मीरां बाई ( प्रेमाभक्ति)
चौदहवीं व 15 ई. शताब्दी के (कवि) संत- पीपाजी महाराज, रैदास जी, नरसी मेहता, अनेक संत आज हम मीरा बाई के विषय पर अमल करेंगे ।
मीरा बाई का जन्म 1498 में राजस्थान के मेड़ता तहसील में छोटा गांव कुड़की में हुआ था, उनके पिता का नाम रतनसिंह व माता का नाम वीरकुमारी था, मीरा अपने माता पिता की इकलौती संतान थी,बाल्य अवस्था में ही उनकी माता पिता का निधन हो गया था,मीरा बाई का लालन-पालन उनके दादा राव दुदाजी की देखरेख में हुआ जो भगवान विष्णु के गंभीर उपासक (भक्त) थे इसलिए साधु संतों का आना-जाना उनके पर पर रहता था और मीरा रैदास (रविदास) जी की शिष्या बन गई ।
मीरा के दादाजी (राव दुदाजी) एक दिन मीरा को गांव में घुमाने लेके गए, गांव में किसी की शादी हो रही थी मीरा ने पुछा: दादोजी ये क्या हो रहा है,
दूदाजी:- बेटा ये विवाह हो रहा है ये दुल्हा हैं और ये दुल्हन है बेटा जब तुम भी बड़े हो जाओगे तब तुम्हारे लिए भी मुझे दुल्हा ढूंढना पड़ेगा, मीरां नादान थीं, ज़िद करने लगी ।
मीरा : मुझे अभी विवाह करना है मेरे लिए दुल्हा लाओ, कहते हैं कि जब छोटे बच्चे जिद करते हैं तो घरवाले किसी भी बहाने से उसे मना लेते हैं, मीरा के बार बार जिद करने पर दूदाजी ने मीरा को भगवान कृष्ण की मुर्ति देकर कहां: लो बेटा ये तुम्हारा दुल्हा है, तब से मीरा ने भगवान कृष्ण को अपना सबकुछ मान लिया था, मीरा धीरे धीरे बड़ी हो रही थी उनका भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम बढ़ता ही गया ।
मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र भोजराज से 1516 ई. में तय हो गया, मीरा ने दादाजी पुछा:आज घर पर इतनी मेहमानवाजी ! दूदाजी: हां बेटा आज तुम्हारा विवाह तय हो गया है, कुछ दिनों बाद तेरा दुल्हा बनकर चितौड़ का राजकुंवर आयेगा,
मीरा : मगर मेरे पति (दूल्हा) मेरे कृष्ण है,
दूदाजी : नहीं बेटा वो तो मैंने ऐसे ही तेरी जिद तुड़वाने के लिए कहां था मीरा ने कहां : मैने तो अपना सबकुछ उनको मान लिया है,अब मुझे दुसरा दूल्हा नहीं चाहिएं, दूदाजी के हजार बार मनाने पर मीरा ने स्वीकार नहीं किया, दूदाजी की आंखों में आंसू बहने लगे तब मीरा ने अपने दादोजी की आंखों से आंसू पोंछे और कहां: दादोजी भले ही मैं अब विवाह कर लुंगी लेकिन मेरे दिलो-दिमाग में कृष्ण का प्रेम ही हमेशा रहेगा ।
तब मीरा का विवाह भोजराज से हो गया, विवाह के कुछ वर्षों के बाद ही भोजराज मुगलों के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गये, पति के परलोक वास के बाद मीरा की भक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती गई, मीरा हर रोज भगवान कृष्ण के मंदिर जाकर मुर्ति के सामने भक्ति में लीन होकर नाचती थी, मीरा का इस तरह नाचना-गाना राजवंश (राणा) परिवार को अच्छा नहीं लगता था, उन्होंने कई बार मीरा को मारने की कोशिश की ! कभी विष (जहर) देकर, कभी सांप को छोड़कर,मीरा को अपने कृष्ण पर पूर्ण विश्वास था, मीरा को दुःख देने वाला भोजराज का छोटा भाई (देवर) मीरा को मारने के कई प्रयास किए, मगर कहते हैं कि :-
जिसको राखें साईं मार सके नी कोई,
बाल बांका न कर सके करोड़ बैरी होई,,
मीरा ससुराल वालों से तंग होकर अपने पियर में आ गई,अब यहीं संतो के साथ भक्ति में नाचना-गाना भगवान को रिझाना ! जब ये खबर फिर से मीरा के देवर (राणा) को मिली, मीरा अभी भी दुनिया के सामने नाचती गाती है तो राणा चितौड़ से मीरा के पियर पहुंच गया, और दूदाजी के घर पुरे गांव को इकट्ठा किया और गांव वालों के सामने मीरा से कहां:
राणो मीरा ने समझावे,क्यू राठौड़ी आण गमावे ।
मीरा से कहां : हम राजवंशी है और हमारे घर की बहूएं बाहर ऐसे नाचेंगी तो दुनिया हम पर थूकेंगी,
मीरा ने कहां : मैं अब आपके राजवंश की बहूं नहीं हूं ! अब मेरे पति ये मेरे कृष्ण है,, तब राणा (देवर) ने कहां: ये पत्थर की मुर्ति है इनको अपना पति मानना पागलपन है,, राणा के हजार बार कहने पर मीरा का एक ही जवाब था श्री कृष्ण । राणा ने मीरा से कहां :
पत्थर को नहीं मानु यूं बोले राणो जी ।
हाथ से जिमावो साची प्रीत मानु जी ।।
राणा:-
मैं पत्थर को नहीं मानता ! यदि असल में कृष्ण तुम्हारे पति है तो अपने हाथों हमारे सामने भोजन करवाओ, तब हम मानेंगे आपके रिश्ते को,,
तब मीरा एक दुध का कटोरा भर कर कृष्ण के सामने लाकर कहने लगी :-
दुध का कटोरा भर लाई मीरा बाई ।
पिले मेरा सांवरा मीरा की दुहाई ।।
मीरा ने कहा:
हे मेरे परमेश्वर आज आप नहीं आए तो तुझे मीरा की सौगंध है । मीरा की आंखों में आंसुओं की धारा बह रही थी,जैसे ही मीरा ने आंखे बंद की भगवान कृष्ण आए और मीरा के हाथों से कटोरा लेकर सारा दुध पी लिया, राणा (देवर) आंखों से अंधा हो गया, वह थर थर कांपने लगा ,और मीरा के पैरों में गिर पड़ा, मीरा के माफ़ करने पर उसने पलट कर भी नहीं देखा ।
मीरा कृष्ण भक्ति के लिए वृंदावन चली गई, वे जहां भी जाती थी लोग उनको एक देवी का रुप मानते थे,मीरा कुछ वर्ष वृंदावन में भगवान कृष्ण की भक्ति में लीन रहीं भक्ति भी ऐसी मीरा के बुलाने पर श्याम दौड़कर आते थे,, अंत में मीरा वहां से द्वारका को रवाना हो गई, द्वारका में भगवान कृष्ण का उत्सव चल रहा था ! सभी भक्तगण भजन में मग्न थे, मीरा नाचते नाचते श्री रणछोड़राय मंदिर के अंदर पहुंच गई, और मंदिर के कपाट अपने आप बंद हो गए, जब द्वार खोले गए तो देखा मीरा वहां नहीं थी, मीरा का चीर (साड़ी) मुर्ति के चारों ओर लिपट गया था,, और मुर्ति अत्यंत प्रकाशित हो रहीं थीं, मीरा रणछोड़राय (कृष्ण) की मुर्ति में समा गई थी ।
मीरा बाई का शरीर भी कहीं नहीं मिला, इसलिए कहां जाता है 1560 ई. तक मीरा ने भक्ति की ! मीरा ने कई ग्रंथों की पदों की रचना की :- नरसी का मायरा, गीत गोविंद का टीका,राग गोविंद, राग सोरठ । मीरा ने अनेकानेक भजन व दोहे की भी रचना की जिनको आज भी सत्संग भक्ति में गाये जाते है और मीरा को याद किया जाता है ।
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