Saturday, 29 August 2020

परसाराम जी खाती, जीवनी

परसाराम जी खाती

परसाराम जी खाती का जन्म विक्रम संवत 1519 में गांव कलरूं (राजस्थान) में हुआ, ये गांव नागौर जिले के मेड़ता तहसील में स्थित है ।


परसराम जी बचपन से ही माता के भक्त रहे, फिर एक दिन पीपाजी महाराज का आगमन उनके घर पर हुआ,पीपाजी महाराज ने उनको श्री राम का भक्त बना दिया,,
एक बार मेड़ता के राजा जयमल जी जोधपुर जा रहे थे, कलरुं गांव के पास मार्ग में उनके रथ का पहिया टूट गया,जयमल जी के साथ थे लावा (गांव) के ठाकुर लक्ष्मण सिंह उनको व हलकारों को नजदीक गांव कलरूं से खाती (मिस्त्री) लाने को भेजा, राजा के संत्री कलरूं गांव में जाकर खाती के बारे में पूछा तब लोगो ने खाती परसराम जी का घर बताया, लेकिन उस समय परसराम जी संतो की सेवा में लगे थे,

 भगवान  ने मन में सोचा मेरा भक्त संत सेवा में लीन है तो क्यों ना मैं अपने भक्त का काम कर देता हूं ! भगवान खुद परसराम खाती बनकर उनके सामने आ गए,कारीगर के मिल जाने पर सबको को खुशी हुई, भगवान कारीगर बने हुए राजा जयमल जी के पास गए व उस रथ के पहिए को ठीक किया, राजा जोधपुर को रवाना हो गए,आगे जाकर हलकारे (संत्री) देखते हैं रथ के तीन पहिए धरती पर टिके हूए चल रहे हैं, मगर जिस पहिए को ठीक किया गया वह बिना धरती के लगे चल रहा था ।


उन सब ने ये बात राजा को बताई राजा जयमल खुद रथ से उतरकर देखा तो वाकई में एक पहिया जमीन से 1 फीट ऊंचा था, राजा जयमल को आश्चर्य हुआ, फिर से राजा ने पहिए को गौर से देखा तो उस पहिए में ना कील थी ना कोई जोड़ था,ये देख जयमल जी और भी आश्चर्य में पड़ गए, तब उन्होंने लावा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह को कहां उस परसराम खाती को वापस बुलाओ, परसराम को बुलाया और कहां जिस तरह इस पहिए को बनाया वैसे तीनों पहियों को बना दिजिए, जब परसराम जी ने पहिए को देखा वह भी आश्चर्य में पड़ गए, राजा से कहां ऐसा पहिया ना मैं बना सकता हूं ना कोई कारीगर बना सकता है। परसराम जी ने कहा: ऐसी बिना जोड़ की कारीगरी परमात्मा के अलावा कोई नहीं कर सकता ।



सबने ने कहां : क्या कह रहे हो परसाराम जी हम सभी अपनी आंखों से आपको पहिया ठीक करते देखा है, परसाराम ने कहां: हे राजन् मैंने ये पहिया नहीं बनाया आप उन संतों से पुछ लिजिए मैं सुबह से अभी तक उनकी सेवा में था । तब जयमल जी को पश्चाताप होने लगा भगवान खुद आए मगर वो पहचान नहीं कर पाएं, राजा जयमल जी ने कहां : परसजी आप भगवान को पुनः बुलाए,अब तो मैं परमात्मा के दर्शन के लिए इच्छुक हूं !



परसराम जी ने कहां : राजन् सिर्फ कहने पर भगवान कभी दर्शन नहीं देते हैं, राजा ने हाथ जोड़कर कहां : परस जी आप चाहें तो भगवान के दर्शन हो सकते हैं अगर आपने मुझे दर्शन नहीं करवाएं तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगा ।

राजा ने कहां

नहीं जाऊं मैं मेड़ता नहीं जाऊं जोधाण ।

प्राण तजु तुझ बारणे,मोहे गुरु की आण ।।

विनय करें कर जोड़कर,कहे जयमल राय ।

के तो हरि मिलाय दे,के मरु कटारी खाय ।।


अर्थ:

                            राजा जयमल जी ने कहां : अब ना तो मेड़ता जाऊंगा ना जोधपुर जाऊंगा, कसम मेरे गुरु की यहीं प्राण त्याग दूंगा, हाथ जोड़कर जयमल जी ने फिर कहां या तो मुझे भगवान से मिलवा दो नहीं तो मैं अपनी तलवार से अपने आप को खत्म कर दूंगा ।


तब परसराम ने भगवान से प्रार्थना की है प्रभु आप तो सर्वोपरि हो, घट घट की पहचान है आपको हे ! प्रभु एक बार मेरी प्रार्थना स्वीकार करें । बस उसी क्षण भगवान ने राजा जयमल को वह दर्शन दे दिए,, ये घटना संवत 1604 में चैत्र सुदी, बुधवार की है । राजा जयमल अति प्रसन्न हूए और परसराम जी को संतो की सेवा के लिए 500 एकड़ ज़मीन भेंट की व कलरुं गांव में चतुर्भुज जी का मंदिर बनवाया ।
विक्रम संवत 1681 में परसराम जी ने समाधि ली,

 भाद्रपद में परसराम जी का दिन होता है,तब पुरे कलरूं गांव की सरहद में केसर की रिम झिम बारिश होती है।




No comments:

Post a Comment

भारत के अनेक संतों की विचारधारा व उनका जीवनकाल Description List देखने के लिए अपने मोबाइल को (desktop site mode) करें 🙏