बलख-बुखारा ये दो शहर अफगानिस्तान व उज्बेकिस्तान में स्थित है।
बुखारा के सुल्तानी बादशाह एक दिन घुमते घुमते रैदास (रविदास) जी कुटिया पहुंचे,उस समय रैदास जी का नाम भक्ति के तप से चारों खुंट में फैला हुआ था, भगवान की भक्ति के साथ साथ रैदास जी चमड़ा रंगने का काम करते थे ! बादशाह ने मन में सोचा यहां तक आए हैं तो रैदास जी के दर्शन भी कर लेते हैं, बादशाह रैदास जी कुटिया में आएं ! रैदास जी को बड़ी प्रसन्नता हुई, बादशाह को उसी (चमड़ा रंगने की) कुंड से चरणामृत दिया, बादशाह आश्चर्य में पड़ गए और मन ही मन कहने लगे चमड़े की कुंड का गंदा पानी मैं कैसे पी लूं,
रैदास जी के सामने हाथ में लिया चरणामृत गिरा भी नहीं सकते थे, बादशाह ने हाथ को मुंह के सामने ऊपर कर कपड़े की बांह में उतार दिया, बादशाह अपने सिपाहियों के साथ महल आ गएं, दुसरे दिन दासी बादशाह के कपड़े धो रही थी, उसने देखा कपड़े की बांह पर दाग लगा था, दासी ने उस दाग को धोने की बहुत कोशिश की लेकिन वह कपड़े पर लगा दाग नहीं निकाल पाई, दासी ने मुंह से उस दाग को चुम लिया, दासी अचानक मग्न हो गई ! दासी को महसूस हुआ मैं परमात्मा के अलावा किसी की दासी नहीं हूं, वह दासी जहां बादशाह सोते थे उस सैज पर जाकर सो गई,
बादशाह अपने महल में आएं और अपनी सैज पर सोई दासी को देखा तो आग बबूला हो गए, बादशाह चमड़े का कोड़ा लेकर दासी की पीठ चार चाबुक मारे, दासी उस सैज से निचे गिर पड़ी,रोने की बजाय दासी हंसने लगी, बादशाह ने सोचा इस कोड़े (चाबुक) की मार को घोड़ा भी सहन नहीं कर सकता और दासी हंस रहीं हैं, दासी के हंसने का कुछ तो कारण जरुर हैं, बादशाह ने दासी से कहां तेरा हर गुनाह माफ करता हूं ! मुझे ये बता तू हंस क्यूं रही है,
तब दासी ने कहां : मेरा गुनाह सिर्फ इतना है कि मैं इस सैज पर कुछ पल सोई और सज्जा कोड़े की मार से मिली, य़दि मुझे इस सैज पर सोने की सज्जा मिली है तो हुजूर आप भी इस सैज पर वर्षो से सोते आ रहे हो, यदि मुझे गुनाह की सज्जा देने वाले आप हो तो आपके ऊपर कोई आपको सज्जा देने वाला होगा, मेरे गुनाह को आपने देखा तो आपके गुनाह को भी कोई देख रहा होगा ।
दासी के मुख से शब्द सुनते ही बादशाह की आंख में आंसू निकल आए बादशाह को ऐसा लग रहा था कि इंसान के अच्छे व बुरे कर्मो का फल देने वाला (अल्लाह) वो ही है ! बादशाह का हदय पिघल गया, बादशाह ने दासी से कहां : दासी तुने मुझे आज एक धर्म का रास्ता बता दिया परन्तु तुम्हारे मन में इतने वर्षों के बाद ये ख्याल कहां से आया, तब दासी सारी बात बादशाह को बताई, और कहां हुज़ूर कपड़े पर लगे उस दाग ने मेरे हृदय का ताला खोल दिया । बादशाह ने जब कपड़े पर लगा दाग देखा उनको रैदास जी की याद आ गई, (उनको पश्तावा हो रहा था कि मैंने चरणामृत को बेकार समझकर गिरा दिया) बादशाह ने वापस रैदास जी की चरण में जाने का निर्णय लिया ।
बादशाह रैदास जी की कुटिया आकर चरणामृत के लिए अपने दोनों हाथ आगे किए तब रैदास जी ने कहां: आज चरणामृत नहीं है, बादशाह ने जब कुंड में देखा तो चरणामृत था लेकिन रैदास जी ने कहां यदि तुम ये पुरा चरणामृत पी लोगे तो भी अब ये तुम्हारे काम का नहीं है, जो तुम्हारे काम का था वह तुमने गिरा दिया,, अब वो समय तुम्हारे हाथ से चला गया, तब बादशाह ने कहां : मुझे भक्ति का पथ दिखा दीजिए ! रैदास जी ने कहां उसी दासी को अपना गुरु मान कर अपना राज छोड़ नाम का सुमिरन करते रहना ।
तब से बादशाह ने दासी को अपना गुरु मान लिया ।
दोहा:
अर्थ: मुल्क बुखारे का बादशाह अपनी दासी को गुरु मानकर अल्लाह (ईश्वर) से प्रेम ऐसा प्रेम लगा लिया , जो फुलों की सैज पर सोते थे लेकिन अब वो ज़मीन पर बिना बिछाएं सोने लग गये, वो बादशाह अपनी फौज के साथ नगारे की आवाज से घमासान युद्ध करते थें आज वे बोझ उठाने लग गये,, जिनके एक इशारे पर महलों में तरह तरह के भोजन तैयार होते थे लेकिन आज वो बासी रोटी खाने लग गये ।
रैदास जी के सामने हाथ में लिया चरणामृत गिरा भी नहीं सकते थे, बादशाह ने हाथ को मुंह के सामने ऊपर कर कपड़े की बांह में उतार दिया, बादशाह अपने सिपाहियों के साथ महल आ गएं, दुसरे दिन दासी बादशाह के कपड़े धो रही थी, उसने देखा कपड़े की बांह पर दाग लगा था, दासी ने उस दाग को धोने की बहुत कोशिश की लेकिन वह कपड़े पर लगा दाग नहीं निकाल पाई, दासी ने मुंह से उस दाग को चुम लिया, दासी अचानक मग्न हो गई ! दासी को महसूस हुआ मैं परमात्मा के अलावा किसी की दासी नहीं हूं, वह दासी जहां बादशाह सोते थे उस सैज पर जाकर सो गई,
बादशाह अपने महल में आएं और अपनी सैज पर सोई दासी को देखा तो आग बबूला हो गए, बादशाह चमड़े का कोड़ा लेकर दासी की पीठ चार चाबुक मारे, दासी उस सैज से निचे गिर पड़ी,रोने की बजाय दासी हंसने लगी, बादशाह ने सोचा इस कोड़े (चाबुक) की मार को घोड़ा भी सहन नहीं कर सकता और दासी हंस रहीं हैं, दासी के हंसने का कुछ तो कारण जरुर हैं, बादशाह ने दासी से कहां तेरा हर गुनाह माफ करता हूं ! मुझे ये बता तू हंस क्यूं रही है,
तब दासी ने कहां : मेरा गुनाह सिर्फ इतना है कि मैं इस सैज पर कुछ पल सोई और सज्जा कोड़े की मार से मिली, य़दि मुझे इस सैज पर सोने की सज्जा मिली है तो हुजूर आप भी इस सैज पर वर्षो से सोते आ रहे हो, यदि मुझे गुनाह की सज्जा देने वाले आप हो तो आपके ऊपर कोई आपको सज्जा देने वाला होगा, मेरे गुनाह को आपने देखा तो आपके गुनाह को भी कोई देख रहा होगा ।
दासी के मुख से शब्द सुनते ही बादशाह की आंख में आंसू निकल आए बादशाह को ऐसा लग रहा था कि इंसान के अच्छे व बुरे कर्मो का फल देने वाला (अल्लाह) वो ही है ! बादशाह का हदय पिघल गया, बादशाह ने दासी से कहां : दासी तुने मुझे आज एक धर्म का रास्ता बता दिया परन्तु तुम्हारे मन में इतने वर्षों के बाद ये ख्याल कहां से आया, तब दासी सारी बात बादशाह को बताई, और कहां हुज़ूर कपड़े पर लगे उस दाग ने मेरे हृदय का ताला खोल दिया । बादशाह ने जब कपड़े पर लगा दाग देखा उनको रैदास जी की याद आ गई, (उनको पश्तावा हो रहा था कि मैंने चरणामृत को बेकार समझकर गिरा दिया) बादशाह ने वापस रैदास जी की चरण में जाने का निर्णय लिया ।
बादशाह रैदास जी की कुटिया आकर चरणामृत के लिए अपने दोनों हाथ आगे किए तब रैदास जी ने कहां: आज चरणामृत नहीं है, बादशाह ने जब कुंड में देखा तो चरणामृत था लेकिन रैदास जी ने कहां यदि तुम ये पुरा चरणामृत पी लोगे तो भी अब ये तुम्हारे काम का नहीं है, जो तुम्हारे काम का था वह तुमने गिरा दिया,, अब वो समय तुम्हारे हाथ से चला गया, तब बादशाह ने कहां : मुझे भक्ति का पथ दिखा दीजिए ! रैदास जी ने कहां उसी दासी को अपना गुरु मान कर अपना राज छोड़ नाम का सुमिरन करते रहना ।
तब से बादशाह ने दासी को अपना गुरु मान लिया ।
दोहा:
सुल्तानी मुल्क बुखारे दा !
धन्य दासी गुरु हमारी राय बताई पियूं पयार दा ।
जिनको नेह लगा ईश्वर से अल्लाह राम पुकार दा ।।
चुन चुन कलियां सैज बिछाती कली का रस न्यार दा ।
अब तो धरती पोढण लागा कंकर ही नहीं बोर दा ।।
दल बादल ले लश्कर चढ़ता, पड़ती ध्रीह नगारे दा ।
अब तो बोझ उठावण लागा, गुदड़ सेर अठारे दा ।।
चंगी चीज निवाले लेता, ताता तुरंत तैयारे दा ।
अब तो बासी खावण लागा त्याग दिया पैजारे दा ।।
अर्थ: मुल्क बुखारे का बादशाह अपनी दासी को गुरु मानकर अल्लाह (ईश्वर) से प्रेम ऐसा प्रेम लगा लिया , जो फुलों की सैज पर सोते थे लेकिन अब वो ज़मीन पर बिना बिछाएं सोने लग गये, वो बादशाह अपनी फौज के साथ नगारे की आवाज से घमासान युद्ध करते थें आज वे बोझ उठाने लग गये,, जिनके एक इशारे पर महलों में तरह तरह के भोजन तैयार होते थे लेकिन आज वो बासी रोटी खाने लग गये ।
सुल्तानी मग्न वैराग्य में तज दीना बलख बुखारा ।
जो बैठ पालकी चालता पैरों में पड़ गया छाला ।।
पांच टका की पोशाक थी अब ओढ़े गुदड़ भारा ।
ईश्वर (अल्लाह) के नाम कर लिया जीवन सारा ।।
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