हिरणाकश्यप के पुत्र प्रहलाद जी, के पुत्र विलोचन और विलोचन के घर राजा बलि का जन्म हुआ, बलि ने बिलाङा(जोधपुर) में 99 यज्ञ संपूर्ण कर दिए थे,
बलि की माता का नाम सीता था। 11 रानियों के साथ राजा विलोचन ने कारण वश अग्नि में प्रवेश ले लिया, 1 रानी गर्भवती (सीता) थी, जिनकी कोख में बलि था ! इसलिए उन्होंने अग्नि प्रवेश नहीं लिया ।
भगवान विष्णु ने सोचा एक यज्ञ सम्पन्न हो गया तो ये सब राज पाठ बलि के हाथ चला जायेगा। बलि को हराना जरूरी हैं नही तो संसार पर इसका ही राज होगा ।
बलि के गुरू का नाम था सुकराचार्य मुनि था ।
(गुरू ने बलि को हमेशा से एक बात बताई हुई थी,कोई भी ठिंगना आदमी आकर तुझे कुछ भी बोले तो उससे दूर ही रहना।)
बलि ने सोचा 99 यज्ञ सम्पन्न हो गये हैं तो एक यज्ञ तो आसानी से सम्पन्न हो जायेगा । भगवान ने सिर्फ 52 अंगुली की देह बनाई और बलि के वहाँ आये ! बलि के पहरेदार को बोले जा तेरे राजा से बोल एक दानी कुछ मांगने आया हैं ! क्या वो मुझे दान दे सकता हैं ।
बलि आया और बोला: हे महाराज जो मांगो मिलेगा मैने आज तक किसी को निराश नही किया, भगवान ने कहा नही मैं मांग लू और तू नही दे पाया तो, हे राजन पहले मुझे संकल्प भरवा, बलि पानी की जारी लेने अंदर गया, अचानक बलि के गुरू को पता चल गया ये तो भगवान है और बलि को हराने के लिए आए हैं ! तब सुक्राचार्य मुनि पानी की जारी में मेंढक का रूप करके नली में घुस गये ।
बलि वही जारी लेके आया लेकिन जारी की पाईप में सुक्राचार्य मुनि के कारण पानी नही आ रहा था, वहां खङे लोगो में से एक बोला जारी की नली में तिनका डाले ताकि नली साफ हो जाए, जैसे ही एक छोटा तिनका नली में डाला तो सुक्राचार्य मुनि की आंख में जा लगा,आंख फुट गई पानी आना शुरू हो गया
तब संतो ने लिखा है:-
भाग पुरबला उदय हुआ मने जासण आयो इश।
उपर हाथ कंगाल को तले हाथ जगदीश ॥
जब संकल्प लिया तो भगवान् ने कहाँ मुझे ढाई (2.50) पांव जमीन चाहिए, बलि हंसने लगा हे महाराज बस इतनी ही जमीन । तो फिर जारी मंगवाने की कहाँ जरूरत थी ।
अब भगवान ढाई पांव जमीन के लिए अपनी देह को बढ़ानी शुरू किया ! 2 पैर में पुरी जमीन ले ली, भगवान बोले बलि अभी तक आधा पैर बाकि हैं ।
बलि भागकर अपनी माँ के पास गया, मां ने कहा बेटा भगवान खुद तेरे पास मांगने के लिए आ गए हैं तो इससे अच्छा और क्या होगा, जाकर भगवान से बोल आधा पैर तेरे सिर पर रखें जब भगवान तेरे सिर पर पैर रखकर दबाव दे तो भगवान का पैर पकङकर कुछ मांग लेना, बलि आया और भगवान से कहने लगा, हे ! प्रभु संसार की सारी जगह पर आपका हक हो गया अब मेरे पास सिर्फ मेरी काया है, मेरे सर पर अपना पैर रख जमीन पूरी कर लो। भगवान ने बलि के सर पर पैर रखा और बलि को दबाकर पाताल लोक में डाल दिया।
बलि ने भगवान का पैर पकङ कर भगवान को भी अपने पास खींच लिया, भगवान से बलि ने कहाँ नही मुझे अकेला छोड़कर आप नही जा सकते । (भगवान को पहरेदार के रूप में रख लिया) लक्ष्मी जी ने सोचा भगवान अभी तक आए क्यू नहीं, नारद को लक्ष्मी ने भेजा जाओ पता करो भगवान कहाँ पर हैं । नारद पुरी पृथ्वी पर घुमने पर भी भगवान नहीँ मिले तब पाताल लोक गये तो नारद ने विष्णु भगवान को बलि की पहरेदारी करते देखा।
लक्ष्मी जी को जाकर सारी बात बताई, तब लक्ष्मी जी पाताल लोक जाकर एक दुःखियारी (अबला) रूप बनाया, बलि ने देखा तो पुछा कौन हो तुम और यहाँ क्या कर रही हो ।
लक्ष्मी जी ने कहाँ
मैं एक दुःखियारी हूँ जिसका कोई सहारा नही हैं,तब बलि ने कहाँ चिंता ना कर आज से तू मेरी बहन हैं ।
तब लक्ष्मी ने बलि को एक धागा बांधा और भाई बना दिया! उसी दिन से धर्म भाई का त्यौहार शुरू हुआ है।
अब बलि ने कहाँ बहन मांग ले जो मांगना तेरा भाई देने को तैयार हैं ।
तब लक्ष्मी जी ने कहाँ:-
ददि सुत के निके बसे,विलोचुन के बीच ।
वो मांगत हैं लक्ष्मी हरि करो बगसीस॥
अनुवाद:
ददि कहते है समुद्र को समुद्र का बेटा हैं मोती
विलोचुन राजा का बेटा है राजाबलि, हमारे आंख में भी है मोती, तेरी आंखों के बीच में खङे भगवान को छोङा दो मुझे और कुछ नही चाहिए!
बलि बोला: नही बहन
मोती दे दूँ मौखला, हीरा दे दूँ हजार।
ये तो जग में एक हैं,कैसे कर लूं विचार ॥
अनुवाद:
बलि ने लक्ष्मी जी से कहाँ कि मोती ले जाओ, हीरे ले जाओ, मेरी दूनियाँ तो बस भगवान ही हैं नही दे सकता हूँ ।
तब लक्ष्मी जी विलाप करती हुई, ब्रह्माजी के पास गई !लक्ष्मी ने सारी बात ब्रह्माजी को बताई, ब्रह्माजी पाताल लोक गये और भगवान के सामने बलि से विनती करने लगे।
हे बलिराज तू विष्णुजी को छोड़, इनके बिना पुरा बैकून्ठ सुना हैं! मुझे यहां पर रख ले। तब बलि ने कहाँ मैने मना कब किया, मेरे यहाँ तो कोई भी छोटा हो या बड़ा एक को रहना ही होगा ॥
उस दिन से आज तक माना जाता है भगवान ब्रह्मा जी विष्णु जी और शंकर भगवान बलि के वहाँ पहरेदारी करते हैं । ब्रह्मा जी पहरेदारी करके आते है तो सर्दी का मौसम आता है,जब शंकर भगवान आते है तो गर्मी का मौसम आता हैं ।और भगवान विष्णु आते ही बरसाती मौसम आता हैं ।
इसलिए कवि ने लिखा हैं !
दोहा :-
ब,र,ना, शक्ति कहा गये ब,ग,ह, के असवार ।
ल,प,सा, सहित जा खङे विलोसुत के द्वार ।।
अनुवाद: बरना
ब यानि ब्रह्मा //
र यानि रूद्र (शंकर)
ना यानि नारायण (विष्णु) ये तीनो भगवन ब र ना ।
___________________________ब,ग,ह, (तीनो भगवन का वाहन)
ब - बैल
ग- गरङ
ह- हंस
_________________________ल,प,सा, तीनो भगवन की अर्धांगनी
ल - लक्ष्मी जी (विष्णु भगवान)
प - पार्वती जी (शंकर भगवान)
सा- सावित्री जी (ब्रह्मा भगवान)
_________________________
विलोसुत के द्वार - विलोचन राजा का बेटा(सुत) बलि ! जब देव जब पहरेदारी करके बाहर आते है तब उनकी असवारी और अर्धांगनीया साथ रहती हैं ।
और
जब भगवान विष्णु पाताल से पहरेदारी करके धरती पर आये तो बलि की मां से मिलना चाहा,मिलते ही भगवान ने मां से कहा आपको किसी वस्तु की जरूरत हो तो हमे बता दीजिये, हम आपकी सेवा में हाजिर रहेंगे ।
तब बलि की मां कहती है ! वो इंसान मुझे क्या दे सकता है जो मेरे बेटे के सामने हाथ फैला चुका हो जो खुद भिक्षक हो,
श्लोक : भली हुई मैं नही जली विलोसन के साथ ।
मेरी कोख से ऐसा जन्मा मढ़ा दिया हरि को हाथ ।।
अनुवाद:
बलि की मां का कहना था कि अच्छा हुआ कि मैं मेरे पति के साथ अग्नि में ना जली, 12वी थी जो बलि की मां (सिता) का कहा !आज मुझे गर्व हो रहा है मेरे बेटे के आगे भगवान को भी हाथ फैलाना पङा ।
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