एक भगवान विष्णु से लक्ष्मी ने कहां : हे नारायण आपको नहीं लगता आपके सारे भक्त मेरे होते जा रहें,
भगवान : मैं समझा नहीं !
लक्ष्मी : स्वामी इस संसार का हर व्यक्ति (लक्ष्मी) मुझे पाने के लिए आपको भुल सकता हैं,
भगवान ने कहां : चलो आज किसी भक्त की परीक्षा लेने जा रहा हूं आप भी उसकी परीक्षा लेने आ जाना ।
लक्ष्मी : ठीक है स्वामी चलिए आप,
भगवान विष्णु साधु के रूप में मृत्युलोक में आए, और एक सेठ के महल के सामने आकर जल के लिए अलख लगाई साधु की आवाज सुनकर सेठ जल का लोटा लेकर बाहर आएं, भगवान ने जल पिया ! तब सेठ ने सोचा जीवन भर माया जोड़ने का ही काम किया,जीवन किसी में साधु को भोजन करवाना, दान देना, हित व परोपकार कार्य नहीं किया आज साधु दर पर आएं हुएं हैं तो क्यों ना इनको भोजन करवा दूं तो अपना तन,मन,धन,माया, सारी पवित्र हो जाएंगी ।
सेठ ने भगवान से भोजन के लिए निमंत्रित किया ।
भगवान (विष्णु) : नहीं सेठ हमें देर हो रही है आपके यहां जल पी लिया अब किसी और भक्त के घर ढुंढकर चतुर्मास के लिए बैठना है ।
सेठ मन में सोचने लगे : यानि ये साधु चार महिने किसी के घर में चतुर्मास करेंगे, वो भक्त हर रोज साधु को भोजन करवायेंगे तो उस भक्त को कितना फायदा होगा, मेरे महल में जगह भी बहुत हैं क्यूं ना मैं इन साधु को मेरे यहीं चतुर्मास के लिए बैठा दूं ! तो मेरा जीवन भी धन्य हो जायेगा ।
सेठ भगवान विष्णु से कहने लगें हे ! महाराज आपको एतराज नहीं तो मेरे महल में जगह भी बहुत हैं, आप यहां पर चतुर्मास कर लिजिए,, आपको किसी प्रकार की कमी महसूस नहीं होगी,
भगवान (विष्णु) : देख सेठ हम संत जहां भी चतुर्मास के लिए बैठते हैं चार महिने से पहले बीच में नहीं उठते, आप पहले सोच लिजिए फिर हम महल के अंदर चलेंगे ।
सेठ : हे ! महाराज इसमें सोचना क्या है ये मेरा घर है मैं आपकी सेवा में हाजिर रहूंगा, आट चार महिने तो क्या 12 महिने रूक सकते हो,
भगवान (विष्णु) : ठीक है सेठ ! अब मुझे विश्वास है तुम पर विश्वास हैं।
सेठ भगवान विष्णु को अपने महल के अंदर ले गया, उनको अच्छे आसन पर बिठाया, और सेठ ने अपने रसोईया को स्वादिष्ट भोजन बनाने को कहां, सेठ के घर किसी बात की कमी नहीं थी रसोइये ने साधु लिए काजु बादाम का हलवा बनाया, जब भगवान ने भोजन किया उनको बहुत ही प्रसन्नता हुई ! भगवान् महल में अच्छी जगह देख चतुर्मास के लिए बैठ गये ।
कुछ ही समय के बाद लक्ष्मी जी साध्वी के रूप में उसी महल के सामने आ गई जल के लिए अलख लगाई , लक्ष्मी की आवाज सुनकर सेठ जल का लोटा भरकर बाहर आएं, लक्ष्मी जी को देखा सेठ ने मन में कहने लगे जरूर आज मेरा जीवन धन्य हो गया सुबह वो साधु पधारें, अभी ये साध्वी पधारी, सेठ ने जल का लोटा साध्वी के सामने किया कहां : लिजिए माताजी जल ग्रहण किजिए ! तब
लक्ष्मी जी ने कहां : नहीं सेठ हम किसी ओर के पात्र में जल नहीं पीते, लक्ष्मी जी ने अपनी झोली में हाथ डाल कर एक चांदी की गिलास निकाली और कहां सेठ जल इस भरवा दीजिए, चांदी की गिलास देख सेठ ने सोचा ये साध्वी कोई उच्च स्तर (VIP) की है, लक्ष्मी जी ने पानी पीकर उस चांदी के गिलास को फेंक दिया,
सेठ ने कहा : हे साध्वी जी ये आपने क्या कर दिया चांदी का गिलास क्यूं फेंक दिया,
लक्ष्मी जी : सेठ हम किसी ओर के पात्र का प्रयोग नहीं करते और एक ही बार नये बर्तन का उपयोग करते हैं फिर वह भी हमारे लिए झूठा हो जाता है, इसलिए उसे फेंक देते हैं, Use and throu
सेठ ने कहां : तो क्या ये गिलास में ले सकता हूं !
लक्ष्मी जी : हां सेठ ये बर्तन तुम्हारे काम आ जायेगा, चांदी का गिलास लेकर सेठ अत्यंत प्रसन्न हुआ ।
सेठ ने सोचा महल में भोजन कुछ देर पहले ही बना हुआ है क्यों न साध्वी जी को भी भोजन करवा देते हैं।
सेठ : माताजी आप अंदर चलकर भोजन ग्रहण कर लीजिए,
लक्ष्मी जी : नहीं सेठ हमें बहुत देर हो रही है,
सेठ : माताजी मेरे घर तक पधारें आप दो निवाले ही सही भोजन ग्रहण करोगे तो मेरा भाग्य उदय हो जायेगा ।
लक्ष्मी : चलिए सेठ जब तुम्हारी इतनी इच्छा है तो भोजन कर लेते हैं, सेठ बहुत प्रसन्न हुआ, महल में जाकर साध्वी जी के लिए हलवे के साथ थाल सजाया, थाल देखकर लक्ष्मी जी ने कहां : सेठ मैंने तुम्हें पहले ही कहां है हम किसी और के बर्तन को उपयोग में नहीं लेते,
लक्ष्मी जी ने अपनी झोली में हाथ डालकर एक सोने का थाल निकाला और कहां सेठ भोजन इस थाल में डाल दीजिए, सोने का थाल देख सेठ की आंखें दंग रह गई, लक्ष्मी जी ने भोजन ग्रहण कर उस थाल को फेंक दिया,
सेठ ने कहां : साध्वी जी ये तो सोने का था,
लक्ष्मी जी : सोने का हो या हीरे का हमारे लिए झूठा हो गया, तुम्हें चाहिए तो तुम ले सकते हो, सेठ सोने का थाल पाकर फुले नहीं समा रहा था ! फिर सेठ ने कहां : माताजी जी आप अब आगे कहां पर जा रहे हो,
लक्ष्मी जी : देख तुम्हारे यहां भोजन ग्रहण कर लिया अब आगे कहीं अच्छे भक्त का मिल जाएं बस चतुर्मास के लिए बैठना है, सेठ ने सोचा यदि ये माताजी जहां भी चार महिने चतुर्मास करेंगी तो हर रोज भोजन करके कितने सोने के थाल फेंकेगी, मेरे घर में जगह बहुत हैं इन साध्वी जी को भी यहीं बिठा दूं तो चार महिने में तो धन ही धन इकट्ठा हो जायेगा ।
सेठ ने कहां : माताजी आपको ऐतराज नहीं तो एक बात कहूं !
लक्ष्मी जी : हां सेठ बोलो,
सेठ : मेरे घर सुबह एक संत और आएं हुएं चतुर्मास में बैठें हैं यदि आप भी यहीं चतुर्मास कर लो तो मेरा जीवन सफल हो जायेगा ।
लक्ष्मी जी : सेठ मुझे चतुर्मास में तो बैठना ही है लेकिन एक घर में दो लोग चतुर्मास के लिए नहीं बैठ सकते, तुम चाहते हो मैं तुम्हारे घर चार महिने चतुर्मास करूं तो उस संत को निकालना ही होगा, अन्यथा ये मुमकिन नहीं हैं ! सेठ।
सेठ लालच में आ गया ये साध्वी यहां चतुर्मास करेंगी तो धन ही धन इकट्ठा होगा, उस साधु से हमारा कोई फ़ायदा नहीं होगा, लक्ष्मी जी से कहां : माताजी आप बैठिए मैं उस साधु को भेजता हूं ! सेठ ने आकर भगवान विष्णु से कहां : हे महाराज आपको थोड़ी कष्टा होगी, मेरे घर के पास ही मेरे भाई का घर है आप वहां चतुर्मास कर लो मेरे यहां कोई अजीज संत पधारें है,
भगवान विष्णु : सेठ मैंने तुम्हें पहले ही कहां था हम चार महिने तक अपना स्थान नहीं बदलते, अभी तुम अपनी बातों से मुकर रहे हो ।
सेठ : महाराज आपको जाना ही होगा मैं नहीं चाहता आपको जबरदस्ती घर से निकालना पड़े ।
भगवान ने सोचा इसके मन में लालचा का पत्थर बैठ गया है, ये आवेश में आकर पता नहीं क्या करेंगा,
भगवान ने कहां : वाह सेठ हम कहीं और चले जायेंगे, मगर याद रखना लालच ही सभी से दूरियां बनाता है, मगर सेठ को बस सोने के थाल दिखाई दे रहे थे, आंखों पर लालच की पट्टी बंध चुकी थी ।
बस इतना कहकर भगवान विष्णु वहां से अपने बैकुंठधाम को चल दिएं ! लक्ष्मी जी साध्वी के रूप में उसी महल में भगवान विष्णु की जगह पर बैठ गई ।
उसी रात लक्ष्मी जी महल की दीवार पर कुछ लिखकर भगवान विष्णु के पास बैकुंठधाम पहुंच गये, सुबह सेठ उठे तो देखा वहां साध्वी जी नहीं थें, तब सेठ ने देखा दीवार पर कुछ लिखा हैं ! सेठ ने पढ़ा :
उस सेठ का नाम सुजाराम था,
दीवार पर लिखा था :-
"सुजा" सेजे मिलाया राम किकर सारू तेरो काम ।
तृष्णा कर ने थे दोई गंवाया माया मिली नी राम ॥
अर्थ : सुजा (सेठ का नाम) सेजे मिलाया राम यानि भगवान मिले थे तुझे, किकर सारू तेरो काम यानि तुम्हारा काज कैसे सुधारू, तृष्णा कर ने दोई गंवाया यानि लालच में अंधा होकर तुने दोनों को गवां दिया, माया मिली नी राम यानि ना तो माया को प्राप्त कर पाया ना परमात्मा को । भगवान तेरे घर आएं मगर तु पहचान नहीं पाया, लक्ष्मी खुद चलकर आई तब आंखों पर लालच पट्टी बांध ली ।
अंत में भगवान् विष्णु ने लक्ष्मी जी की बात को सत्य माना इस मृत्युलोक में लोक सिर्फ लक्ष्मी यानि पैसों के पुजारी हैं।
इसलिए मित्रों कभी लालची ना बने, लालच में इंसान सब कुछ खो देता है ।
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