।। देव ऋषि नारद के गुरु ।।
एक समय नारदमुनि भगवान विष्णु के पास बैठे थे, तो भगवान विष्णु ने नारद को उनके गुरु के बारे में पूछा, तो नारद नारायण की बात सुनते ही हंसने लग गए,भगवान विष्णु ने पूछा हे ! देव ऋषि (नारद) आप हंस क्यों रहे हो, तब नारद ने कहा हे ! नारायण आप मुझे पूछ रहे हो मेरे गुरु कौन है, जब आपको पता है मैं (जगतपिता) ब्रह्मा जी का पुत्र हूं ! मुझे गुरु की क्या जरूरत है, जब मेरे पिताजी ने ही सृष्टि की रचना की है।
भगवान विष्णु ने कहा : - हे देव ऋषि अंधेरे में चलने के लिए रोशनी की जरूरत होती है ठीक उसी प्रकार संसार के प्रत्येक मनुष्य के साथ-साथ देवताओं को भी हर पथ पर गुरु की जरूरत रहती है,यदि आपके गुरु नहीं है तो आपको देवताओं के प्रतिष्ठापन (सभा) में नहीं जाना चाहिए,,
भगवान विष्णु की यह बात सुन नारद ने कहा हे प्रभु मुझे रास्ता दिखाइए मैं किसको गुरु बनाऊं, भगवान विष्णु ने कहा: देव ऋषि आप प्रभात के समय मृत्यु लोक में जाए सर्वप्रथम जो भी मनुष्य मिले उनको अपना गुरु मान लेना, वहीं आपके सच्चे गुरु कहलायेंगे ।
तब नारद मुनि सुबह जल्दी उठकर मृत्युलोक (धरती) की तरफ बढ़े! तब उनको सबसे पहला मनुष्य एक मछुआरा मिला, जिसका नाम कालूकीर था ! जो व्यापार के लिए आया था, उस मछुआरे को देख नारद के मन में कई सवाल उत्पन्न हो गए । कि इसको गुरु कैसे बनाएं, जब इसका काम भी मछलियों को पकड़ना है, और मैं एक ब्राह्मण हूं ।
तब नारद बिना कुछ सोचे वापस वैकुंठ धाम निकल गए, भगवान विष्णु ने कहा: नारद आप गुरु कर आए, बताओ कौन है आपके गुरु, तब नारद ने कहा: हे ! नारायण मृत्युलोक गया था लेकिन मुझे कोई मिला ही नहीं, तो भगवान ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं कल सुबह जल्दी जाना ।।
नारद फिर दूसरे दिन प्रभात को मृत्युलोक(धरती) पर आएं, अब नारद देखते हैं वहीं मछुआरा उनके सामने आ रहा था, नारद मछुआरे को देखकर वहां से निकल गए,नारद भगवान के पास ना जाकर तीसरे दिन का इंतजार कर रहे थे! जब तीसरे दिन नारद मुनि वापस मृत्युलोक में आए, तो वहीं मछुआरा उनके सामने आया, तो नारद ने सोचा आज इस मछुआरे से बात कर ली जाए,
नारद कुछ बोलने वाले थे, उससे पहले मछुआरे ने देव ऋषि नारद से कहा: हे ! देव ऋषि आप सर्वव्यापी हो,आपको तो होनी और अनहोनी का पता रहता है, आप मुझे बताएं आज 3 दिन हो गए, पता नहीं मैं किसका मुंह देखता हूं थोड़ा सा भी व्यापार नहीं कर पा रहा हूं ।
ऐसा संतो ने कहा है: जिनके गुरु नहीं सुबह उनका मुंह दिख जाए तो पूरा दिन खराब हो जाता है।
यह सुनते ही नारद अंदर ही अंदर पिघलने लग गए, मन में सोच रहे थे 3 दिनों से इनके सामने मैं ही आ रहा हूं। नारद ने पैर पकड़ लिए और कहां हे ! नाथ में ही हूं वह मेरे गुरु नहीं है, आप मुझे शिष्य बना लो, तब कालू कीर (मछुआरे) ने नारद को अपना शिष्य बना लिया, नारद बहुत खुश हुए।
नारद वहां से बैकुंठ धाम निकल गए धाम को गए, भगवान विष्णु ने कहा: हे देव ऋषि आज बहुत खुश लग रहे हो, अब तो आपको गुरु मिल गए होंगे,तब नारद ने मन में सोचा भगवान विष्णु के सामने मेरे गुरु मछुआरे का नाम कैसे ले, तब नारद ने कहा: हे प्रभु मैंने गुरु तो बना लिए पण (- निंदा)
यह निंदा का शब्द सुनते नारद को भगवान विष्णु ने कहा नारद आपने अपने गुरु की निंदा की है, इसलिए आपको चौरासी भुगतनी होगी,(सारे जन्मो का भुगतान करना होगा,84 लाख योनियों में जन्म )चौरासी का नाम सुनते ही नारद की आंखों में आंसू आ गए भगवान विष्णु से कहा: से प्रभु मुझे माफ कर दीजिए अनजाने में मुझसे यह पाप हो गया,,
भगवान ने कहा अब तो शायद आपको आपके गुरु ही इस से मुक्ति दिला सकते हैं, अब नारद दौड़ कर अपने गुरु कालू कीर के पास गए,और सारी बात उनको बताई, तो मित्रों गुरु कभी नहीं चाहता शिष्य दुःखी हो, तब कालूकीर ने नारद से कहा: जाओ भगवान से कहो चौरासी क्या होती है, कैसी होती है, मुझे इस धरती पर चित्र बनाकर बताएं, जब भगवान चित्र बना दे तब नारद तुम उस चित्र के ऊपर लुट जाना, जब तक भगवान कुछ ना बोले तब तक लूटते रहना ।
तब नारद भगवान विष्णु के पास आए भगवान ने कहा: नारद आप चौरासी (84) भुगतने के लिए तैयार हो, तो नारद ने कहा, हे ! नारायण मैंने कभी चौरासी देखी नहीं है यह कैसी होती है मुझे आपके कर कमलों (हाथों) धरती पर चौरासी का चित्र दिखावे, तो भगवान विष्णु ने रेत (जमीन) पर एक हाथी का फोटो बनाया, उस हाथी के आधे भाग में कीड़े तड़प रहे थे, आधा भाग समान था । भगवान विष्णु ने कहा: जहां पर कीड़े लगे हैं यहीं चौरासी है।
तब नारद ने भगवान विष्णु से पुनः पुछा हे ! प्रभु यही चौरासी है, भगवान ने कहा: हां देव ऋषि यही चौरासी है, फिर नारद ने पूछा हे नारायण इसमें और उस चौरासी में कोई फर्क तो नहीं, तब भगवान ने हंसकर कहां: देव ऋषि जी यह भी मेरे हाथ की है वो भी मेरे हाथ की है तो फर्क क्या होगा,तब नारद खुश होकर अपने कपड़े उतार कर उस हाथी के चित्र पर लूटने लगे ।
भगवान विष्णु ने कहा: नारद आप यह क्या कर रहे हो,
नारद ने कहा हे प्रभु मैं चौरासी का भुगतान रहा हूं, भगवान ने कहा ऐसे कैसे! तब नारद ने कहा हे ! प्रभु आपने कहां इसमें और उस में कोई फर्क नहीं, वह चौरासी आपके हाथ की यह भी आपके हाथ की बनी है ।
तब भगवान विष्णु आश्चर्य में पड़ गए, और नारद से कहा: हे ! मुनिवर आपको यह रास्ता किसने दिखाया, नारद ने कहा: मेरे गुरु ने ! भगवान ने कहा: देव ऋषि आपके इतने अच्छे गुरु है जिन्होंने आपको 1 मिनट में चौरासी का भुगतान करवा दिया, और आपने उनकी निंदा कर दी ।
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