डूंगरपुरी जी महाराज
बाड़मेर के पास स्थित एक गांव चौहटन (मठ) से जुड़ी ये कहानी ! 1863 में जेष्ठ वदी ग्यारस को महाराज ने जीवित समाधि ले ली:-
बालपन में ही अपने माता-पिता की मृत्यु के पश्चात डूंगरपुरी जी महाराज भावपुरी जी को गुरु मान कर उनकी चरण में आ गए,, फिर वही मठ में घुणा बनाकर भक्ति के साथ साथ भजन गाते थे, भक्ति(भजन) का तप इतना बढ़ गया,ऐसा कहां जाता है: महाराज जी 4 भजन गाने के बाद उनका आसन जमीन से २/३ फुट ऊपर आ जाता था, आस-पास के गांवो में महाराज की चर्चा होने लगी,
डुंगरपुरी जी महाराज अपने भक्तों से खूब प्रेम रखते थे,और भक्तों ने महाराज को ही अपना भगवान मान लिया था, समय के साथ-साथ डूंगरपुरी जी महाराज को परमेश्वर की उपाधि दे दी गई,बाद में लोग महाराज को डूंगरा (परमेश्वरा) नाम से जानने लगे ।
एक बार तो गुरु भावपुरी जी ने महाराज के पैर पकड़ लिए:-
ऐसा मानना है: भावपुरी जी को मोक्ष की प्राप्ति के लिए बार बार मानव जन्म में आना पड़ा, फिर भी उनको मोक्ष का मार्ग नहीं मिला, (भक्ति के लिए श्मशान भूमि अति उत्तम मानी जाती है) एक दिन भावपुरी जी भक्ति के लिए श्मशान में गए, उनका मिलाप कुछ भूतों से हो गया,भावपुरी जी और सारी प्रेत आत्माओं में मित्रता हो गई, हर रोज शमशान जाते थे,उन भूतों से साथ खेलना उनसे बातें करना उनको अच्छा लगता था ।
एक दिन डूंगरपुरी जी ने उनको रात में जाते देख लिया,महाराज ने मन में सोचा मेरे गुरु अभी कहां जा रहे हैं, डूंगरपुरी जी अपने गुरु का पिछा करते हुए श्मशान भूमि तक पहुंच गए, वहां जाकर देखा तो भावपुरी जी भूतों साथ समय बिता रहे थे ! डूंगरपुरी जी वहां से सीधा मठ में आए और रात भर सोचते रहे, मेरे गुरु जब तक इन नुगरो की संगत नहीं छोड़ेंगे तब तक उनकी मोक्ष नहीं होगी,,
दुसरे दिन डूंगरपुरी जी अपने गुरु से पहले एक कमंडल लेकर श्मसान में आ गए, और उन प्रेत आत्माओं से कहां: मैं आप सभी की मुक्ति करने आया हूं ! मुक्ति का नाम सुनते ही सारे भूत इकट्ठा हो गए, सभी कहने लगे हम सब को मोक्ष चाहिए! डूंगरपुरी ने अपने कमंडल के जल का छिड़काव जैसे ही उन भूतों पर किया, सब की गति (मोक्ष) हो गई ।
एक भूत जो पैरों से कमजोर था, वह दौड़कर आया मगर नहीं पहुंच पाया ! डूंगरपुर जी महाराज वहां से मठ आ गए, भावपुरी जी श्मसान में गए तो देखा सिर्फ एक भूत बैठा था वह भी उदास था,भावपुरी ने पुछा: मित्र तुम यहां अकेले बैठे हो बाकि सब कहां है।
तब उसने कहां: आपका शिष्य डूंगरपुरी यहां आया था, उन्होंने कमंडल के जल से सब की मोक्ष कर दी,भावपुरी जी आश्चर्य में पड़ गए । वहां से भावपुरी मठ में आकर डूंगरपुरी के चरण पकड़ लिए, तब डूंगरपुरी ने कहा: हे ! गुरुवर आप मेरे गुरु हो आप मेरे पैर ना पकड़े । भावपुरी जी ने कहा: अब तो तब तक नहीं छोडुंगा जब तब मुझे मोक्ष का मार्ग ना मिले,,
तब डूंगरपुरी ने कहां: हे ! गुरुदेव आप मोक्ष के पथ पर ही थे, लेकिन इन भूतों की संगत से आप उस मार्ग से विचलित हो गए, आप मेरे गुरु हो इसलिए इस जन्म में आपको मोक्ष का रास्ता नहीं दिखा सकता,मैंने आपकी मोक्ष कर दी तो दुनिया का गुरु पर से विश्वास उठ जाएगा,, लोग कहेंगे शिष्य ने गुरु की मोक्ष की, हे ! मोक्ष के लिए गुरुदेव आपको एक बार और मानव जन्म धारण करना पड़ेगा।
संतों ने कहा है: भावपुरी जी ने फिर से एक बार मनुष्य जन्म धारण किया,और डूंगरपुरी जी महाराज के शिष्य हुए ।
जब डूंगरपुरी जी महाराज ने एक छोटे बच्चे के रुप में अपने गुरु भावपुरी जी को देखा, महाराज फूले न समाये ।
कथित:
आज हमारे गुरु आगंन आए,अलख पुरूष अविनाशी ।।
अर्थ: - डूंगरपुरी जी महाराज ने कहा: आज मेरे गुरु मोक्ष के लिए एक और जन्म धारण कर पधारे हैं,अलख के पुत्र हैं ! और वे अविनाशी है यानि जिनकी कभी मौत नहीं होती है।
No comments:
Post a Comment
भारत के अनेक संतों की विचारधारा व उनका जीवनकाल Description List देखने के लिए अपने मोबाइल को (desktop site mode) करें 🙏