मन तु मारी मान ले बार बार कोई तोय।
हरि के भजन बिन निचतारो नहीं होय ।।
निचतारो नहीं होय गुदड़ा खावतो जावे ।
भवसागर में सत्गुरु बिना कोई नहीं छुड़ावे ।।
प्रताप राम सच कहत है घट में लीजे जोय ।
मन तु मारी मान ले बार बार कोई तोय ।।
अर्थ:
संतों ने मन और शरीर को समझाया है, हे मन ! तु इंसान को उछाल मत आखिर कर हरि के सुमिरन बिना मोक्ष नहीं मिलेगा,और ये शरीर दुनिया में मारा मारा फिरेगा, तुझे बाद में भी गुरु का चरण लेना पड़ेगा ! प्रताप राम जी कहते हैं अभी तक समय है अपने घट में परमात्मा की छवि बना लें ।
दोहा: मन जावे तो जावण दे,दर्ढ़ राख शरीर।
बिना खेच्या कबाण कीण विध छुटे तीर ।।
अनुवाद:
संतो ने लिखा है: इंसान का मन कही भी जाये उसे जाने दो! बस अपने शरीर को वश में रखो,मन अपने आप लौट आएगा ।
दोहा: मन कि हारे हार है,मन कि जीते जीत ।
मन पहुंचा दे बैकुंठ में मन करा दे फजीत ।।
अनुवाद:
संतो ने लिखा है,इंसान खुद कि इच्छा से नही बल्कि मन कि इच्छा से चलता है, मन इंसान को हरा सकता है,मन से इंसान जीत भी सकता है! मन चाहे तो इंसान को भगवान से मिला देता है और मन इंसान कि फजीती(बेइज्जती)भी करवा सकता है ।
दोहा:- मैं जाणू मन मर गया बल जल गया भबुत ।
मन कुत्ता आगे खड़ा ज्योँ जंगल में भुत ।।
अनुवाद:
संतो ने कहा है मन कभी मरता नहीं है! कभी ऐसा लगता है अब कुछ मन में नहीं है ! हर प्रकार से सुकुन है फिर अचानक इच्छाएं आकर खड़ी हो जाती है,और मन कुछ और करने की सोच लेता है ! यानि मन भुत बनकर वापस इच्छाएं ले आता है।
दोहा: मन लोभी मन लालची मन चंचल मन चोर।
मन के मते नी चालणो मन पलक-२ कही ओर।।
अनुवाद:
मन लोभी है,मन ही लालची है, मन है चंचल है और मन ही चोर है! मन के पिछे नही चलना चाहिए मन कब चोरी करवा दे और कब वापस पकङवा दे! इसका कोई पता नही रहता ।
दोहा: मन ही महा अनिति कहिजे बड़ा बड़ा भुप ठगिजे।
योद्धा जब्बर हार गया इण सू पड़ीया कैद मे सीजे।
उदाहरण:
मन ही अनिती है ! इस मन ने बड़े बड़े राजाओं (भुप) को ठग लिया है, मन की करणी से योद्धाओं को हारना पड़ा और उन्हें जेल भिजवा दिया इसलिए मन का कहना ना करें ।
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