यह श्लोक मलूक दास जी ने उस समय लिखा:
अजगर करे नी चाकरी पंछी करे नी काम।
दास मलुका यूं कहते हैं सबके दाता राम।।
एक दिन मलुक दास जी सत्संग में गये वहां उनको एक शब्द सुनने को मिला,कि कभी इंसान को चिंता नहीं करनी चाहिए भगवान उसे प्रतिदिन का भोजन (निवाला) अपने आप देता है ! तब मलुकदास जी ने तय कर लिया कल हम मजदुरी पर नहीं जायेंगे और घर पर भी नहीं रुकेंगे फिर पेट में निवाला आता है के नहीं, बस अगले दिन मलुकदास जी सुबह ही घर से जंगल की ओर रवाना हो गए, और मन में सोचते रहे आज कई भोजन के नजदीक भी नहीं जाएंगे तो हमारी पेट में कैसे निवाला जाएगा।
फिर धीरे-धीरे आगे बढ़े, तो रास्ते में देखा एक टिफिन पड़ा मिला जिसमें भोजन था, तब मलूक दास जी ने सोचा हो सकता है किसी ने भोजन की व्यवस्था की हो,लेकिन हम भोजन करेंगे नहीं (देखते हैं निवाला कैसे पेट में जाता है)|बस यही सोचते-सोचते मलूक दास जी पेड़ के ऊपर चढ़ गए और ऊपर बैठ गए,
तभी वहां 2 चोर आ गए और टिफिन देख उनके मन में भोजन करने कि इच्छा जताई, मगर अनजान जगह टिफिन देख चोरो ने सोचा क्या पता किसी ने हमें मारने की साजिश रची हो टिफिन में जहर भी हो सकता है|चोरों ने एक दूसरे से कहा किसी ने टिफिन यहां पर यह रखा है, तो यहां पर जरूर कोई व्यक्ति भी होगा। तब एक चोर की नजर अचानक ऊपर पेड़ पर पड़ी, जहां पर मलूक दास जी बैठे थे!
दोनों चोरों ने मलूक दास जी को नीचे बुलाया और कहां यह टिफिन आपका है। मलूक दास जी के मना करने पर चोरों ने जबरदस्ती मलूक दास जी से टिफिन खुलवाया,पहले मलूक दास जी को जबरदस्ती भोजन करवाया! मलूक दास जी बार-बार मना करते रहे मगर वह चोर ऊपर से ऊपर निवाला देते रहे ।
तब मलूक दास जी के मन में एक विचार आया इस दुनिया में देने वाला भगवान है जिनको (भोजन) निवाला देना है कैसे देख करके भगवान उन तक पहुंचा देते हैं ।
इसलिए मलूक दास जी नहीं यह श्लोक लिखा था ।
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