रावण नाम का भी पत्थर तिरा ! परंतु :
जब राम नाम के पत्थर तिरने लगे,तो पुरी लंका नगरी रावण के पास हाथ जोड़कर रावण से कहा: हे दशानन जिनके नाम के पत्थर भी तिरते हो वह तो साक्षात भगवान है,हम उनसे कैसे युद्ध कर सकते हैं तब रावण ने मन में सोचा सबके मन में ये डर हमें पराजित कर सकता है,तब रावण ने लंका वासियों को इकट्ठा किया और रावण ने उनसे कहा: अगर राम नाम से पत्थर तिरते है तो रावण नाम से भी पत्थर तिरते है, लंका नगरी आश्चर्य में पड़ गई, और उन्होंने कहा हम नहीं मानते, तो रावण पूरी नगरी को समुद्र के तट पर ले गया, वहां एक पत्थर पर रावण लिखा और समुद्र में फेंका, तो पत्थर तिरने लग गया ।
पूरी नगरी बहुत खुश हुई, जब राम नाम के पत्थर तिरते हैं तो हमारी लंका में रावण नाम के भी पत्थर तिरते हैं, पूरी नगरी में रावण की जय जयकार करी ।
सब अपने-अपने घर को गए, रावण की पत्नी मंदोदरी (सती) थी, वह मन में सोच रही थी ऐसा कैसे हो सकता है, मेरे पति के नाम का पत्थर नहीं तिर सकता! जब रात के समय मंदोदरी रावण के महल में आई, रावण से कहा: हे पतिदेव मुझे यह बताइए आपने वह पत्थर कैसे तिराया,
रावण ने कहा: मेरे नाम से तिरा है, मंदोदरी ने कहा: नहीं पतिदेव मैं नहीं मानती, आपको सच बताना ही होगा,, तब रावण मंदोदरी से कहा: हे! मंदोदरी वह पत्थर राम नाम से तिरा था, मंदोदरी ने कहा: स्वामी परंतु आपने पत्थर पर तो रावण नाम लिखा था, रावण ने कहा मैंने पत्थर पर रावण नाम लिखा लेकिन मैंने फैकते वक्त उस पत्थर को कसम में बांध लिया।
मैंने पत्थर से कहां: अगर समुंदर में सबके सामने फैंकने से नहीं तिरा तो तुझे प्रभु राम की सौगंध है। तब वो पत्थर समझ गया! बस तिरने लग गया । मंडोदरी ने रावण को फिर समझाया, हे ! पतिदेव अब तो आपको पता चल गया होगा,कण कण में भगवान है पत्थर, वनस्पतियां सब भगवान के ऊपर निर्भर है।
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