Saturday, 15 October 2022

सती अनुसूया का जीवन

एक दिन नारद मुनि को भगवान विष्णु ने बैकुंठ धाम में बुलाकर कहां से मुनिवर मृत्युलोक में जाओ और मेरे लिए यह लोहे के चणे भुनाकर (पकाकर) ले आओ, नारद मन ही मन सोचने लगे भगवान यूं ही शर्मिंदा कर रहे हैं, हरि विष्णु ने कहां नारद मैं आपको शर्मिंदा नहीं कर रहा आपको मृत्युलोक जाकर यह चणे भुनाकर लाने हैं तब नारद ने  और कहां: हे प्रभु ऐसा कभी ना सूना ना किसी को देखा जो लोहे के चणे कौन पका सकता हो ! तब हरि बोले: हे मुनिराज इस धरती पर ऐसे कई भक्त रहते हैं जिनकी भक्ति के आगे भगवान भी शून्य हैं जाओ नारद आपको कोई ना कोई ऐसा जरूर मिलेगा जो यह काम पल भर में कर देगा, हे मुनिवर आप अपने विनम्र भाव से ही वहां तक पहुंचोगे ।


 नारायण की बात सुन नारद मृत्युलोक को निकले, आते जते सभी से कहने लगे मुझे लोहे के चणे पकाने हैं कोई मेरा मददगार बन सकता है कई लोग तो नारद मुनि पर हंसने लगे कई लोग मजाक बनाकर कहने लगे महाराज यहां पर खाने के चणे भी बहुत मुश्किल से पका पाते हैं आप लोहे के चणे कहां से लाए हो ये पकाना तो हमारे वश में नहीं तब नारद मुनि ने सोचा यदि भगवान ने मुझे इस काम के लिए भेजा हैं तो जरूर कोई ना कोई मेरा यह काम अवश्य करेगा ।







नारद मूनि दो से तीन घंटे तक भूलोक पर गमन करते रहें मगर ऐसा कोई नहीं मिला जो लोहे के चणे भुन सके तभी अचानक वहां से गुजर रहे एक सेठ ने यह बात सुनी और नारद से कहां मुनिवर आप जिस काम के लिए आए हो यह काम कोई साधारण मानव या स्त्री कर सकती हैं यह काम वहीं कर सकता हैं जिसका जीवन माया में नहीं भगवान के चरणों में पहले से अर्पण हो यहां पर कोई ऐसी सती एवं साधु नहीं जो आपको यह लोहे के चणे भूनकर दे सकता हैं।
सेठजी ने कहां मुनिवर मेरे पास एक जगह आप वहां जाओ तो आपका यह काम हो जायेगा, तभी नारद मुनि खुश होकर बोले कृपा करके हमें वह जगह बताएं तब सेठजी ने उनको कहां मुनिवर आप यहां से सीधे चले जाओ रास्ते में एक छोटा अत्रि मुनि का आश्रम आयेगा वहां जाओ वहां पर लोहे के तो क्या पत्थर के चणे भी पका दिए जायेंगे,





नारद मुनि बहुत खुश हुएं उसी रास्ते पर चल दिए मन ही मन मुस्कुराते रहे आश्रम पहुंच नारायण नारायण की आवाज लगाई तभी अत्रि मुनि की पत्नी अनसूया माता बाहर आए नारद मूनि को देख बहुत खुश हुएं,
तभी नारद मुनि सती को प्रणाम करते हुए कहने लगे माता श्री मैं बैकुंठ धाम से आया हूं मुझे यह लोहे के चणे भुनाने है  मृत्यु लोक पर ऐसा कोई नहीं मिला जो हरि का यह काम कर सके फिर किसी ने मुझे आपके आश्रम की जानकारी दी, तभी शीघ्र मैं यहां लौट आया।







सती प्रसन्नतापूर्वक कहने लगी हे मूनिवर मैं आपके यह चणे भुनकर दे दूंगी पर अभी मैं मेरे गुरू मेरे पतिदेवता की सेवा में लगी हूं वह काम ही मेरा धर्म है इसलिए आपको कुछ देर तक ठहरना होगा एक घंटे बाद मैं शीघ्र आकर आपके यह चणे भूनकर दे दूंगी ! अब नारद मुनि करते भी क्या ठहरना जरूरी था एक घंटे तक नारद मुनि वहीं बैठे रहे एक घंटे बाद अनसूया माता बाहर आई प्रसन्ता से एक लोहे की सिगड़ी जलाकर ऊपर एक बर्तन (पात्र) में लोहे के चणे डाल दिए, नारद मुनि नजर भर कर देखने लगे तब तक तो लोहे के चणे भुनकर तैयार थे, यह देख नारद मुनि आश्चर्य में पड़ गये इतने में सती ने नारद मुनि को लोहे चणे भूनकर दे दिए ।





जब नारद मुनि ने लोहे के चणे हाथों में लिए तब हक्के बक्के हो गए नारद के हाथों में सारे चणे बिल्कुल पक्के हुए थे, 
मुनिवर ने सती अनुसूया माता को प्रणाम कर किया हे माते मेरे जीवन में यह पहला अद्भुत दर्शय है नारद मुनि की सोच से परेह था की ऐसा भी हो सकता है, आपको बारंबार प्रणाम कहकर नारद मुनि बैकुंठ धाम को चल दिए भगवान हरि विष्णु के चरणों में शिष निवाकर बोले हे प्रभु नामुमकिन को आज किसी ने मुमकिन कर दिखाया, मेरे मन में जाते वक्त पुरा संकोच था भगवान (आपने) ने ऐसा काम मुझे क्यों सौपा जो मुमकिन हैं भी नहीं ।






भगवान ने कहा: मुनिवर मैंने पहले भी कहां थी धरती पर सती जती सन्त महापुरुष जब तक है तब तक ही मृत्युलोक में मानव धर्म है समस्त मानव जीवन सनातन पर ही टिका है और इन्हीं सन्त सती जती महापुरुषों पर सनातन की मजबूती है।

 
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