दोहा व सार
धनवंता धर्म ना करें,नर्पत करे न न्याव ।
भक्त होय भजन न करें,क्या कीजे ऊपाए ।।
क्या कीजे उपाय,सलाह मानो एक मारी ।
दो वेती रे पूर नदियों,आवे जद भारी ।।
जाए घडी़दा खावता,धरती टिके न पांव।
धनवंता धर्म ना करें,नर्पत करे न न्याव ।।:
अर्थ:
संतों ने कहां है जो धनवान होते हुए धर्म नहीं करते हैं, जो राजा होकर न्याय नहीं कर सकते, भक्त हैं लेकिन भजन नहीं करता हो, तो उन लोगों का संतो के पास एक उपाय है।
उनको नदी आए तब पीछे से धक्का दे दो बस ! फिर जाने दो डुबते डुबते (घड़िदा),ताकि इनके धरती पर पैर भी ना टिके ।
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