राजा के कहने पर सिपाई दौड़कर साधु (महात्मा) के पास आया साधु से कहां : हे महाराज आपको राजा ने महल में बुलाया हैं, इन टुकड़ों से अच्छा महल चलो वहां अच्छा भोजन कर लो ।
साधु बोला : अच्छा ! अपने राजा को पुछ कर आओ मुझे भोजन करने क्यूं बुलाया ।
सिपाही ने सोचा एक तो राजा ने इसे भोजन करने बुलाया और ऊपर से खुद सवाल कर रहा है ।
वह दौड़ कर गया राजा से कहा : हुजूर उसने मुझसे कहा जा तेरे राजा को पुछ कर आ मुझे भोजन के लिए महल में क्यूं बुलाया ।
राजा ने कहां : उस साधु से जाकर कह दो कि ! यदि महल में तुम भोजन करोगे तो राजा को धर्म की प्रप्ति होगी (धर्म होगा) ।
वह फिर से गया साधु से कहां : हे ! महाराज राजा ने कहां आपके वहां भोजन करने पर राजा को धर्म की प्रप्ति होगी ।
साधु बोला : अच्छा अपने राजा को जाकर पुछो धर्म की माता कौन है । साधु की इस बात पर वह आश्चर्य में पड़ गया ।
पुनः जाकर राजा से कहां : उस साधु ने कहां हैं धर्म की माता कौन है।
राजा ने कहां : जाकर कह दो उसे धर्म की माता दया हैं ।
सिपाही भागता हुआ साधु के पास और कहां : राजा ने कहां हैं धर्म की माता "दया" अब तो महल चलकर भोजन किजिए ।
साधु ने कहां : जाकर राजा से पुछो दया का पिता कौन है।
सिपाही वापस राजा के पास आया और कहां : हुज़ूर वह कोई मामूली साधु नहीं है अब उसने कहां दया का पिता कौन है ।
तब राजा खुद उसके पास आएं और कहां : हे महाराज आप महल पधारें और भोजन किजिए ।
साधु ने कहां : राजन् मेरे सवाल का जवाब मुझे नहीं मिला, दया के पिता कौन है ।
तब राजा ने कहां : हे महाराज दया के पिता संतोष हैं।
साधु ने कहां : तो राजन् सुनो मुझे सिर्फ इन टुकड़ों में संतोष हैं, किसी के महलों में भोजन करने से मुझे संतुष्टि क्या मिलेगी ।
राजा साधु के पैरों में गिर पड़ा और कहां, हे महाराज आज मुझे एक संदेश मिल गया, इंसान को जो है उसी में संतुष्ट रहना चाहिए ! वहीं सबसे बड़ा संतोष (धन) है ।
मित्रों तभी संतो ने लिखा है हर इंसान के लिए संतोष ही सबसे बड़ा धन है,
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