद:    गुजरात में ईश्वरदास जी ने लोगो से कहा अब मैं जा रहा हूँ! तब लोगो ने कहा हे ! प्रभू कैसे जाओगे पानी मे से ।
    तब राम नवमी थी,और इशर दास जी ने अपना घोड़ा ये दोहा बोलकर द्वारिका कि तरफ मोड़ लिया ||