ऐसा माना जाता है संत दिव्य दृष्टि से हर जगह को देख सकते हैं, (कहां पर क्या हो रहा है सब)
सती रूपादे ने देखा काठियावाड़ में दो जन भगवान की भक्ति कर रहे हैं ! उधर से तौलण सती ने अंतर ध्यान करके रूपादे व रावल मालदे को भक्ति करते देखा,, रूपादे ने रावल मालदे से कहां : पतिदेव मैंने हमारी तरह ही काठियावाड़ में भक्ति कर रहे संतो को देखा, हमें उनसे मिलना चाहिए ।
यहीं बात सती तौलण ने अपने पति से कहीं, चारों संत मिलने के लिए इच्छुक थे ।
तौलण सती व जैसल दोनों काठियावाड़ से मेवानगर को रवाना हो गए, इधर से रूपादे व मालदे भी उनसे मिलने रवाना हो गए, भगवान की ऐसी कृपा हुई उन पर धोरीमन्ना (बाड़मेर) के धोरों में उनका मिलन हो गया ।
रावल मालदे ने जैसल जड़ेजा से पुछा : आपका परिचय ।
जैसल जड़ेजा : हम काठियावाड़ से आएं हैं ! मेरे साथ मेरी अर्धांगिनी तौलण है, इन्होंने मेवानगर में 2 संतो को भक्ति करते देखा, सोचा उन संतों से मिल लिया जाएं ....
तब रावल मालदे व रूपादे को बहुत खुशी हुई ! उन्होंने उनको सारी बात बताई, कि हम खुद आप लोगों से मिलने काठियावाड़ ही आ रहे थे, भगवान ने चाहा इसलिए यहीं हमारा मिलना हो गया, रूपादे सती ने तौलण सती को देखा उनको बहुत खुशी हुई ।
इस पर संतों की कथनी :-
गढ़ मेवा से माल पधारें, कच्छ से जैसल आएं ।
चारों संत मिले मार्ग में, देख मन ही मन हर्षाएं ॥
रूपादे ने तौलण से कहां परमात्मा की चाह पर हम यहां मिलें हैं क्यूं ना आज इसी जगह पर परमात्मा की सत्संग कर ली जाएं तो अच्छा है । सभी को इस पर प्रसन्नता हुई, मालदे ने कहां यहां पर परमात्मा की सत्संग तो कर लेंगे मगर पीने का पानी नहीं हमारे पास, पानी के बिना तो यहां हम एक मिनट नहीं रूक पायेंगे ।
उसी क्षण एक अनजान शख्स वहां से गुजर रहा था, जैसल जड़ेजा ने उससे पूछा : भाई यहां पर पीने के लिए पानी कहां मिलेगा, तब उसने कहां आस-पास में जितने कुएं है वह पानी पीने योग्य नहीं है, बहुत खारा पानी हैं ।
मालदे ने सोचा क्यों ना इन संतों की परीक्षा ली जाएं, तब मालदे ने जैसल जड़ेजा से कहां : हमें तो पानी चाहिए उसे पीने योग्य तो आपकी अर्द्धांगिनी (तौलण) भी बना देंगी, जब वह भगवान की भक्ति करती है तो भगवान उनके लिए इतना कर सकते हैं, तब जैसल ने सती तौलण से कहां ये संत हमारी परीक्षा ले रहे हैं कि हमारे सुमिरन (माला) में कितनी शक्ति है ! तौलण सती ने कहां : पतिदेव आप इन संतों के साथ बैठिए मैं उस कुएं से पानी लेकर आती हूं ।
इस पर संतों की कथनी :
जैसल माल अमल अरोगे, नीर तौलण लासी ।
भाव कुएं में खारा पानी, कड़वा नीम कहासी ॥
तौलण सती झारी (पात्र) लेकर कुएं पर गई, और भगवान से प्रार्थना करने लगी,,
कथनी :
जा कुआं पर अलग जगाई, सुणो श्याम अविनाशी ।
जुग जुग हूं चरणों की दासी, मती कराई जो हासी ॥
तौलण ने कुएं पर जाकर भगवान से कहां हे प्रभु मैं आपके चरणों की दासी हूं ! इन संतों के सामने मेरी इज्जत रख लेना, इस पानी को मीठा पानी बना लेना,, जैसे ही भगवान ने विनती सुनी तो अचानक उस कुएं से पानी ऊपर आने लगा, सती ने पानी चखा ! बहुत प्रसन्नता हुई
कथनी :
उंडा कुआं अथंग जल भरिया तौला री भक्ति हासी ।
ले हथेली नीर चाखियो, माई स्वाद अमि को आसी ॥
तौलण सती खुशी-खुशी झारी भरके संतों को पानी पिलाया, जैसल जड़ेजा ने पानी पिया मन को बहुत खुशी मिली, रावल मालदे ने पानी पीया तो उनका मुंह उतर गया, रूपादे ने पुछा: पतिदेव पानी पिते ही आपका चेहरा उदास कैसे हो गया,,
कथनी :
जैसल जी हंस हंस पीवे, मालदे पीते ही उदासी ।
तौलण की भक्ति सायब तक, आपरी वेला हांसी ॥
रावल मालदे ने रूपादे से कहां : तौलण सती की भक्ति के तप से परमात्मा ने पानी को मीठा बना दिया, मुझे चिंता है इन संतों ने हमारी परीक्षा ले ली और परमात्मा ने हमारा काम नहीं किया तो यहां संतों के बीच हमारी फजीती हो सकती है, रूपादे ने कहां पतिदेव उसकी चिंता आप ना करें, परमात्मा किसी एक के नहीं होते वह तो सर्वव्यापी हैं ।
चारों संत बैठे परमात्मा का गुणगान कर रहे थे, मालदे ने कहां: इस जगह पर धूप आने वाली हैं आईए हम जगह बदल देते हैं, तब जैसल जड़ेजा ने कहां : हमें कई और छांव में जाने की कहां जरूरत है, आपकी अर्द्धांगिनी रूपादे भक्ति के तप से हमारे लिए छांव का प्रबंध कर देंगी, तब रावल मालदे व रूपादे ने मन ही मन अपने परमात्मा को याद किया ।
रूपादे एक हाथ में सूखी लकड़ी लेकर रेत (ज़मीन) पर खड़ी कर दी, सती अपने अंतर मन से ध्यान कर रहीं थी जैसल और रावल मालदे देखते हैं वहीं सूखी लकड़ी पनप रही थी, देखते ही देखते एक बड़े पीपल का रूप ले लिया, सभी को रूपादे की भक्ति पर बहुत प्रसन्नता हुई ।
चारों संतो ने रात भर वहां सत्संग में परमात्मा का गुणगान किया, रामदेव जी (परमात्मा) खुद उनकी सत्संग में शामिल हुएं ! उन संतों की आराधना सुन ली, इसकी कथनी बाबा रामदेव जी के उपासक (परमभक्त) हरजी भाटी ने की ।
आज रो वधावो गाऊं गुरूदेव रो, धणीयो रे मेले वे आसी ।
अरज करूं अजमाल रा कंवरा, चारों मेला में मिल जासी ॥
No comments:
Post a Comment
भारत के अनेक संतों की विचारधारा व उनका जीवनकाल Description List देखने के लिए अपने मोबाइल को (desktop site mode) करें 🙏